Thursday, September 4, 2008

किताबों की अलमारी

छुटपन के अपने शहर में लोगों के घरों में और चीज़ें दिखती, किताबों की अलमारी कभी नज़र नहीं आई. ज़्यादा घरों में एक-डेढ़ शेल्‍फ होता था जिस पर स्‍कूल की ज़रूरत की चीज़ें गंजी होतीं. किताबें ऐसी चीज़ थीं जो कभी-कभी दिखतीं. ऐसी तो वह कतई नहीं थीं कि उनके लिए अलमारी की दरकार पड़े. हालांकि कुछ लोग थे जिनका राजनीतिक चर्चा के बिना खाना नहीं पचता था. ऐसे लोग अख़बार पढ़ते. ओड़ि‍या, बांग्‍ला, अंग्रेजी. सुबह साढ़े नौ के बाद सामने और कैरियर पर पीछे बंडल लादे अख़बारवाले की साइकिल पर हिंदी पेपर नहीं होता. हिंदी के ‘आर्यावर्त’ या ‘हिंदुस्‍तान’ लाने के लिए साइकिल से स्‍टेशन जाना पड़ता था. सेक्‍टर सोलह के मद्रास कैंटीन के बाहर काउंटर पर अलबत्‍ता तमिल, तेलुगु और मलयालम की सजीली मासिक पत्रिकायें दिख जातीं. मगर किताबें गायब थीं. लोग पेपर पूछते, खोजते दिखते. किताबों का कोई नहीं पूछता.

संयोग ही रहा होगा कभी जो मैंने बिना खोजे पा लिया था. हमारे जाने-पहचाने परिचित भूगोल से बाहर, पुराने शहर में. अंदर गलियों के भीतर- रज़ाक टाकीज़ के अहाते की एक गुमटी में हिंद पॉकेट बुक्‍स के एक-एक रुपये वाले उपन्‍यास मिलते थे. देर तक दुकानवाले को दिक् करो, खुद खंगालो तब कहीं काम की कोई अच्‍छी चीज़ हाथ लगती थी. अलमारी का सुभीता और तहजीब नहीं थी.

मिश्रित आबादी वाले अपने उस छोटे इस्‍पाती शहर से बाहर निकल जाने और खुशी, तमाशे और लाचारी के ढेरों वर्ष गुजार चुकने के बाद जीवन में किताबों की अलमारी देखने का मौका बना. उनका महत्‍व, वर्गीय भेद, उनकी गहराई, रहस्‍यलोक, उनकी पहुंच का अंदाज़ा हुआ. उसके बाद समाज में मेरे घूमने, घरों की पहचान का वह एक ज़रूरी, प्रा‍थमिक हिस्‍सा हो गईं. किताब की अलमारियों की संगत में मैं सहज या असुविधाग्रस्‍त होता. अलग-अलग शहरों की याद में अलग-अलग घरों की वे किताबी अलमारियां होतीं जिनके बीच मैं खुश और उदास हुआ था. अनिता के साथ वेनिस, पेरुजा या अस्सिसी में घूमते हुए जब भी हम घर बसाने की योजनाओं पर बात करते, मैं चुपके-से अपने स्‍नेहिल एकांत में अपनी अलमारियों का सपना देखने से बच नहीं पाता. वह हमेशा मेरे साथ रहीं. कितने सारे कोमल सपने बने, टूटे, फिर खड़े हुए. उनके खड़ा होते ही सबसे पहले मैं अपनी अलमारी खड़ी करता. ऐसा नहीं कि मैं किताबों को लेकर विशेष भावुक होऊं (भावुक तो हूं ही!), मगर उनका खुद के आस-पास होना, उनकी व्‍यवस्‍था बहुत बेसिक चीज़ लगती थी. खाने और स्‍वस्‍थ्‍य रहने की तरह. किताबों की अलमारी से दूर रहते हुए लगता मैं सभ्‍यता से दूर रख दिया गया होऊं. अलमारी के अभाव में किताबों का जगर-मगर कहीं और टिका होना, या फिर उन्‍हें फ़र्श पर बिखरी देखकर लगता जैसे आज नहाना रह गया!

