Monday, September 22, 2008

दु:ख की लोरी

कभी लगता है अंधों की बारात है कोई जंगली रात है, विद्युत बहुरंगी वाद्यों पर मां-बहन की गालियां बज रही हैं कोई भावुकता में लबरेज़ फुसफुसाता है अहा, कैसी तो भक्ति बजबजा रही है, अफ़ग़ानिस्‍तान से अज़रबैजान तक सबको प्रभुवत्‍सल बना रही है! मैं हड़बड़ाता, खड़खड़ाता- फिर धीमे-धीमे चरमराता- कान के परदों की संवेदना सुनूंगा, रात के बाद दिन की राह तकता, मन के सूने निर्जन में, कल्‍पनाविहुत चंद नये पहाड़ बुनूंगा, हकलाता कहूंगा- कविता, कला, समय, समाज- अंधेरे में गुमनाम पतों पर जाने कहां-कहां तक पसरी कैसी तो लम्‍बी चिट्ठि‍यां लिखूंगा.

थके-थके जब और आंख खोले रखना दुश्‍वार हो जायेगा, कोई छोटी बच्‍ची कहीं नज़दीक बुदबुदायेगी अब सो जाओ, अंकल, मैं तुम्‍हारे सपने में गुज़रना चाहती हूं, अपने में भरे-हरे बरगद की बड़ाई व उसकी जटाओं-सी उझरायी तुम दु:ख का एक विशाल वृक्ष हो, मैं बेमतलब की पगलायी, नाटकीयता में नहायी झंझावाती बारिश में शरण खोजती छोटी-सी चिड़ि‍या हूं, सुख की गुड़ि‍या हूं, जिसे किसी तरह तुम बचा लोगे, अं‍कल, अपने लिये सच्‍ची बना लोगे?

अचकचाया, ज़रा सा चिढ़ा-चिढ़ा मैं एक ओर सरक जाऊंगा, अपने एकाकीपन में थोड़ा और दरक जाऊंगा, क्‍योंकि मुझे सूझेगा नहीं मैं क्‍या गुन्‍ताड़ा बुन रहा हूं, क्‍योंकि सच्‍चायी यह भी होगी कि सुबह एक अदृश्‍य पीतल के लोटे व कांसे की गगरी के साथ मैं एक स्‍नेहसंगिनी नदी की खोज में निकला होऊंगा, जिस खोज का अलबत्‍ता कुछ न हुआ होगा, उस खोज को किसी अपहचानी विदेशी गाने की तरह गा, ख़ून और आंख की जांच करवाने में उलझ चुकने के उपरांत मैंने चश्‍मे का फ़्रेम व बाइफ़ोकल की गुत्‍थी सुलझायी होगी, रफ़ी को धता बताता तलत महमूद को गुनगुनाता एक जोड़ी चप्‍पल और तंत्रा के टीशर्ट्स उठाये होंगे, झुंझलाहट व खीझ में टुनकता रहा होऊंगा कि अजब हैरतनाक़ दिन है, सुबह से फटी हुई टोंटी की मानिंद पैसे बहा रहा हूं, फिर भी देखो, किस बेहयायी से दु:ख की लोरी गा रहा हूं!

Friday, September 19, 2008

सुख का भूगोल..

रात को सोने, और सोने से ज़्यादा सोचने के लिए, अंधेरा करने के बाद मैंने खुद से उसी तर्ज़ पर सवाल किया जिस तर्ज़ पर आठवीं में शर्तिया फेल होने जा रहा बच्‍चा अदबदाकर खाने की थाली पर बैठे अनमनाये बाप से अकुलाया सवाल करता है कि उसके अस्‍सी परसेंट नंबर उठाने पर बापजान दूकान से नयी साइकिल उठवा रहे हैं न? नयी साइकिल के कन्‍ज़्यूमरिज़्म को लेकर उत्‍साहविकल होने की जगह मैं भाषायी कम्‍यूनलिज़्म के दायरों में भावविह्वल घूमता रहा. खुद से पूछनोपरांत खुद को सूचित किया (फॉर अंप्‍टीन्‍थ टाईम) कि एक फ़ि‍ल्‍म बन जाती तो अच्‍छा होता, हालांकि बन चुकने के अनंतर मैं सुखी होऊंगा ही इसका आत्‍मविश्‍वास अब खड़खड़ाता लगता है (दैट्स आल्‍सो ऊड नॉट बी हैपेनिंग फॉर द फ़र्स्‍ट टाईम). संभवत: ताकेशी कितनो की तरह मैं भी नाक पर तर्जनी चलाते हुए बुदबुदाऊं कि पता नहीं दूसरे क्‍या मेरी फ़ि‍ल्‍मों में देख लेते हैं, मुझे तो ऐसा कुछ खास नहीं दिखता..

ख़ैर, मैं बहक रहा हूं, रात के अंधेरों में अपनी इच्‍छालोक की छाया, माया की चर्चा कर रहा था, उसी पर लौटता हूं. यही कि एक इच्‍छा होती तो है (सबके कुछ न कुछ होती है), मगर ससुरी, पता नहीं उम्र है क्‍या है, कि अब ऐसी नहीं होती कि उसके इश्‍क में खुद को भूल जायें, लुटा दें, रात को सफ़र पर निकलें और सुबह आसमान पता नहीं किस नये रंग में सजा दें..

एक दूसरे मित्र हैं वर्षों से किताब लिखने का सपना पाले हैं, सोचते हैं शायद किताब लिख लिये जाने पर सुखी हो जायें. मगर सुखी होने की यह भोली हसरत फिर भी शायदों के दायरे में ही है. इसीलिए किताब लिखी भी नहीं जा रही. कि शायद न हों. फिर? दूसरे, मित्र का यह भी मानना है कि किसके लिये लिखें. हिंदी में पढ़ने की अब रवायत कहां रही. जो लिखा जा रहा है, और पढ़ा, वही लिखना है तो बेहतर है फिर न ही लिखी जाये किताब. इस तरह जीवन के वृहत्‍तर अरमान के सबसे बड़े बैलून के ठीक नीचे उतना ही बड़ा छेद भी नत्‍थी बना रहता है. न लिखी किताब के पन्‍नों का साउंडट्रैक मन की हवाओं में फड़फड़ाता है, हथेलियों की महक में आकर रचता-बसता नहीं.

एक तीसरे हैं. मित्र. पुरानी इच्‍छा थी वर्ष में एक बार पहाड़ ज़रूर जायें. समय की अच्‍छी सिर-फुटव्‍वल वाली नौकरी है मगर पिछले छह-सात वर्षों से फ़ुरसत में समय निकालकर पहाड़ जा रहे हैं. ऐसे वेकेशनल ‘एडवेंचर’ के पीछे आइडिया यह रहता है कि शायद मन में पहाड़ की ऊंचाई व आत्‍मा में प्रकाश की ललायी बनी रहे. छह दिवसीय अवकाशोनंतर आकर नौकरी ज्‍वॉयन कर लेते हैं और नौकरी की रेल पर पुन: छुकछुक बहके-बहके से डोलते रहते हैं. ज़रूरत की मात्रा में मुस्‍करा देते हैं, और ऐसी ज़रूरत पड़ ही गयी तो कविता भी सुना देते हैं. वर्ना ऊधो को देने और न माधो से लेने में यक़ीन रखनेवाले साफ़-सुथरे व्‍यक्ति हैं, सुखी हैं. जिस इच्‍छा के पीछे जीवन था वह नियम से पूरी हो रही है तो फिर शिकायत की वज़ह कहां बचती है?

जाने किस तरह का समय है और यह किस तरह की सुख की सड़कें हैं. कभी-कभी लगता है खुद को दबोचकर सवाल किया जायें कि गुरु, इतना उड़ो मत, ज़रा हमारी सवाल का साफ़-साफ़ जवाब दो! इस सारे जीवनरूपी अल्‍लम-गल्‍लम की बुनावट क्‍या? सफ़र के रस्‍ते क्‍या, सफ़र की मंज़ि‍ल क्‍या?

मगर फिर यह सोचकर घबराहट भी होती है कि शायद खुद के सवाल पर कहीं ऐसा न हो कि खुद ही पलटकर अजनबीयत में उलट सवाल करे- आर यू टॉकिंग टू मी?..

