Thursday, August 7, 2008

उलझी अकुलायी लकीरों की फिर वही जगर-मगर शाम..



फ़ोटोशॉप और पेंट में माउस की चिचरीकारी.


बहुत सोचकर खुद को दु:खी और हमें शर्मिंदा मत कीजियेगा, स्‍केच के अंदर भी उतना ही है जितना बाहर प्रकट आंखों को दिख रहा है. पोस्‍ट का शीर्षक महज़ अकुलाये मन के मोह के लिहाज में चिपकाया है..

11 comments:

  1. डरते हुए पूछ रही हूं... शाम ही क्‍यों...

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  2. @शायदा, कहां थीं भई, इत्‍ते दिन? सब ख़ैरियत तो?
    मगर देखा, डरते-डरते पूछने की अदा से हमें शर्मिंदा करने से बाज नहीं आयीं! भई, शाम की अकुलाहट वाली चिचरीकारियां हैं, सो शाम की पूंछ जोड़ दी. गलत जोड़ी?

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  3. क्या स्केच डंगेरा है!! वाह!! सुभान अल्लाह!!! किसी की नजर न लगे!

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  4. न तो दुखी हैं और न ही आपको शर्मिंदा करने का कोई इरादा है, बस यूं ही पूछ लिया था। वैसे बहुत अच्‍छा लगा शाम का यूं अकुलाई लकीरों में उतरना....।

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  5. भाई साहब, आप तो बड़े लाज़वाब कलाकार हैं जी। कहाँ से लाते हैं ये माल, ये आइडिया?

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  6. काफी बेहतर टेम्पलेट है, पहले वाले से काफी ज्यादा सही. किसकी संगत का असर है :) ? एक दम झकाझक, नो लिजलिजापन.

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  7. @संजय,

    धन्‍यवाद कोरपोरेटर इंजीनियर साहब.

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  8. मुझकूं तो सु्बह-सबेरे का सीन दिख रिया है . जनता इतकूं-बितकूं जा'री है . दो जन खड़े फोटू उतरवा रिए हैं चिचरीकार भाई से .

    होणे को शाम भी हो सकै है . किंतु-परंतु जगर-मगर कोथाय ? जे 'भिसेषण' हैगा कि विभीषण हैगा ?

    मैटाफिजिकल पोएट्री'र मतुन मैटाफिजिकल चिचरीकारी होते पारे !

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  9. @की प्रीजोंकर दादा, लोकेर नेइ, लाइनेर जोगोर-मोगोर बोले‍छी जे? सोब सोमोय आमाय मेटाफिजिकोल रास्‍ताये ठेला उचित की?

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  10. गुरूजी प्रणाम.
    गजब की कलाकारी है.
    बहुते बढ़िया.

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  11. बाप रे बाप. बहुत टाइम लगाये हैं. :)
    समय का ऐसा सम्यक दुरुपयोग. वाह. अति सुंदर. ;)

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