बिशाखा ने जब तय किया हमदोनों के साथ रहने का अब मतलब नहीं, और अपनी चीज़ें अलग करने लगी, मैंने कहा था किताबों के सिवा तुम जो चाहती हो, लेकर जाओ. बदमाश का इरादा मुझे दु:खी करने का नहीं था मगर किताबें सब उसीके साथ गईं. एक अलमारी भी. दूसरी वैसे भी मुझे कभी पसंद नहीं थी. उसकी दरारें देखकर अपने जीवन में दरारों का बोध होता. रखनी ही हो तो आदमी दरारोंवाली अलमारी क्‍यों रखे. मैं ऐसी चाहता था जैसी रोम, वेनिस और लंदन के घरों में देखीं और भूल नहीं पाया. किसी दिन चालाकी और जतन से ऐसी अलमारी चली आयेगी अपने पास, ऐसा मेरा सहज विश्‍वास था. मगर खोखले विश्‍वास की भावुकता से कहां चीज़ें आती हैं? और जहां तक चालाकी की बात है वह तो कभी भी मेरे काम आने से रही! अजीब बात है बिशाखा के जाने के बाद जीवन की झुंझलाहट, खीझ में किताबें कहां-कहां से इकट्ठा होती रहीं लेकिन अलमारियों के इंतज़ाम वाली बात धरी रह गई. मैं वह घर खड़ा नहीं कर सका जिसमें अपने मन के अनुरुप किताबों की अलमारियां खड़ी कर सकूं. बीच-बीच में अब यह भय भी होता है कि अलमारियों की व्‍यवस्‍थावाली बात शायद अब ऐसे ही रह जाये. जैसे खुद को कोई न दे सका, किताबों को भी टेक व ठौर देना न हो सके? सोचकर मन के अंदर गड्ढे हो जाते हैं, फिर गड्ढों को भूलकर जल्‍दी ही हंसने भी लगता हूं. जीवन क्‍या इतनी आसानी से खत्‍म होता है? किताबों की अलमारियां क्‍या इतनी आसानी से सपनों से गायब होती हैं? होने दी जा सकती हैं?...

***

बचपन के जिस पड़ोसी घर में पचीस-तीसेक किताबें दिख जाती थीं (हिंदी, अंग्रेजी नहीं. ओड़ि‍या), लम्‍बे अंतराल पर आया हूं तो अब कहीं किताब नहीं दिखती. मिताली का तीन साल का बच्‍चा ज़मीन पर लिसड़ता सिपाही के खिलौने से खेल रहा है. खेल और बच्‍चे के उत्‍साह की ज़द में आने की गरज से मैं बच्‍चे को ओड़ि‍या में चुमकारता हूं- मजा आ‍सुछि तS? ऐसे ही अन्‍य उल्‍टे-सीधे वाक्‍य. बच्‍चा ध्‍यान नहीं देता. खेल में व्‍यस्‍त है. मुझे लगता है मैं बच्‍चे से ज़्यादा उसकी मां को अपनी ओड़ि‍या सुनाने का खेल कर रहा हूं. रसोई में मेरे लिए चाय बनाती मिताली जवाब देती है- सब भूल गए हो तुम. भूला कहां हूं? रमाकांत रथ, जयदेब परिडा, गोपीदास महांति रैक पर रखी सब किताबों के कवर याद हैं. याद हैं? सिपाही के खिलौने की टांग टूटी हुई है. मेरे अंदर पता नहीं क्‍या टूटा है. मासी की बीमारी के पहले इस घर में कैसी रौनक रहती थी. अब मासी ज़्यादा वक़्त अंगुल गांव के घर में रहती हैं. यहां की देख-रेख करनेवाली मनोज की पत्‍नी में सबसे मेल का मासीवाला पुराना उत्‍साह नहीं. मुझे भी नमस्‍ते करने के बाद वह सीधे अंदर अपने कमरे में चली जाती है. मैं ओड़ि‍या बोलने की बेहुदी ज़ि‍द छोड़कर चुपचाप बच्‍चे को तकता बैठा रहता हूं.