सुखी होने के भूगोल का नक़्शा समय और उम्र की इस मुकाम पर आकर जाने क्‍यूं व कैसा तो धुंधला हो गया है. रहते-रहते बिजलियां कड़कती हैं, फिर देरतक घनेरा अंधेरा तना रहता है. मन ख़्याल करे, व अटेंशन दे तो पीछे कहीं बारीश की बूंदों के बजने का म्‍यूज़ि‍क सुनायी देता है, वर्ना वह भी पता नहीं कब किसी अबूझ-अपहचाने शोर के साउंडट्रैक की शक्ल अख्‍ति‍यार कर लेता है. बीच-बीच में इच्‍छारूपी बिजलियों की कड़कड़ाहटों से चौंकने से अलग जीवन का ज़्यादा समय हम कमरे, लिफ़्ट, सीढ़ि‍यों का सफ़र करने, बिल भरने व शहर के एक निहायत छोटे हिस्‍से की माया समझ लेने की कसरतों, हसरतों में गुजार देते हैं. और कभी-कभी तो अपनी आह की आवाज़ तक भी नहीं सुन पड़ती.

Thursday, September 18, 2008

कटोरीभर चीनी का सीधा है.

|| एक ||
तुम्‍हारा ठांव, नेह की छांह, क्‍या कहें
कहते मुंह लरबराता है, बहुत ऊंचा है
इस अकालबेला, दलिद्दर समय में
नीचायी में मुड़ी नवाये, आंख चुराये
गरीब के घर कटोरीभर चीनी का सीधा है.
|| दो ||
इलागिंग करेंगे, बिलागिंग करेंगे, का पायेंगे?
कभी आपकी, ज़ादा अपनी मुड़ी खुजायेंगे
दरवाज़े की फांक से, फटही की ढांप से फिर
दो-चार बिल चला आयेगा तो गाल पर हाथ धरे
चुप्‍पे-चुप्‍पे धुंआ पियेंगे, बुदबुदायेंगे एक-दो-तीन
अलमूनियम की थरिया में मांड़-भात खायेंगे?

Wednesday, September 17, 2008

बारीशी भयभराहटों में लड़ि‍याया प्रेम..

परछाइयां भी जब घबरायी छुपी अपने में दुबकी हों, तड़पकर चीखती बिजलियों की कड़कड़ाती- बीसियों दिन से अनछुए, सूखे पड़े तवे को जैसे आर-पार नहलातीं- झमाझम बरसती घनेरी रात में जब मैं चमक-चमककर सोचूंगा अब गये तब गये, लेकिन नाचती रात तमक-तमककर भेद बुनती रहेगी कि इतने सावन बीत गये मगर उतने अभी बाकी हैं, थर-थर भयग्रस्‍त मन पर उम्‍मीद की बाती- बुझने-बुझने को आयी लेकिन देखो, फिर टिमटिमायी- और जोड़ी भर आंखों के सहोदर सपनसाथी हैं, तभी तुम आओगी. आओगी जैसे आपदा के गहरे सियाह मौक़े पर पहुंच आता है हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का अंधेरहंता. मैं चिंहुककर कहूंगा अब आयी हो जब कपड़े उड़ गये, कागज़ गल गये, और मैं भी गला ही चाहता हूं? लो, सम्‍भालो, फ़ि‍लहाल अभी तक मुझ अनगले को कहकर तुम्‍हारी भरी गोद में अपना निर्जन पैर पसार दूंगा, पूछूंगा अब बताओ मेरे पैर में सात उंगलियां क्‍यों नहीं हैं. तुम नहीं बताओगी, अंधेरे में जुगनू की आंख की मानिंद अपना दुलार चमकाओगी, मुस्‍कराओगी, कहोगी चलो, मैं तुम्‍हें भगाकर ले जाने आयी हूं. मैं कहूंगा फिर से कहो, फिर से कहो! अच्‍छा ग़ज़ब है पुरानी काली-सफ़ेद जर्मन फ़ि‍ल्‍म में लड़की मुस्‍कराती है तो अनार-से दांत दिखाती है, लेकिन तुम्‍हारा पता नहीं क्‍या है जब भी मुस्‍कराती हो खरबूजे की याद दिलाती हो? तुम जुगनू को बटुये में डालकर मुंह सिल लोगी, कसमसायी देह तानकर, अपना नहीं मेरा पैर पटकोगी, फिर-फिर वही घिसी लाइन दोहराओगी, मालूम नहीं तुम्‍हारा मैं क्‍या करूंगी. मैं चिंचियाता चहकूंगा क्‍यों, क्‍यों, सिर पर नहीं धरूंगी? अबकी तुम मुंह से नहीं आखों में जुगनू जलाओगी, ओह, अंधेरों में कैसा-कैसा तो उजियारा फैलाओगी..

Sunday, September 14, 2008

छूटती चलती..


उंगलियों का पोर किसी नवकोंपल के हरेपन-सा हल्‍का होता, नहीं है
मन किन्‍हीं जापानी मांगा की सत्‍तररंगी कल्‍पनाओं में हहाता उड़ता
चकित-प्रज्‍जवलित विहगता, टिमटिमाती नीली रोशनी की नाव पर सवार
अनूठी, चमकती रचनाओं की एक महीन, महती किताब रचता, ऊपर
चमकते हरफ़ों में लिखता- ‘बिहार! बिहार!’, लेकिन कहां, नहीं लिखा..

हर वक़्त भारी चेतना पर किसी आदिम नशे की तरह
चढ़ी रहती है थकान, घिस-घिस-घिस घिसड़ता घिसता है मन
ललियाये पत्‍तों के बीच खुलता है दिगंत, सियाह चील की तरह
झपट्टा मारती आती है कल्‍पनाएं, और फिर उतनी ही तेज़ी से
गायब भी हो जाती हैं-
पलकों के मुंदने के विहंगम अंधेरों में..

छूटता, छूटता, छूटता सब छूटता चलता है
रोयें, कनपटी के बाल, देह का खिंचाव
नज़र की मार, कल्‍पना की कसी धार सब छूटते
छूटते चलते हैं, कितना सारा असबाब, ओह
कैसी अनोखी तो वह मेरी आत्‍मा का मणि
किताब, छूटती चलती है

छू ट ती च ल ती..

Saturday, September 13, 2008

उठते, उड़ते..


इस पल ‘ओह, कैसा भरा-भरा अघाया’ और
अगले ही ‘लो, देखो, सब छितराया!’
मन लिये भीड़ में झाड़ता हूं गर्दाये पंख
हांकता हूं खुद को ‘हुल्‍ले ले ले!’
अटकता-उमगता उड़ता हूं हौले-हौले जैसे
कोई बुढ़ाता कौवा बिजली के जंगली जालों से
बाल-बाल बचता, बारिशी बिछलाहटों में
‘एक-दो-तीन-चार’ गुनता धीरे-धीरे
समझदार हो रहा हो, रह-रहकर कुंए
के काले पुराने पत्‍थर पर पैर धोते
किसी तमिल ब्राह्मण की तरह मंत्र बुदबुदाये-
चील उड़ता आसमान में, बेंग टर्राते खोहों में
और मैं हिलगता, बुनता, बिगड़ता- कहां?
कहां? कहां? जहां दिन है न रात है?...


एक अटका हुआ संगीत है
एक छूटी-उखड़ी हुई बात है
कांपते परदे के पार टूटा झरोखा है
बीहड़ बरगद का अंधेरा है, बारिश
के गीलेपन की थरथराहट में
थोड़ी-सी तुम्‍हारे समझ लेने की
उम्‍मीद और खुद को कहते-बिनते
बुनते रहने की ढेरों बात है.

Wednesday, September 10, 2008

अंधेरे में बाजा..

निराशाओं के दमकते पोस्‍टरों के अंधेरों से गुज़रता हूं सनक्-सनक् बजती है काली दोपहर. किताबों के पीछे कभी पागल हुए के सवाल के जवाब में आईटी की अच्‍छी कमाई, घुंघराले बाल व घनेरी आंखोंवाला- उंगलियों में सिगरेट फंसाये, ज़रा सा सिर झुकाये नौजवान मुस्‍कराता बताता है लिटरेचर कभी सपरा नहीं, नहीं पढ़ी किताबें, एक कज़ि‍न है वह पढ़ती है. गिटार के पीछे पागल हुआ करता था मगर वह भी जाने कब किस ज़माने की बात है. इन दिनों बस पैसे बजते हैं कनपटी पर, मन के अंदर पता नहीं क्‍या खालीपन बजता है.

