Tuesday, September 2, 2008

एंड ऑफ़ डेज़..

मुश्‍क़ि‍लें इतनी बढ़ीं कि आसां हो गयीं. चचा के ठीक-ठीक यही शब्‍द नहीं हैं, मगर इसके आसपास ही होंगे. वैसे ही जैसे बीच-बीच में हमें मुग़ालता होता है कि मुश्‍क़ि‍लें हमसे दूर चली जा रही है, मगर फिर जल्‍दी ही यह भी ख़बर हो जाती है कि नहीं जितनी दूर गयी है उतनी ही आसपास भी है. जैसे वहीदा रहमान और बबिता हैं. कहनेवाले कहते ही रहते हैं कितनी दूर चली गयी हैं, मगर महसूसनेवाले हम यह भी जानते हैं कि कितनी पास हैं. इट्स ऑल क्‍वेश्‍चन ऑफ़ परसेप्‍शन, ऑर लुकिंग एट थिंग्‍स विथ् ए सर्टेन बेंट ऑफ़ माइंड. ऑर हेड. ऑर हेडिंग टुवर्ड्स ए सर्टेन फ़ीलिंग ऑफ़ ग्‍लूम एंड डूम.

ख़ैर, इससे पहले कि मैं बहुत-बहुत-बहुत दूर जाकर पास आऊं, बेहतर है मैं आसपास के रेंज में रहते हुए ही आपको पास दूं. मुश्‍क़ि‍लों की कह रहा था. कि बढ़ीं, बढ़ीं, बढ़ीं. घुसकर, फंसकर, चिपककर, यहां फंदा लगाकर वहां से निकलकर, चिथड़े कर दीं, फटकर फाड़ दिया एंड देन गॉड नॉज़ व्‍हाट. मतलब पलक झपकते में क्‍या-क्‍या हो जाता है, और लगता है सीता सिद्धार्थ के साथ भाग गयी तो ज़मीन खिसकने के बाद पता नहीं और क्या-क्‍या सरक गया फिर देखते-देखते लगता है कि नहीं, कहां कुछ दरका है. एवरिथिंग इज़ एज़ स्‍टुपिड एज़ इट ऑल्‍वेज़ वॉज़, एंड फूल्‍स आर सिंगिंग देयर फुलिश सॉंग्‍स एंड इं‍डल्जिंग इन देयर फार्ट्स एंड फेटिशेस, एंड गेटिंग आल द क्‍लैप्‍स देयर डंबविट् कैन हैंडल.. मैं घबराकर सोचने लगता हूं कि मुश्‍क़ि‍लें बढ़ीं, फिर अदबदाकर साथ ही इस नतीजे पर भी पहुंच जाता हूं कि कहां बढ़ी, सिर्फ़ आसां हुई हैं!

जैसे बीच-बीच में ख़्याल आता है कि ऐसी कोई नज़्म लिख दें कि समूचे प्राग में पहले सनसनी की एक लहर दौड़े, फिर शहर में तीस की उम्र की सब औरतों के सुर्ख़ चेहरों पर इक गहरा रुमान शाया हो जाये. या फिर ऐसा कोई मज़मून लिख दें कि ब्राजील में सरकार हिल जाये, फिर ठीक-ठाक तरीके से हिलती रहने के बाद गिर भी जाये, और मैं किसी सितारे की तरह ब्राजील के आसमान में चमकता हुआ पेरू की पहाड़ि‍यों में उतर जाऊं. लेकिन दिक़्क़त यही है कि ऐसी सनकबाज हसरतें बढ़कर, पता नहीं कैसी बेलों पर चढ़कर अंतत: कहां पहुंचेंगी? प्राग की हसीनाओं और ब्राजील के बलहारों को खामख़्वाह बेदम करेंगी और मुझे एक अननेसेसरी सेंसुअस मिशन देकर एक फ़ॉल्‍सीफाइड सेंस ऑफ़ मिशनरी ज़ील देंगी. कहने का मतलब मुश्‍क़ि‍लें देंगी, जिसका एक और इकलौता सुखद अंत यही हो सकेगा कि वे अदबदाकर फिर आसां हो जायें!

माने सोचनेवाली बात है कि आख़ि‍र चिरकुटों की सभा में आदमी किस ज़बान में बोले? और बोलने पर आन ही पड़े तो मुंह ही से बोले या देह के अन्‍य रंध्रों से स्‍वर-संध्‍या निष्‍णात करे (या उत्‍पात. व्‍हाटेवर) ? कौन जोकर प्‍लंडरर और ब्‍लंडरर हैं जो ये चिल्‍ल-चिल्‍ल खिल-खिल करते खुद को रोज़ पता नहीं किन खामख़यालियों में भरते हैं. मरने को जीवन कहते हैं, और रोज़ जीते हैं. मतलब मरते हैं?..

चचा की सही पंक्ति पता नहीं क्‍या थी मगर कुछ ऐसी ही थी (होनी ही चाहिये) कि मुश्‍क़ि‍लें इतनी बढ़ीं कि आसां हो गयीं!..

आपकी आड़ में उड़ीसा का अत्‍याचार छुपा
आपकी दो अंगुल का कपार, बिहार का बाढ़
छुपा. होती रही फिचकुरी कितनी तो दहाड़
बेमतलब हुई ज़िंदगियां, हाड़ का अंबार छुपा.

5 comments:

  1. मुश्किलें इतनी बढ़ी की आसां हो गयी ......चचा बजा फरमाते है सर जी.....

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  2. वाकई मुश्किलें हैं कि कितना भी सोचें कि दूर चली गई हैं पर फिर भी पास-पास ही मिलती हैं। एंड ईवन आय थिंक इट्स आल क्वेश्चन आफ परसेप्शन

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  3. गुरूजी,... (इसलिए कह रहा हूँ कि आपको कई लोग कहते हैं)

    आपजो जलेबी छान रहे हैं यानि जो लिख रहे हैं उसकी गहराई में डूबने से डरते हैं हम...। हमारे कपार में एक भौंरी है। बचपन में लोग बताते थे कि ऐसे लोग किसी जलधारा की भँवर की चपेट में आ जाँय तो डूब ही जाते हैं।

    इसलिए हम कोई रिस्क लिये बग़ैर ही फूट लेते हैं। माफ़ करें।

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  4. @सिद्धार्थ, माफ़ किया.

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