जाने क्‍या है कि इस शहर के स्‍टेशन पर उतरते ही पता नहीं अब क्‍यों इतनी कातरता घर कर जाती है. हर चीज़- मिलना, देखना, कोई नज़र, छुटी हुई याद- सब किसी खेल का कार्य-व्‍यापार लगते हैं जिसका अंत मन के भीतर फिर कुछ दरकने, किसी टूटने में होता है. क्‍या बचा है अब मेरा इस शहर में? क्‍यों लौटकर आता हूं यहां? बतायेगा कोई? मिताली बतायेगी, व्‍हॉट डू आई कीप रिटर्निंग हियर फॉर? टू फाइंड व्‍हॉट दैट आई हैवंट फाउंड एनिव्‍हेयर एल्‍स?

किताबों से लगी रहनेवाली मिताली से मिलना बहुत वर्षों बाद हो रहा है. छुट्टि‍यों में भाई के पास घूमने आयी है. मनोज मेरे भाई का लंगोटिया यार है. पेंटिंग का रंग और पेंसिल पाने के झूठे वादों व लालच में अपनी एक सहेली की बड़ी बहन तक मिताली मेरी चिट्‍ठि‍यां पहुंचाया करती थी. लेकिन यह सब बहुत पहले की बात है (पता नहीं क्‍या लिखता रहा होऊंगा उन चिट्ठि‍यों में). छुटपन में शादी की बात की छेड़छाड़ करके कभी भी मिताली को रुलाया जा सकता था. अब तीन साल के बच्‍चे के साथ कितना चहक-चहक के सवाल कर रही है. भूली नहीं है कि मैं उसकी शादी में नहीं आया था. उसे बहलाने के लिए मैं याद दिलाता हूं कि मैं इसकी, उसकी किसी की शादी में कहां आया था! (नॉट ए बिग डील. आई एम नॉट शादी में चले आनेवाला टाइप. आई नेवर वॉज़..). एनीवे, शादी के बाद पहली मर्तबा मिलकर मिताली नाराज़ है. मेरे आगे ज़ाहिर करना उसे ज़रूरी लगता है. कहती है बहुत बदल गया हूं. क्‍यों इतना बदल गया हूं? ये सवाल, वो सवाल. ऐसे सवाल जिन्‍हें पूछते हुए स्‍वयं भी मुझे खुद से डर लगता है. मिताली को जवाब देता हूं इतना परेशान करोगी तो उठकर चला जाऊंगा. वह पलटकर कहती है मुझसे डरती नहीं. एक-एक बात का जवाब लेकर रहेगी. चला जाऊंगा तो पीछे-पीछे आएगी! लेकिन बातों के दमदम से अलग, मेरी असुविधा के बोध में दिखता है मिताली गुमसुम हो गई है. चाय का खाली कप उठाते हुए कहती है- भाई के पीछे चली आती हूं लेकिन अब यहां अच्‍छा नहीं लगता. पहलेवाली बात नहीं रही. एकदम वीरान जैसा लगता है. सब कहीं चले गए हों जैसे...