राजधानी में कोई दोस्‍त फ़ोन पर तमकता है देखा तुमने, शर्म आयी? बाढ़-पीड़ि‍त लालू की गाड़ी के आगे हाथ हिला रहे थे, जीते जी अपने मुर्दापने का घोषणापत्र सुना रहे थे, अबे, ऐसे हारों का क्‍या दु:ख करना? लुटे हुओं से इतना तक न हुआ कि पटना लूट आते, पंद्रह-बीस बस, कोई मंत्री पर थूक, किसी मंत्रालय को फूंक आते? थेथरई और थूक पर गिरे हुओं का गंवारा हारा बेचारा समय है. समझदार लोग बताते थे समाजों में परिवर्तन इवोल्‍यूशनरी या रिवोल्‍यूशनरी तरीकों से आता है, यहां तो दोनों ही तरीके लगता है एक-दूसरे को मुंह बिरा रहे हैं, लात खाये अभागे इतना बूड़े हुए हैं कि चूतड़ की तक़लीफ़ भूलकर बीच-बीच में रोते हुए मुस्‍करा रहे हैं, और लात लगानेवाले, हमेशा के बेहया थे, कभी गंभीर भंगिमाओं में, ज़्यादातर थेथरई में लहक-लहक गाल बजा रहे हैं!

अल्‍लसुबह से देर रात तक हथेलियों की कोमल घुली त्‍वचा पर, पलकों की नरम गर्म उदासियों पर क्‍या-क्‍या तो कैसा पराया, पिराया सुर बजता है. बीच-बीच में कभी भक्‍क् कहीं रोशनी चमकती है, फिर देर तक कसमसाये पैरों में कोई अनदिखा कांटा फंसा रगड़ता है, अंदर गहरे गड़ता है. गड़ता है गड़ता है. बजता है.

बजने में गड़ता है. फिर गड़ने का बजता है.

Saturday, September 6, 2008

कोशी से कितनी दूर?..

राहत है कोशी से दूर हूं. रह-रहकर नाटकीय ऊर्जा से गरजते बंबई के मेघ ही दहशतज़दा किये जाते हैं, कोशी की निकटता में जाने क्‍या हालत होती, कांपने लगता. फिर कांपता ही रहता- बताशा, पेड़ा की बुकनी, बबुनी की घुघनी, ब्‍लॉग की बमचक सब समाज में भरोसा और उम्‍मीद की तरह फुर्र हो गए होते.. आगे कुछ और होता तो यही होता कि कांपते-कांपते की जि‍जीविषा चुक गयी होती और कांपने की सब छवियों के मीडिया प्रत्‍यार्पण व समाज कन्‍ज़्यूम कर सके के माल-कन्‍वर्सन के अनंतर मैं बह गया होता? कभी बाद में कहीं कोई भोली आवाज़ बुदबुदाकर कहती- एक था अज़दक?..

कितनी खुशी हो रही है बंबई में बादल गड़गड़ गरजते हैं, नीचे जल नहीं ट्रैफिक के दलदल में बहलता हूं, कोशी की हवायें मेरे कंधे और चेहरे पर आकर मचलने नहीं लग रहीं. बिहारी होने का चरम आत्‍मीय अंतरंग आत्‍मीय आनंद बिहार में रोज़-बरोज़ का जीवन जीने के चरम लौमहर्षक, वीभत्‍सकारी अनुभव में नहीं अझुरा रहा! ऐसे ही मीठे, बच गए होने के आह्लादकारी मीठे आलोड़नों पर ‘कितने पास फिर भी कितने दूर!’ जैसे रुमानी मुहावरे का ईज़ाद हुआ होगा. बिहार मेरी आत्‍मा की उंगलियों के पोर पर है, जीभ के छोर पर है, लेकिन कोशी का झंझोर मैं अपने सपनों के नज़दीक भी कहां फटकने दे रहा हूं. सुबह के सहज नाश्‍ते की चुभकार में कैसा रसिकलाली सुख है कि कोशी की कजरारी आंखें हमारे नयनों में उतरकर गड़ नहीं रही, न हमारे जीवन को हुमच-हुमचकर पटक रही है!..

जिनके जीवन में जल आना था, तबाहियों का गाना व टूट-टूटकर जिनका जीवन बिलाना था, वो मृतप्राय व ध्‍वस्‍त न हुए हों, और अभी भी आसमान और हवाओं में हाथ भांजते रहने की ताक़त रखते हों, लेकिन अंत में अंतत: उनकी औकात क्‍या है? चार दिन तक भूखे रहने के बाद पांचवे पेट में कहीं से कुछ अन्‍न पहुंच जाये, हाहाकारी जिजीविषा कहीं किसी तरह का ज़रा ठौर पा जाये, इतना ही भर तो उनके जीवन चरम कौतुकगान होगा, सहरसा का मगही सौगाती पान होगा? हमसे- दूर-दूर उड़ रहे प्रमुदित पाखियों- की ऊंचे उड़ानों से इन टुटही वितानों के दो कौड़ि‍या चिरकुट मुर्दा मचानों की क्‍या तुलना? हतभागे, कुभागे, अभागे, भोर के हिलोर में जीवन का पंक, कोशी की पीठ व गोद में झूल-झूलकर होते रहें दंग! मैं नहीं हूं. सुखी हूं. उमंग में हूं. चेहरे पर खामखा की गंभीरता है मगर उमगियाये सुख में नी‍तीश कुमार भी हैं. मुख्‍यमंत्री को सुखसागर में तैरते हुए गंभीर दिखना पड़ता है; इसी गुरुगंभीरी अदाओं की सफल दिखलाइयों पर मुख्‍यमंत्रित्‍व चलता है; अब तो समूचे देश में कहीं नहीं बूड़ता तो बिहार में बूड़ने की बात कहां से आयेगी.. मगर पता नहीं क्‍यों सुबह-सुबह बेवजह बेकली हो रही है कि लाखों-लाख बिहारी बाढ़हारे अभागों की संगत में कितना तो अच्‍छा होता कि बिहार का मुख्‍यमंत्री व उसका समूचा मंत्रीमंडल कोशी के कलकल को ऊपर हैलीकॉप्‍टर से देख नहीं रहे होते, उस दलदल के बीचोंबीच बुड़-बुड़ बुड़बुड़ाते, बूड़ते दहल रहे होते. या लोगों के गुस्‍से ने ही उनको इस जल में बहा दिया होता?..

मज़ाक कर रहा हूं. चिंता की बात नहीं है. ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा. मन का एक कोमल भाव था, मैं मात्र उसे उगल रहा था, मंत्री-संत्री कहीं दहलेंगे नहीं, इस देश में ऐसी परिपाटी रही नहीं. कभी रही भी होगी तो ज़माने पहले उसे बहाकर अपने सुख के निजी ककून में हम सुघड़, सुरक्षित होना सीख गए हैं. बहलना-दहलना, बहना अभागे, हतभागों के जिम्‍मे..

कोशी से इतनी दूर बंबई के कचर-मचर में रहते हुए कैसी गदबद आनंदानुभूति हो रही है. आप भी उठाइये, जो बह रहे हैं कृपया उन्‍हें चैन से बहते रहने दें, ऐसी गंदी, छिछोरी, विनाशकारी, ग़ैरतरक़्क़ीपसंद छवियों से नज़र परे हटाइये!

(रवीश कुमार के पढ़े की प्रतिक्रिया में)

Thursday, September 4, 2008

किताबों की अलमारी

छुटपन के अपने शहर में लोगों के घरों में और चीज़ें दिखती, किताबों की अलमारी कभी नज़र नहीं आई. ज़्यादा घरों में एक-डेढ़ शेल्‍फ होता था जिस पर स्‍कूल की ज़रूरत की चीज़ें गंजी होतीं. किताबें ऐसी चीज़ थीं जो कभी-कभी दिखतीं. ऐसी तो वह कतई नहीं थीं कि उनके लिए अलमारी की दरकार पड़े. हालांकि कुछ लोग थे जिनका राजनीतिक चर्चा के बिना खाना नहीं पचता था. ऐसे लोग अख़बार पढ़ते. ओड़ि‍या, बांग्‍ला, अंग्रेजी. सुबह साढ़े नौ के बाद सामने और कैरियर पर पीछे बंडल लादे अख़बारवाले की साइकिल पर हिंदी पेपर नहीं होता. हिंदी के ‘आर्यावर्त’ या ‘हिंदुस्‍तान’ लाने के लिए साइकिल से स्‍टेशन जाना पड़ता था. सेक्‍टर सोलह के मद्रास कैंटीन के बाहर काउंटर पर अलबत्‍ता तमिल, तेलुगु और मलयालम की सजीली मासिक पत्रिकायें दिख जातीं. मगर किताबें गायब थीं. लोग पेपर पूछते, खोजते दिखते. किताबों का कोई नहीं पूछता.

संयोग ही रहा होगा कभी जो मैंने बिना खोजे पा लिया था. हमारे जाने-पहचाने परिचित भूगोल से बाहर, पुराने शहर में. अंदर गलियों के भीतर- रज़ाक टाकीज़ के अहाते की एक गुमटी में हिंद पॉकेट बुक्‍स के एक-एक रुपये वाले उपन्‍यास मिलते थे. देर तक दुकानवाले को दिक् करो, खुद खंगालो तब कहीं काम की कोई अच्‍छी चीज़ हाथ लगती थी. अलमारी का सुभीता और तहजीब नहीं थी.

मिश्रित आबादी वाले अपने उस छोटे इस्‍पाती शहर से बाहर निकल जाने और खुशी, तमाशे और लाचारी के ढेरों वर्ष गुजार चुकने के बाद जीवन में किताबों की अलमारी देखने का मौका बना. उनका महत्‍व, वर्गीय भेद, उनकी गहराई, रहस्‍यलोक, उनकी पहुंच का अंदाज़ा हुआ. उसके बाद समाज में मेरे घूमने, घरों की पहचान का वह एक ज़रूरी, प्रा‍थमिक हिस्‍सा हो गईं. किताब की अलमारियों की संगत में मैं सहज या असुविधाग्रस्‍त होता. अलग-अलग शहरों की याद में अलग-अलग घरों की वे किताबी अलमारियां होतीं जिनके बीच मैं खुश और उदास हुआ था. अनिता के साथ वेनिस, पेरुजा या अस्सिसी में घूमते हुए जब भी हम घर बसाने की योजनाओं पर बात करते, मैं चुपके-से अपने स्‍नेहिल एकांत में अपनी अलमारियों का सपना देखने से बच नहीं पाता. वह हमेशा मेरे साथ रहीं. कितने सारे कोमल सपने बने, टूटे, फिर खड़े हुए. उनके खड़ा होते ही सबसे पहले मैं अपनी अलमारी खड़ी करता. ऐसा नहीं कि मैं किताबों को लेकर विशेष भावुक होऊं (भावुक तो हूं ही!), मगर उनका खुद के आस-पास होना, उनकी व्‍यवस्‍था बहुत बेसिक चीज़ लगती थी. खाने और स्‍वस्‍थ्‍य रहने की तरह. किताबों की अलमारी से दूर रहते हुए लगता मैं सभ्‍यता से दूर रख दिया गया होऊं. अलमारी के अभाव में किताबों का जगर-मगर कहीं और टिका होना, या फिर उन्‍हें फ़र्श पर बिखरी देखकर लगता जैसे आज नहाना रह गया!

बिशाखा ने जब तय किया हमदोनों के साथ रहने का अब मतलब नहीं, और अपनी चीज़ें अलग करने लगी, मैंने कहा था किताबों के सिवा तुम जो चाहती हो, लेकर जाओ. बदमाश का इरादा मुझे दु:खी करने का नहीं था मगर किताबें सब उसीके साथ गईं. एक अलमारी भी. दूसरी वैसे भी मुझे कभी पसंद नहीं थी. उसकी दरारें देखकर अपने जीवन में दरारों का बोध होता. रखनी ही हो तो आदमी दरारोंवाली अलमारी क्‍यों रखे. मैं ऐसी चाहता था जैसी रोम, वेनिस और लंदन के घरों में देखीं और भूल नहीं पाया. किसी दिन चालाकी और जतन से ऐसी अलमारी चली आयेगी अपने पास, ऐसा मेरा सहज विश्‍वास था. मगर खोखले विश्‍वास की भावुकता से कहां चीज़ें आती हैं? और जहां तक चालाकी की बात है वह तो कभी भी मेरे काम आने से रही! अजीब बात है बिशाखा के जाने के बाद जीवन की झुंझलाहट, खीझ में किताबें कहां-कहां से इकट्ठा होती रहीं लेकिन अलमारियों के इंतज़ाम वाली बात धरी रह गई. मैं वह घर खड़ा नहीं कर सका जिसमें अपने मन के अनुरुप किताबों की अलमारियां खड़ी कर सकूं. बीच-बीच में अब यह भय भी होता है कि अलमारियों की व्‍यवस्‍थावाली बात शायद अब ऐसे ही रह जाये. जैसे खुद को कोई न दे सका, किताबों को भी टेक व ठौर देना न हो सके? सोचकर मन के अंदर गड्ढे हो जाते हैं, फिर गड्ढों को भूलकर जल्‍दी ही हंसने भी लगता हूं. जीवन क्‍या इतनी आसानी से खत्‍म होता है? किताबों की अलमारियां क्‍या इतनी आसानी से सपनों से गायब होती हैं? होने दी जा सकती हैं?...

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बचपन के जिस पड़ोसी घर में पचीस-तीसेक किताबें दिख जाती थीं (हिंदी, अंग्रेजी नहीं. ओड़ि‍या), लम्‍बे अंतराल पर आया हूं तो अब कहीं किताब नहीं दिखती. मिताली का तीन साल का बच्‍चा ज़मीन पर लिसड़ता सिपाही के खिलौने से खेल रहा है. खेल और बच्‍चे के उत्‍साह की ज़द में आने की गरज से मैं बच्‍चे को ओड़ि‍या में चुमकारता हूं- मजा आ‍सुछि तS? ऐसे ही अन्‍य उल्‍टे-सीधे वाक्‍य. बच्‍चा ध्‍यान नहीं देता. खेल में व्‍यस्‍त है. मुझे लगता है मैं बच्‍चे से ज़्यादा उसकी मां को अपनी ओड़ि‍या सुनाने का खेल कर रहा हूं. रसोई में मेरे लिए चाय बनाती मिताली जवाब देती है- सब भूल गए हो तुम. भूला कहां हूं? रमाकांत रथ, जयदेब परिडा, गोपीदास महांति रैक पर रखी सब किताबों के कवर याद हैं. याद हैं? सिपाही के खिलौने की टांग टूटी हुई है. मेरे अंदर पता नहीं क्‍या टूटा है. मासी की बीमारी के पहले इस घर में कैसी रौनक रहती थी. अब मासी ज़्यादा वक़्त अंगुल गांव के घर में रहती हैं. यहां की देख-रेख करनेवाली मनोज की पत्‍नी में सबसे मेल का मासीवाला पुराना उत्‍साह नहीं. मुझे भी नमस्‍ते करने के बाद वह सीधे अंदर अपने कमरे में चली जाती है. मैं ओड़ि‍या बोलने की बेहुदी ज़ि‍द छोड़कर चुपचाप बच्‍चे को तकता बैठा रहता हूं.

जाने क्‍या है कि इस शहर के स्‍टेशन पर उतरते ही पता नहीं अब क्‍यों इतनी कातरता घर कर जाती है. हर चीज़- मिलना, देखना, कोई नज़र, छुटी हुई याद- सब किसी खेल का कार्य-व्‍यापार लगते हैं जिसका अंत मन के भीतर फिर कुछ दरकने, किसी टूटने में होता है. क्‍या बचा है अब मेरा इस शहर में? क्‍यों लौटकर आता हूं यहां? बतायेगा कोई? मिताली बतायेगी, व्‍हॉट डू आई कीप रिटर्निंग हियर फॉर? टू फाइंड व्‍हॉट दैट आई हैवंट फाउंड एनिव्‍हेयर एल्‍स?