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एक वक़्त के बाद सब कहीं चले ही जाते हैं. जो बचे रहते हैं उन्‍हें भी कहीं चले जाने की छटपटाहट रहती है. नहीं तो धीरे-धीरे दुनिया उनके बचे होने को जैसे भूल जाती है. (अनिता से कितने समय से बात नहीं हुई. शायद फ़ोन नंबर भी नहीं मेरे पास. किताबों के बारे में हम कितनी बातें करते थे. कितनी किताबें हमने एक-दूसरे को पढ़ाईं! दो वर्ष पहले दिल्‍ली में किसी परिचित से पता चला अनिता तेहरान में है. मैं काफी समय तक इस कल्‍पना में दिमाग लड़ाता रहा कि तेहरान में किस तरह के घर, कैसी अलमारियों के बीच अनिता अपना जीवन चला रही होगी..) इस भुले हुए के बीच सुमन बीच-बीच में सिर उठाये अपने ‘स्‍प्‍लेंडर’ पर यहां से वहां गुजरता दिखता है- की दादा, तोमार छोबि-टोबि कखन देखते पाबो कि पारबो ना? मैं झेंप में नन-कमिटल सिर हिलाता हूं (मेरा सालों से बंबई में होना और इस बिना पर होना कि मैं फ़ि‍ल्‍मों में ‘कुछ’ करता हूं, बहुतों से बहुत समय तक इस तरह की जिज्ञासायें करवाता रहा. मेरे चेहरे की धुंध व नाकामी के किस्‍सों ने इसी तरह बंबई में रहने व फ़ि‍ल्‍मों से ‘जुड़े’ होने की बात भुलवा भी दी... मगर सुमन अब भी याद दिलाकर मुझ पर तंज करता है. हाथ में किताब लिये कहीं पढ़ता दिखूं तब भी वह बात फ़ि‍ल्‍मों की ही करता है. मेरे भटकाव की कहानियों से शायद उसे निजी तौर पर कहीं राहत पहुंचती है). बचपन में सुमन भोंदू था सब उसे लात लगाते थे. किन्‍हीं अर्थों में भोंदू वह अब भी बना हुआ है मगर पलटकर लात लगाने की कला उसने सीख ली है (पैसे बनाने की कला समझने कुछ वर्ष दिल्‍ली गुजारने के बाद चुपचाप वापस लौट आया था. उन दिनों की वह किसी से चर्चा नहीं करता. अलबत्‍ता दूसरे पीठ पीछे जब कहानियां बुनते हैं तो उन्‍हें हिन्‍दी में मां-बहन की टेढ़ी-मेढ़ी गालियां सुनाने से बाज नहीं आता. चोट खायी सुमन की मां सिर हिलाती है- सब सेखाने सिखेछे त, देल्‍ली जाबार आगे ऐइ रकोम कखनो कोथा बलतो की?). टिकना की चायवाली गुमटी पर वापस मुझे घेरकर सुमन सवाल करता है स्‍टॉक-उस्‍टॉक में मैंने कहीं पैसा लगाया है या नहीं. सिर हिलाकर मेरे इंकार करने पर निराशा में खुद सिर हिलाता, कि बंबई जैसे शहर में इस तरह खाली-छूछी ज़िंदगी जीकर मैं अच्‍छा नहीं कर रहा. पैसे-वैसे का खेल होना चाहिए. बड़ा खेल!

सुमन ही नहीं सबकी ज़बान पर पैसे की बात रहती है. इतने वर्षों में इस छोटे शहर में कितना कुछ बदल गया है. मुख्‍य शहर के समानंतर छेंड की एक अलग दुनिया खड़ी हो गई है. किताब की दुकान न खुली हो, इफरात में इमारतें खड़ी हुई हैं. और टिकना की धुंआती गुमटी से कम्‍यूनिटी सेंटर के सूने, उजाड़ उजास में सब कहीं हर कोई पैसे के बारे में जानना चाहता है. कलकत्‍ता में कितना बनता है दिल्‍ली में कितना. बंबई में? देश से बाहर की जिज्ञासायें नहीं खुलतीं. तापस, दिपांकर, सुभाष, एक्‍का जैसे काफी लड़के हालांकि अब देश से बाहर हैं. हाई स्‍कूल की टोप्‍पो आंटी का बेटा वॉशिंग्‍टन डीसी में है. मैट्रिक में दो बार फेल हुआ वेणु नायर हॉलैण्‍ड में कहीं है. उनकी वापसी पर हैरत के कुछ किस्‍से भले बुने जाते हों, स्‍थानीय चिंताओं व जिज्ञासाओं के विस्‍तार में वे स्‍थायी नहीं हो पातीं. पहले भी एक फूहड़ कौतुक से ज़्यादा योरप में बिताये मेरे दिनों की कभी बात किसी ने नहीं जाननी चाही. वह हमारे छोटे शहर की कल्‍पना की वास्‍तविकता नहीं हो सका. हज़ार के नोट का जो रोमांच है वह सौ डॉलर की पत्‍ती नहीं जगा सकती. जगायेगी तब यह शहर क्‍या हो जाएगा?...