किताबों से लगी रहनेवाली मिताली से मिलना बहुत वर्षों बाद हो रहा है. छुट्टि‍यों में भाई के पास घूमने आयी है. मनोज मेरे भाई का लंगोटिया यार है. पेंटिंग का रंग और पेंसिल पाने के झूठे वादों व लालच में अपनी एक सहेली की बड़ी बहन तक मिताली मेरी चिट्‍ठि‍यां पहुंचाया करती थी. लेकिन यह सब बहुत पहले की बात है (पता नहीं क्‍या लिखता रहा होऊंगा उन चिट्ठि‍यों में). छुटपन में शादी की बात की छेड़छाड़ करके कभी भी मिताली को रुलाया जा सकता था. अब तीन साल के बच्‍चे के साथ कितना चहक-चहक के सवाल कर रही है. भूली नहीं है कि मैं उसकी शादी में नहीं आया था. उसे बहलाने के लिए मैं याद दिलाता हूं कि मैं इसकी, उसकी किसी की शादी में कहां आया था! (नॉट ए बिग डील. आई एम नॉट शादी में चले आनेवाला टाइप. आई नेवर वॉज़..). एनीवे, शादी के बाद पहली मर्तबा मिलकर मिताली नाराज़ है. मेरे आगे ज़ाहिर करना उसे ज़रूरी लगता है. कहती है बहुत बदल गया हूं. क्‍यों इतना बदल गया हूं? ये सवाल, वो सवाल. ऐसे सवाल जिन्‍हें पूछते हुए स्‍वयं भी मुझे खुद से डर लगता है. मिताली को जवाब देता हूं इतना परेशान करोगी तो उठकर चला जाऊंगा. वह पलटकर कहती है मुझसे डरती नहीं. एक-एक बात का जवाब लेकर रहेगी. चला जाऊंगा तो पीछे-पीछे आएगी! लेकिन बातों के दमदम से अलग, मेरी असुविधा के बोध में दिखता है मिताली गुमसुम हो गई है. चाय का खाली कप उठाते हुए कहती है- भाई के पीछे चली आती हूं लेकिन अब यहां अच्‍छा नहीं लगता. पहलेवाली बात नहीं रही. एकदम वीरान जैसा लगता है. सब कहीं चले गए हों जैसे...

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एक वक़्त के बाद सब कहीं चले ही जाते हैं. जो बचे रहते हैं उन्‍हें भी कहीं चले जाने की छटपटाहट रहती है. नहीं तो धीरे-धीरे दुनिया उनके बचे होने को जैसे भूल जाती है. (अनिता से कितने समय से बात नहीं हुई. शायद फ़ोन नंबर भी नहीं मेरे पास. किताबों के बारे में हम कितनी बातें करते थे. कितनी किताबें हमने एक-दूसरे को पढ़ाईं! दो वर्ष पहले दिल्‍ली में किसी परिचित से पता चला अनिता तेहरान में है. मैं काफी समय तक इस कल्‍पना में दिमाग लड़ाता रहा कि तेहरान में किस तरह के घर, कैसी अलमारियों के बीच अनिता अपना जीवन चला रही होगी..) इस भुले हुए के बीच सुमन बीच-बीच में सिर उठाये अपने ‘स्‍प्‍लेंडर’ पर यहां से वहां गुजरता दिखता है- की दादा, तोमार छोबि-टोबि कखन देखते पाबो कि पारबो ना? मैं झेंप में नन-कमिटल सिर हिलाता हूं (मेरा सालों से बंबई में होना और इस बिना पर होना कि मैं फ़ि‍ल्‍मों में ‘कुछ’ करता हूं, बहुतों से बहुत समय तक इस तरह की जिज्ञासायें करवाता रहा. मेरे चेहरे की धुंध व नाकामी के किस्‍सों ने इसी तरह बंबई में रहने व फ़ि‍ल्‍मों से ‘जुड़े’ होने की बात भुलवा भी दी... मगर सुमन अब भी याद दिलाकर मुझ पर तंज करता है. हाथ में किताब लिये कहीं पढ़ता दिखूं तब भी वह बात फ़ि‍ल्‍मों की ही करता है. मेरे भटकाव की कहानियों से शायद उसे निजी तौर पर कहीं राहत पहुंचती है). बचपन में सुमन भोंदू था सब उसे लात लगाते थे. किन्‍हीं अर्थों में भोंदू वह अब भी बना हुआ है मगर पलटकर लात लगाने की कला उसने सीख ली है (पैसे बनाने की कला समझने कुछ वर्ष दिल्‍ली गुजारने के बाद चुपचाप वापस लौट आया था. उन दिनों की वह किसी से चर्चा नहीं करता. अलबत्‍ता दूसरे पीठ पीछे जब कहानियां बुनते हैं तो उन्‍हें हिन्‍दी में मां-बहन की टेढ़ी-मेढ़ी गालियां सुनाने से बाज नहीं आता. चोट खायी सुमन की मां सिर हिलाती है- सब सेखाने सिखेछे त, देल्‍ली जाबार आगे ऐइ रकोम कखनो कोथा बलतो की?). टिकना की चायवाली गुमटी पर वापस मुझे घेरकर सुमन सवाल करता है स्‍टॉक-उस्‍टॉक में मैंने कहीं पैसा लगाया है या नहीं. सिर हिलाकर मेरे इंकार करने पर निराशा में खुद सिर हिलाता, कि बंबई जैसे शहर में इस तरह खाली-छूछी ज़िंदगी जीकर मैं अच्‍छा नहीं कर रहा. पैसे-वैसे का खेल होना चाहिए. बड़ा खेल!

सुमन ही नहीं सबकी ज़बान पर पैसे की बात रहती है. इतने वर्षों में इस छोटे शहर में कितना कुछ बदल गया है. मुख्‍य शहर के समानंतर छेंड की एक अलग दुनिया खड़ी हो गई है. किताब की दुकान न खुली हो, इफरात में इमारतें खड़ी हुई हैं. और टिकना की धुंआती गुमटी से कम्‍यूनिटी सेंटर के सूने, उजाड़ उजास में सब कहीं हर कोई पैसे के बारे में जानना चाहता है. कलकत्‍ता में कितना बनता है दिल्‍ली में कितना. बंबई में? देश से बाहर की जिज्ञासायें नहीं खुलतीं. तापस, दिपांकर, सुभाष, एक्‍का जैसे काफी लड़के हालांकि अब देश से बाहर हैं. हाई स्‍कूल की टोप्‍पो आंटी का बेटा वॉशिंग्‍टन डीसी में है. मैट्रिक में दो बार फेल हुआ वेणु नायर हॉलैण्‍ड में कहीं है. उनकी वापसी पर हैरत के कुछ किस्‍से भले बुने जाते हों, स्‍थानीय चिंताओं व जिज्ञासाओं के विस्‍तार में वे स्‍थायी नहीं हो पातीं. पहले भी एक फूहड़ कौतुक से ज़्यादा योरप में बिताये मेरे दिनों की कभी बात किसी ने नहीं जाननी चाही. वह हमारे छोटे शहर की कल्‍पना की वास्‍तविकता नहीं हो सका. हज़ार के नोट का जो रोमांच है वह सौ डॉलर की पत्‍ती नहीं जगा सकती. जगायेगी तब यह शहर क्‍या हो जाएगा?...

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शहर के आऊटस्‍कर्ट पर बापी मिल जाता है (बापी के घर में दो अमरुद के पेड़ थे, एक जामुन का. रेडियो, ट्रांजिस्‍टर, बंगला की किताबें और पत्रिकाएं थीं. और बापी की उदार मां सब पर हमारा बराबर का दावा स्‍वीकार करती थीं. बापी के पिता के रिटायरमेंट और अकाल मृत्‍यु से वह संबंध भी छूट गया. मेरे घर लौटने पर बापी इसी तरह कभी अचानक सड़क पर टकरा जाता है). पूछता हूं उसके धंधे-पानी की क्‍या ख़बर है, उदित नगर वाली दुकान कैसी चल रही है. बापी सिर खुजाता बताता है रायपुर की एक पार्टी के यहां बीस-पचीस हज़ार फंसा है, बाकी बुरा नहीं. नयी ख़बर यह है कि भाईयों से अलग होकर छेंड में किराये के मकान में रहने लगा है. पत्‍नी की किचकिच और भाईयों का रोना खत्‍म करने का यही रास्‍ता था. सब यही तो चाहते हैं अपने-अपने में सुखी रहें. फिर रहें सुखी. वह सुखी है. अच्‍छा है मुझसे मेरे सुख की बापी नहीं पूछता क्‍योंकि मेरे लिए बताना मुश्किल होगा कि मैं भूल गया हूं सुखी कैसे होते हैं.

बिशाखा सुखी रहना जानती थी. जब दु:ख होता तो सीधे कहती आई कांट टेक दिस. और एंड ऑव स्‍टोरी. मेरे साथ नहीं होता. मैं यहां और वहां दोनों में उलझा रहता हूं. किसी नतीजे तक आते-आते हमेशा देर हो जाती है. मां की बीमारी के वक़्त भी मैं ऐसी ही टाल-मटोल में फंसा रह गया. फिर ख़बर हुई हार्ट-अटैक में मां नहीं रही. सुनकर भरोसा नहीं हुआ था. अब भी घर में घूमते हुए लगता है कभी भी मां की आवाज़ सुन जायेगी. मासी कहती हैं आखिरी मर्तबा न मिलो तो यह अहसास सारे जीवन बना रहता है. दीदी अब भी यही समझती है मैंने जान-बूझकर देरी की थी. मैं दिखाना चाहता था सबसे अलग हूं, मुझमें मोह-माया नहीं है. मैं दीदी से बहस नहीं करता, चुपचाप दमे के बीच उसके चढ़ते गुस्‍से को सुनता हूं. वह मुझी से नहीं, अपने दोनों बेटों से, शहर के रंग-ढंग, पुराने अस्‍पताल के बदले हुए नये तेवरों से- हर चीज़ से परेशान है. थककर लेट जाती है तो मैं पूछता हूं पैर दबा दूं? दीदी कहती है इस उम्र में उससे मज़ाक न करूं. जिसकी दबा सकता था अंत समय में उसका तो मुंह देखने नहीं आया, दीदी को छेड़कर अब क्‍या पाऊंगा.

मैं किसी को छेड़कर कुछ नहीं पाना चाहता. चुपचाप सबके बीच एक अच्‍छे बच्‍चे की तस्‍वीर बने रहना चाहता हूं लेकिन अपने पहचाने शहर में, पैसों के अभाव में, अच्‍छा बने रहना क्‍या आसान है? मेरी ओर लहराकर पिता घड़ी का टूटा चेन बिछौने पर उछाल देते हैं, बुदबुदाकर कहते हैं- पांच दिनों से बंद पड़ी है. कहता हूं ठीक करवाओ मगर सब कान में रुई डालके बैठे हैं. रात में आंख खुल जाती है पता नहीं चलता क्‍या टाईम हो रहा है! दवाई के लिए प्रकाश से कह-कहके हार गया. जेब में फूटा छदाम नहीं रहता.. बोलता हूं मेरा पैसा बांधके हमको गांव भेज दो तो उस पर भी किसी का कान नहीं ठहरता!..

पिता के कमरे का पलास्‍तर उखड़ा हुआ है. आखिरी दफे पता नहीं कब चूना हुआ था. किसी के सामने पड़ने पर समय-असमय बड़बड़ाते रहते हैं. प्रकाश से पूछता हूं तो वह कहता है पचास-साठ के खर्चे की बात नहीं, बुड्ढे को हर बात की शिकायत है. वह इतना फालतू नहीं कि कापी-कलम लेके उनकी हर शिकायत नोट करता फिरे. उसे भी बहुत सारी चीज़ों की शिकायत है, वह किसके आगे अपना दुखड़ा रोने जाये? दीदी कहती है तुम सीधे हो तुम्‍हें उल्‍लू बनाते हैं. बीवी और सुख के पीछे बूढ़े को ये सब जीते-जी मार रहे हैं.

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मिताली कहती है मैं कभी दो दिन की छुट्टी लेकर उसके घर जमशेदपुर क्‍यों नहीं आता? मैं कहता हूं आऊंगा. वह पूछती है कब, मैं कहता हूं समय है. वह बुरा मानती है कि मैं कभी फोन भी नहीं करता, इतना बदल गया हूं. क्‍यों बदल गया हूं? दीपंकर और प्रकाश भी कभी कुछ नहीं बतलाते! टाटा इतनी बुरी जगह नहीं है वहां आके मुझे अच्‍छा लगेगा. मैं मुस्‍कराकर जवाब देता हूं जानता हूं. कभी आऊंगा, भई. मिताली कहती है कभी कब? यहां हो, अबकी ही क्‍यों नहीं चले चलते? सबु संगे देखा-सुना हेई जिब? मैं कहता हूं अभी कैसे जा सकता हूं? मिताली नाराज़ होकर कहती है क्‍यों नहीं जा सकते? ऐसा कौन काम अटका पड़ा है? तुम संगे किछि रिक्‍वेस्‍ट करीबार फायदा नाईं!

थोड़ी देर चुप रहकर मिताली से पूछता हूं पेंटिंग-वेंटिंग करती है या सब.. ? वह कुछ नहीं कहती. दूसरा सवाल- किताब-उताब? मिताली बच्‍चे की तरफ इशारा करके कहती है जब से आया है उसके बाद फुरसत कहां रहती है. फिर तुम्‍हारी तरह कोई पूछनेवाला भी तो नहीं रहा. जमशेदपुर में किताबें मिलती कहां हैं!

किताबें जुसेप्‍पे के घर मिलती थीं. जिस इच्छित किताब की खोज करो, देर-सबेर इतालवी नहीं तो उसका कोई फ्रेंच संस्‍करण हाथ लग ही जाता था. उसकी मां एनाउदी प्रकाशन के लिए काम करती थी. मैं हैरत करता जिस प्रकाशन के लिए चेज़रे पवेज़े ने काम किया, जुसेप्‍पे की मां वहां काम करती है! घर की दीवारों पर एक छोर से दूसरी छोर तक किताबें ही किताबें. मगर वे खाते-पीते मध्‍यवर्गीय लोग थे. अंद्रेया उनकी तरह संपन्‍न नहीं था. काफी वर्ष घर खाली बैठा माथा धुनता रहा. घर का खर्चा कभी घूम-घूमकर थियेटर करनेवाली बीवी अंतोनेल्‍ला ने प्राथमिक स्‍कूल की नौकरी पकड़कर उठाने का जिम्‍मा लिया. बाद में अंद्रेया ने अपने लिए बढ़ईगीरी चुन ली. घर से लगा हुआ वर्कशॉप. मिलान में नहीं, प्‍यामोंते के देहात में. मगर उसके यहां भी किताबों से भरी अलमारियां गंजी थीं. प्‍लेखानोव, दांते, गेटे, पज़ोलिनी, कुंदेरा, नोबोकोव. दीवार पर बोतिचेल्‍ली की पेंटिंग. पत्‍नी स्‍कूल से वापस लौटकर हंसती कॉफ़ी तैयार करती. छोटा बेटा वॉयलिन बजाता. मैं हैरत करता इनकी दुनिया में सब ऐसे सुगम क्‍यों है, जबकि हमारे छोटे शहर में इन किताबों, ऐसी अलमारियों का धुंआ तक नहीं पहुंचा! पिता ऐसी किताबों से ठंसी अलमारियों को देखकर क्‍या सोचते? शायद वह इनके आगे खड़े होकर फ़ोटो खिंचाने के ख़्याल तक से नर्वस होने लगते!

अनिता जब भी मुझसे मिलने आती, अपने साथ किताबों का एक बंडल लाती. मैं सब कुछ भूलकर देखता क्‍या-क्‍या किताबें हैं, फिर छोटे बच्‍चे की तरह सिर उठाकर कहता जब बूढ़ा हो जाऊंगा तब भी तुम मेरे लिए इसी तरह किताबें लाती रहना. मेरे बालों को हल्‍के-से झिंझोड़कर अनिता मंजूरी में सिर हिलाती. मैं पता नहीं उत्‍साह में कैसी-कैसी बकवास करता किताबें व्‍यवस्थित करने लगता. उन्‍हें एक सिस्‍टेमैटिक क्रम में रखकर ज़रा पीछे हटकर देखने तक मुझे चैन नहीं पड़ता, जबकि बिशाखा को बिस्‍तरे पर, किचन में कहीं भी किताब छोड़ देने की आदत थी. बिशाखा की इस आदत पर मैं कई बार दु:खी होता. वह कहती तुम बिना बात दु:खी होते रहते हो. जबकि बचपन के घर का दु:ख ज़्यादा बड़ा व ज़्यादा मार्मिक था. वहां किताबों को व्‍यवस्थित करने की बात ही नहीं थी. किताबें ही नहीं थीं. पिता कभी-कभी अख़बार पढ़ते दिखते लेकिन प्रकाश और दीपंकर कुछ भी नहीं पढ़ते. चबूतरे पर छुटी मेरी किताबों को प्रकाश जिज्ञासावश भी उठाकर नहीं देखता. उसके लिए जैसे उनका अस्तित्‍व ही नहीं था. बाहर जामुन की छांह में कुर्सी पर उठंगे हुए किसी के चले आने पर कभी मुझे भी अपना पढ़ना अजीब लगता, मानो हाथ में किताब लिये मैं अपने किताबमय से उनके किताबहीन का अपमान कर रहा होऊं. किसी के चले आते ही किताब अर्थहीन हो जाते. सुभाष परिडा, बाबुन और किसी जापानी, तुर्की लेखक की साथ उपस्थिति की कोई संगति ही न बनती...