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शहर के आऊटस्‍कर्ट पर बापी मिल जाता है (बापी के घर में दो अमरुद के पेड़ थे, एक जामुन का. रेडियो, ट्रांजिस्‍टर, बंगला की किताबें और पत्रिकाएं थीं. और बापी की उदार मां सब पर हमारा बराबर का दावा स्‍वीकार करती थीं. बापी के पिता के रिटायरमेंट और अकाल मृत्‍यु से वह संबंध भी छूट गया. मेरे घर लौटने पर बापी इसी तरह कभी अचानक सड़क पर टकरा जाता है). पूछता हूं उसके धंधे-पानी की क्‍या ख़बर है, उदित नगर वाली दुकान कैसी चल रही है. बापी सिर खुजाता बताता है रायपुर की एक पार्टी के यहां बीस-पचीस हज़ार फंसा है, बाकी बुरा नहीं. नयी ख़बर यह है कि भाईयों से अलग होकर छेंड में किराये के मकान में रहने लगा है. पत्‍नी की किचकिच और भाईयों का रोना खत्‍म करने का यही रास्‍ता था. सब यही तो चाहते हैं अपने-अपने में सुखी रहें. फिर रहें सुखी. वह सुखी है. अच्‍छा है मुझसे मेरे सुख की बापी नहीं पूछता क्‍योंकि मेरे लिए बताना मुश्किल होगा कि मैं भूल गया हूं सुखी कैसे होते हैं.

बिशाखा सुखी रहना जानती थी. जब दु:ख होता तो सीधे कहती आई कांट टेक दिस. और एंड ऑव स्‍टोरी. मेरे साथ नहीं होता. मैं यहां और वहां दोनों में उलझा रहता हूं. किसी नतीजे तक आते-आते हमेशा देर हो जाती है. मां की बीमारी के वक़्त भी मैं ऐसी ही टाल-मटोल में फंसा रह गया. फिर ख़बर हुई हार्ट-अटैक में मां नहीं रही. सुनकर भरोसा नहीं हुआ था. अब भी घर में घूमते हुए लगता है कभी भी मां की आवाज़ सुन जायेगी. मासी कहती हैं आखिरी मर्तबा न मिलो तो यह अहसास सारे जीवन बना रहता है. दीदी अब भी यही समझती है मैंने जान-बूझकर देरी की थी. मैं दिखाना चाहता था सबसे अलग हूं, मुझमें मोह-माया नहीं है. मैं दीदी से बहस नहीं करता, चुपचाप दमे के बीच उसके चढ़ते गुस्‍से को सुनता हूं. वह मुझी से नहीं, अपने दोनों बेटों से, शहर के रंग-ढंग, पुराने अस्‍पताल के बदले हुए नये तेवरों से- हर चीज़ से परेशान है. थककर लेट जाती है तो मैं पूछता हूं पैर दबा दूं? दीदी कहती है इस उम्र में उससे मज़ाक न करूं. जिसकी दबा सकता था अंत समय में उसका तो मुंह देखने नहीं आया, दीदी को छेड़कर अब क्‍या पाऊंगा.

मैं किसी को छेड़कर कुछ नहीं पाना चाहता. चुपचाप सबके बीच एक अच्‍छे बच्‍चे की तस्‍वीर बने रहना चाहता हूं लेकिन अपने पहचाने शहर में, पैसों के अभाव में, अच्‍छा बने रहना क्‍या आसान है? मेरी ओर लहराकर पिता घड़ी का टूटा चेन बिछौने पर उछाल देते हैं, बुदबुदाकर कहते हैं- पांच दिनों से बंद पड़ी है. कहता हूं ठीक करवाओ मगर सब कान में रुई डालके बैठे हैं. रात में आंख खुल जाती है पता नहीं चलता क्‍या टाईम हो रहा है! दवाई के लिए प्रकाश से कह-कहके हार गया. जेब में फूटा छदाम नहीं रहता.. बोलता हूं मेरा पैसा बांधके हमको गांव भेज दो तो उस पर भी किसी का कान नहीं ठहरता!..

पिता के कमरे का पलास्‍तर उखड़ा हुआ है. आखिरी दफे पता नहीं कब चूना हुआ था. किसी के सामने पड़ने पर समय-असमय बड़बड़ाते रहते हैं. प्रकाश से पूछता हूं तो वह कहता है पचास-साठ के खर्चे की बात नहीं, बुड्ढे को हर बात की शिकायत है. वह इतना फालतू नहीं कि कापी-कलम लेके उनकी हर शिकायत नोट करता फिरे. उसे भी बहुत सारी चीज़ों की शिकायत है, वह किसके आगे अपना दुखड़ा रोने जाये? दीदी कहती है तुम सीधे हो तुम्‍हें उल्‍लू बनाते हैं. बीवी और सुख के पीछे बूढ़े को ये सब जीते-जी मार रहे हैं.

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मिताली कहती है मैं कभी दो दिन की छुट्टी लेकर उसके घर जमशेदपुर क्‍यों नहीं आता? मैं कहता हूं आऊंगा. वह पूछती है कब, मैं कहता हूं समय है. वह बुरा मानती है कि मैं कभी फोन भी नहीं करता, इतना बदल गया हूं. क्‍यों बदल गया हूं? दीपंकर और प्रकाश भी कभी कुछ नहीं बतलाते! टाटा इतनी बुरी जगह नहीं है वहां आके मुझे अच्‍छा लगेगा. मैं मुस्‍कराकर जवाब देता हूं जानता हूं. कभी आऊंगा, भई. मिताली कहती है कभी कब? यहां हो, अबकी ही क्‍यों नहीं चले चलते? सबु संगे देखा-सुना हेई जिब? मैं कहता हूं अभी कैसे जा सकता हूं? मिताली नाराज़ होकर कहती है क्‍यों नहीं जा सकते? ऐसा कौन काम अटका पड़ा है? तुम संगे किछि रिक्‍वेस्‍ट करीबार फायदा नाईं!

थोड़ी देर चुप रहकर मिताली से पूछता हूं पेंटिंग-वेंटिंग करती है या सब.. ? वह कुछ नहीं कहती. दूसरा सवाल- किताब-उताब? मिताली बच्‍चे की तरफ इशारा करके कहती है जब से आया है उसके बाद फुरसत कहां रहती है. फिर तुम्‍हारी तरह कोई पूछनेवाला भी तो नहीं रहा. जमशेदपुर में किताबें मिलती कहां हैं!

किताबें जुसेप्‍पे के घर मिलती थीं. जिस इच्छित किताब की खोज करो, देर-सबेर इतालवी नहीं तो उसका कोई फ्रेंच संस्‍करण हाथ लग ही जाता था. उसकी मां एनाउदी प्रकाशन के लिए काम करती थी. मैं हैरत करता जिस प्रकाशन के लिए चेज़रे पवेज़े ने काम किया, जुसेप्‍पे की मां वहां काम करती है! घर की दीवारों पर एक छोर से दूसरी छोर तक किताबें ही किताबें. मगर वे खाते-पीते मध्‍यवर्गीय लोग थे. अंद्रेया उनकी तरह संपन्‍न नहीं था. काफी वर्ष घर खाली बैठा माथा धुनता रहा. घर का खर्चा कभी घूम-घूमकर थियेटर करनेवाली बीवी अंतोनेल्‍ला ने प्राथमिक स्‍कूल की नौकरी पकड़कर उठाने का जिम्‍मा लिया. बाद में अंद्रेया ने अपने लिए बढ़ईगीरी चुन ली. घर से लगा हुआ वर्कशॉप. मिलान में नहीं, प्‍यामोंते के देहात में. मगर उसके यहां भी किताबों से भरी अलमारियां गंजी थीं. प्‍लेखानोव, दांते, गेटे, पज़ोलिनी, कुंदेरा, नोबोकोव. दीवार पर बोतिचेल्‍ली की पेंटिंग. पत्‍नी स्‍कूल से वापस लौटकर हंसती कॉफ़ी तैयार करती. छोटा बेटा वॉयलिन बजाता. मैं हैरत करता इनकी दुनिया में सब ऐसे सुगम क्‍यों है, जबकि हमारे छोटे शहर में इन किताबों, ऐसी अलमारियों का धुंआ तक नहीं पहुंचा! पिता ऐसी किताबों से ठंसी अलमारियों को देखकर क्‍या सोचते? शायद वह इनके आगे खड़े होकर फ़ोटो खिंचाने के ख़्याल तक से नर्वस होने लगते!