अन्‍य चीज़ों की ही तरह शायद किताबों का भी एक अनुकूल भूगोल होता हो. कहीं की हवा उनके माफिक होती हो जहां वे फल-फूल सकती हैं, और कहीं किसी को उनकी कोई चाहना नहीं. जैसे मेरे बचपन के इस बेमतलब-से शहर में...

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हालांकि चारों ओर पहाड़ि‍यों और दोनों छोरों पर दो नदियों से घिरे इस शहर की दूसरी विशेषताएं हैं. मेरे लिए हैं. ओड़ि‍सा में पैदा हुए जन्‍म से बिहारी होने के बावजूद हैं. शायद इसीलिए पैदा होने की ज़मीन के किस्‍सों को इतना गाया जाता है. कुछ तो बात होती होगी. पीठ पर दुनिया-जहान का सारा परायापन लादे रहने के बावजूद इसीलिए यहां उतरता हूं, जिस किसी भी तरह की ठेस लगे, अपनापा भी उतनी ही अंतरंगता से छाती में उतरता है. स्‍टेशन के बाहर की महक, काली दीवारों के गिर्द की गंदगी, पुराने चिपके पोस्‍टरों की छपाई, उनका चिथड़ापन सब पहचाने लगते हैं. रिक्‍शेवाला का पैसों को लेकर चिकचिक ठग लिये जाने का भाव नहीं जगाता. सिंघड़ा, लुची, पूजा के सामान, सस्‍ते कपड़ों की दुकानों के बीच से गुजरते हुए लगता है मैं यही से निकला हूं, खामियों व अच्‍छाइयों से टंकी मेरी शख्‍सीयत की नींव इसी दुनिया ने तैयार की है! ज़मीन की मिट्टी, वन‍स्‍पतियों का रंग, बुनावट सब मेरे खून में रचे-बसे हैं, कहीं भी चला जाऊं, कितना भी घूम आऊं, अपनी मांस-मज्‍जा में उनकी बसावट को कैसे अलग कर सकूंगा?...

कभी-कभी लगता है हो गई घुमाई, मिल गए जीवनानुभव. नहीं बनना था सो नहीं बना अपना घर. नहीं सजायी जा सकीं उस आदर्श घर में वह अपनी आदर्श किताबों की अलमारियां, तब? व्‍यक्ति जीवन को व्‍यर्थ बीता मान ले? सब अकारथ गया, इस तरह? इतना निर्मम? खुद को ऐसा सोचते सोचकर भय होता है. सामाजिकता के पारंपरिक अर्थों में असफल व्‍यक्ति अपने प्रति ज़रा उदार भी न हो तब तो रोज़-रोज़ का जीना भारी जंजाल हो जाये! भारी जंजाल क्‍यों बनाये रहता हूं? इतना सोचने की क्‍या ज़रूरत है, क्‍यों ज़रूरत है? घर नहीं हुआ, अलमारी न हुई, जीवन के बाकी तमाशे तो हुए. कुछ अच्‍छे हुए, कुछ बुरे. फिर इतने बुरे भी क्‍या हुए? और अभी कौन जानता है कि अलमारी नहीं ही आयेगी? हो सकता है आये, इसी अपने बचपन के शहर में आये, सबसे अच्‍छी लकड़ी और ऐसी कारीग़री में आये जैसा आज के पहले इस शहर में किसी ने देखा न हो! मेरी सारी किताबों को इतनी लंबी लाचारी के बाद अंतत: कहीं पैर टिकाने की जगह, ढंग से सांस लेने का अवकाश दे. क्‍यों नहीं हो सकता? एक दिन आयेगी अलमारी, सबसे खूबसूरत, जुसेप्‍पे के घर की या अंद्रेया के हाथवाली उसमें उन्‍नत मुल्‍कों की नफ़ासत न हो फिर भी वह गरीबी की चमकीली कला-कौशल की ज़हीन व सबको दंग कर देनेवाली अलमारी होगी! ज़रूर होगी, क्‍यों न होगी?

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एनजीओ के एक छोटे फ़ि‍ल्‍म के शोध के सिलसिले में चाईबासा पहुंचा हूं. अनजानी जगह, अजाना मौसम, किसी को जानता नहीं और जिसका रेफरेंस लेकर आया था वह शहर में नहीं. दो घंटों में मन उचट जाता है. सब तरफ गरीबी और थकान दिखती है. छोटे-छोटे लोग, छोटी-छोटी ज़िंदगी. आदिवासी आदिवासी. ऐसा नहीं कि इसके पहले गाढ़े रंग नहीं देखे, गरीबी नहीं देखी मगर इतनी मात्रा में देखकर बेचैनी होने लगती है. ऐसी जगह खाने की साफ़-सुथरी जगह कहां होगी. कैसे होगी? बिसलेरी? धुली चादर वाला कोई होटेल? कोई ढंग का होटेल होगा? किसके लिए होगा?

यहां तक पहुंचने का सारा उद्यम व्‍यर्थ और मूर्खतापूर्ण लगने लगता है. ऐसे झमेलों में क्‍यों फंसता हूं... हमेशा फंसता हूं. फ़ि‍ल्‍म और शोध की बात भूलकर चिंता करने लगता हूं बिना पोस्‍टर छपवाये यहां से जल्‍दी निकलने की कैसे सूरत बने. रिक्‍शेवाले को एक सड़क पर मुड़ने को कहता हूं, वह मेरी बात नहीं समझता, नाक की सीध में चलता चला जाता है! ऐसी कितनी जगहें होंगी जहां सरल संवाद तक असंभव है और दिल्‍ली में तरक्‍की का हल्‍ला होता रहता है. पढ़ाई की दुनिया होगी इन आदिवासियों के बीच? क्‍या पत्रिकायें आती होंगी यहां? किताबें?... क्‍यों दिमाग का बोझ बढ़ा रहा हूं? क्‍या करना है मुझे चाईबासा का?

खाने को होटल नहीं मिलता, एक पुराने चर्च के बड़े अहाते के बाहर फ्रांसिस टोप्‍नो मिल जाते हैं. मेरी मुश्किल सुनने और उसका समाधान सोच पाने से हारकर अंतत: सकुचाते हुए सुझाते हैं कि मेरा खाना उनका जिम्‍मा. मगर उसके पहले तय होता है मुझे सुनील टिग्‍गा से मिलवाने ले चलेंगे. फ़ादर टोप्‍नो की राय में चाईबासा संबंधी कोई भी शोध सुनील से मिले बिना अधूरी है. उत्‍साही बच्‍चा है, लोगों से मिलता रहता है. जब देखो रांची-दिल्‍ली करता रहता है. कागज़-बही मेंटेंन करता है. ढेरों कहानियां हैं उसके पास. कहानियां! कागज़-बही मेंटेन करता है कि हॉलैण्‍ड और जर्मनी की एजेंसियों को किसी एनजीओ के लैटरहेड पर मददनामा भेजकर पैसों की वसूली कर सके? कागज़-बही मेंटेन करने की शिक्षा पाकर यहां के आदिवासियों ने रोजग़ार का यही तरीका सीखा है? फ़ादर फ्रांसिस टोप्‍नो से अब तक कुछ चिढ़ होने लगी है, उनसे ऐसा ही कुछ आक्रामक प्रश्‍न करना चाहता हूं. मुंह से सवाल निकलता है- मिस्‍टर सुनील टिग्‍गा किस एनजीओ के लिए काम करते हैं?

- एनजीओ? नहीं, सुनील एनजीओ में नहीं, फ़ादर हंसते हुए जवाब देते हैं, सेकेंडरी स्‍कूल में टीचर है!

सुनील के तीन कमरों के छोटे-से घर पहुंचकर और बाहर खेलते हुए छोटे अधनंगे बच्‍चे से जानकर खुशी होती है कि पापा घर पर नहीं है. अच्‍छा है, व्‍यर्थ के प्रवचन से बचना होगा. फ़ादर की दया से जो भी खाने को हाथ लगे, खाकर चुपचाप इस मनहूस जगह से गायब हो जाना चाहता हूं. असमंजस में अटके फ़ादर से निकल चलने का मैं ऐसा ही कुछ इशारा करता हूं, कि तभी परदा उठाकर सुनील की पत्‍नी नमस्‍ते में हाथ जोड़े बाहर आती है. छींट के हरे रंग की सस्‍ती साड़ीवाली औरत आने का हमारा मक़सद जानकर कहती है सुनीलजी लौटते ही होंगे, हम अंदर चलकर इंतज़ार करें. चाय पियेंगे? फ्रांसिस हंसता हुआ मिसेज़ सुनील के पीछे सामनेवाले दरवाज़े की ओर बढ़ता है. अजीब आदमी है, मेरी राय पूछने की ज़रुरत भी नहीं महसूस की. थका हुआ पीछे-पीछे जाता हूं. क्‍यों जा रहा हूं? क्‍या जानना है मुझे इस हरे रंग की साड़ीवाली औरत के घर के मनहूस अंधेरे में?..

परदा उठाकर कमरे में घुसते ही मैं एक अपहचाने भाव में जड़ हो जाता हूं. सुनील की पत्‍नी घर के कंजास के लिए क्षमा मांगते हुए हमें कुर्सियों की ओर निकलने का इशारा करती है- सब उन्‍हीं का ‘कचड़ा’ है, घर को म्‍यूजियम बना दिये हैं!

सहारे के लिए कोने की एक मेज़ थामे मैं हतप्रभ अपनी जगह जड़ खड़ा रहता हूं. यह कैसे संभव है? आदिवासियों के अशिक्षित यहां इस बियाबान, उजाड़लोक में? लेकिन संभव है जभी तो दिख रहा है! मेज़, फ़र्श, बेंत की खूबसूरत, नक्‍काशीदार अलमारियों में सब तरफ किताबें ही किताबें भरी हैं. पुरानी, नयी, काले ज़ि‍ल्‍दों में, हार्डबाउंड. जहां किताबें नहीं हैं वहां पुराने फ़ाईल्‍स हैं, दूसरे कागज़-पत्‍तर हैं. और बेंत की जो नक्‍काशीदार अलमारियां दिख रही हैं, ऐसी इतनी खूबसूरत मैंने पहले देखी नहीं! रोम, वेनिस, लंदन में भी नहीं!

(* प्रियंकर की फ़रमाइश पर कुछ सच और काफी झूठ यह साहित्यिक संस्‍मरण पिछले वर्ष दिसम्‍बर में कभी लिखा गया था. ढेर सारे संपादन के साथ 'समकालीन सृजन' में छपकर अभी थोड़े वक़्त पहले बाहर आया है. अब चूंकि ब्‍लॉग पर इन दिनों में कोई गुडई या 'भलई' कर नहीं रहा, साहित्यिक ऑर अदरवाइस, तो इस छपे टुकड़े को ठेलने के मोह से बच न सका. जिन्‍हें दिलचस्‍पी होगी वे एक नज़र मार लेंगे, जिन्‍हें न होगी वह मुझे माफ़ करेंगे. इतने सारे संपादन के लिए प्रियंकर को मैंने माफ़ किया ही..)

Tuesday, September 2, 2008

एंड ऑफ़ डेज़..

मुश्‍क़ि‍लें इतनी बढ़ीं कि आसां हो गयीं. चचा के ठीक-ठीक यही शब्‍द नहीं हैं, मगर इसके आसपास ही होंगे. वैसे ही जैसे बीच-बीच में हमें मुग़ालता होता है कि मुश्‍क़ि‍लें हमसे दूर चली जा रही है, मगर फिर जल्‍दी ही यह भी ख़बर हो जाती है कि नहीं जितनी दूर गयी है उतनी ही आसपास भी है. जैसे वहीदा रहमान और बबिता हैं. कहनेवाले कहते ही रहते हैं कितनी दूर चली गयी हैं, मगर महसूसनेवाले हम यह भी जानते हैं कि कितनी पास हैं. इट्स ऑल क्‍वेश्‍चन ऑफ़ परसेप्‍शन, ऑर लुकिंग एट थिंग्‍स विथ् ए सर्टेन बेंट ऑफ़ माइंड. ऑर हेड. ऑर हेडिंग टुवर्ड्स ए सर्टेन फ़ीलिंग ऑफ़ ग्‍लूम एंड डूम.

ख़ैर, इससे पहले कि मैं बहुत-बहुत-बहुत दूर जाकर पास आऊं, बेहतर है मैं आसपास के रेंज में रहते हुए ही आपको पास दूं. मुश्‍क़ि‍लों की कह रहा था. कि बढ़ीं, बढ़ीं, बढ़ीं. घुसकर, फंसकर, चिपककर, यहां फंदा लगाकर वहां से निकलकर, चिथड़े कर दीं, फटकर फाड़ दिया एंड देन गॉड नॉज़ व्‍हाट. मतलब पलक झपकते में क्‍या-क्‍या हो जाता है, और लगता है सीता सिद्धार्थ के साथ भाग गयी तो ज़मीन खिसकने के बाद पता नहीं और क्या-क्‍या सरक गया फिर देखते-देखते लगता है कि नहीं, कहां कुछ दरका है. एवरिथिंग इज़ एज़ स्‍टुपिड एज़ इट ऑल्‍वेज़ वॉज़, एंड फूल्‍स आर सिंगिंग देयर फुलिश सॉंग्‍स एंड इं‍डल्जिंग इन देयर फार्ट्स एंड फेटिशेस, एंड गेटिंग आल द क्‍लैप्‍स देयर डंबविट् कैन हैंडल.. मैं घबराकर सोचने लगता हूं कि मुश्‍क़ि‍लें बढ़ीं, फिर अदबदाकर साथ ही इस नतीजे पर भी पहुंच जाता हूं कि कहां बढ़ी, सिर्फ़ आसां हुई हैं!

जैसे बीच-बीच में ख़्याल आता है कि ऐसी कोई नज़्म लिख दें कि समूचे प्राग में पहले सनसनी की एक लहर दौड़े, फिर शहर में तीस की उम्र की सब औरतों के सुर्ख़ चेहरों पर इक गहरा रुमान शाया हो जाये. या फिर ऐसा कोई मज़मून लिख दें कि ब्राजील में सरकार हिल जाये, फिर ठीक-ठाक तरीके से हिलती रहने के बाद गिर भी जाये, और मैं किसी सितारे की तरह ब्राजील के आसमान में चमकता हुआ पेरू की पहाड़ि‍यों में उतर जाऊं. लेकिन दिक़्क़त यही है कि ऐसी सनकबाज हसरतें बढ़कर, पता नहीं कैसी बेलों पर चढ़कर अंतत: कहां पहुंचेंगी? प्राग की हसीनाओं और ब्राजील के बलहारों को खामख़्वाह बेदम करेंगी और मुझे एक अननेसेसरी सेंसुअस मिशन देकर एक फ़ॉल्‍सीफाइड सेंस ऑफ़ मिशनरी ज़ील देंगी. कहने का मतलब मुश्‍क़ि‍लें देंगी, जिसका एक और इकलौता सुखद अंत यही हो सकेगा कि वे अदबदाकर फिर आसां हो जायें!

माने सोचनेवाली बात है कि आख़ि‍र चिरकुटों की सभा में आदमी किस ज़बान में बोले? और बोलने पर आन ही पड़े तो मुंह ही से बोले या देह के अन्‍य रंध्रों से स्‍वर-संध्‍या निष्‍णात करे (या उत्‍पात. व्‍हाटेवर) ? कौन जोकर प्‍लंडरर और ब्‍लंडरर हैं जो ये चिल्‍ल-चिल्‍ल खिल-खिल करते खुद को रोज़ पता नहीं किन खामख़यालियों में भरते हैं. मरने को जीवन कहते हैं, और रोज़ जीते हैं. मतलब मरते हैं?..

चचा की सही पंक्ति पता नहीं क्‍या थी मगर कुछ ऐसी ही थी (होनी ही चाहिये) कि मुश्‍क़ि‍लें इतनी बढ़ीं कि आसां हो गयीं!..

आपकी आड़ में उड़ीसा का अत्‍याचार छुपा
आपकी दो अंगुल का कपार, बिहार का बाढ़
छुपा. होती रही फिचकुरी कितनी तो दहाड़
बेमतलब हुई ज़िंदगियां, हाड़ का अंबार छुपा.