अनिता जब भी मुझसे मिलने आती, अपने साथ किताबों का एक बंडल लाती. मैं सब कुछ भूलकर देखता क्‍या-क्‍या किताबें हैं, फिर छोटे बच्‍चे की तरह सिर उठाकर कहता जब बूढ़ा हो जाऊंगा तब भी तुम मेरे लिए इसी तरह किताबें लाती रहना. मेरे बालों को हल्‍के-से झिंझोड़कर अनिता मंजूरी में सिर हिलाती. मैं पता नहीं उत्‍साह में कैसी-कैसी बकवास करता किताबें व्‍यवस्थित करने लगता. उन्‍हें एक सिस्‍टेमैटिक क्रम में रखकर ज़रा पीछे हटकर देखने तक मुझे चैन नहीं पड़ता, जबकि बिशाखा को बिस्‍तरे पर, किचन में कहीं भी किताब छोड़ देने की आदत थी. बिशाखा की इस आदत पर मैं कई बार दु:खी होता. वह कहती तुम बिना बात दु:खी होते रहते हो. जबकि बचपन के घर का दु:ख ज़्यादा बड़ा व ज़्यादा मार्मिक था. वहां किताबों को व्‍यवस्थित करने की बात ही नहीं थी. किताबें ही नहीं थीं. पिता कभी-कभी अख़बार पढ़ते दिखते लेकिन प्रकाश और दीपंकर कुछ भी नहीं पढ़ते. चबूतरे पर छुटी मेरी किताबों को प्रकाश जिज्ञासावश भी उठाकर नहीं देखता. उसके लिए जैसे उनका अस्तित्‍व ही नहीं था. बाहर जामुन की छांह में कुर्सी पर उठंगे हुए किसी के चले आने पर कभी मुझे भी अपना पढ़ना अजीब लगता, मानो हाथ में किताब लिये मैं अपने किताबमय से उनके किताबहीन का अपमान कर रहा होऊं. किसी के चले आते ही किताब अर्थहीन हो जाते. सुभाष परिडा, बाबुन और किसी जापानी, तुर्की लेखक की साथ उपस्थिति की कोई संगति ही न बनती...

अन्‍य चीज़ों की ही तरह शायद किताबों का भी एक अनुकूल भूगोल होता हो. कहीं की हवा उनके माफिक होती हो जहां वे फल-फूल सकती हैं, और कहीं किसी को उनकी कोई चाहना नहीं. जैसे मेरे बचपन के इस बेमतलब-से शहर में...

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हालांकि चारों ओर पहाड़ि‍यों और दोनों छोरों पर दो नदियों से घिरे इस शहर की दूसरी विशेषताएं हैं. मेरे लिए हैं. ओड़ि‍सा में पैदा हुए जन्‍म से बिहारी होने के बावजूद हैं. शायद इसीलिए पैदा होने की ज़मीन के किस्‍सों को इतना गाया जाता है. कुछ तो बात होती होगी. पीठ पर दुनिया-जहान का सारा परायापन लादे रहने के बावजूद इसीलिए यहां उतरता हूं, जिस किसी भी तरह की ठेस लगे, अपनापा भी उतनी ही अंतरंगता से छाती में उतरता है. स्‍टेशन के बाहर की महक, काली दीवारों के गिर्द की गंदगी, पुराने चिपके पोस्‍टरों की छपाई, उनका चिथड़ापन सब पहचाने लगते हैं. रिक्‍शेवाला का पैसों को लेकर चिकचिक ठग लिये जाने का भाव नहीं जगाता. सिंघड़ा, लुची, पूजा के सामान, सस्‍ते कपड़ों की दुकानों के बीच से गुजरते हुए लगता है मैं यही से निकला हूं, खामियों व अच्‍छाइयों से टंकी मेरी शख्‍सीयत की नींव इसी दुनिया ने तैयार की है! ज़मीन की मिट्टी, वन‍स्‍पतियों का रंग, बुनावट सब मेरे खून में रचे-बसे हैं, कहीं भी चला जाऊं, कितना भी घूम आऊं, अपनी मांस-मज्‍जा में उनकी बसावट को कैसे अलग कर सकूंगा?...

कभी-कभी लगता है हो गई घुमाई, मिल गए जीवनानुभव. नहीं बनना था सो नहीं बना अपना घर. नहीं सजायी जा सकीं उस आदर्श घर में वह अपनी आदर्श किताबों की अलमारियां, तब? व्‍यक्ति जीवन को व्‍यर्थ बीता मान ले? सब अकारथ गया, इस तरह? इतना निर्मम? खुद को ऐसा सोचते सोचकर भय होता है. सामाजिकता के पारंपरिक अर्थों में असफल व्‍यक्ति अपने प्रति ज़रा उदार भी न हो तब तो रोज़-रोज़ का जीना भारी जंजाल हो जाये! भारी जंजाल क्‍यों बनाये रहता हूं? इतना सोचने की क्‍या ज़रूरत है, क्‍यों ज़रूरत है? घर नहीं हुआ, अलमारी न हुई, जीवन के बाकी तमाशे तो हुए. कुछ अच्‍छे हुए, कुछ बुरे. फिर इतने बुरे भी क्‍या हुए? और अभी कौन जानता है कि अलमारी नहीं ही आयेगी? हो सकता है आये, इसी अपने बचपन के शहर में आये, सबसे अच्‍छी लकड़ी और ऐसी कारीग़री में आये जैसा आज के पहले इस शहर में किसी ने देखा न हो! मेरी सारी किताबों को इतनी लंबी लाचारी के बाद अंतत: कहीं पैर टिकाने की जगह, ढंग से सांस लेने का अवकाश दे. क्‍यों नहीं हो सकता? एक दिन आयेगी अलमारी, सबसे खूबसूरत, जुसेप्‍पे के घर की या अंद्रेया के हाथवाली उसमें उन्‍नत मुल्‍कों की नफ़ासत न हो फिर भी वह गरीबी की चमकीली कला-कौशल की ज़हीन व सबको दंग कर देनेवाली अलमारी होगी! ज़रूर होगी, क्‍यों न होगी?

***

एनजीओ के एक छोटे फ़ि‍ल्‍म के शोध के सिलसिले में चाईबासा पहुंचा हूं. अनजानी जगह, अजाना मौसम, किसी को जानता नहीं और जिसका रेफरेंस लेकर आया था वह शहर में नहीं. दो घंटों में मन उचट जाता है. सब तरफ गरीबी और थकान दिखती है. छोटे-छोटे लोग, छोटी-छोटी ज़िंदगी. आदिवासी आदिवासी. ऐसा नहीं कि इसके पहले गाढ़े रंग नहीं देखे, गरीबी नहीं देखी मगर इतनी मात्रा में देखकर बेचैनी होने लगती है. ऐसी जगह खाने की साफ़-सुथरी जगह कहां होगी. कैसे होगी? बिसलेरी? धुली चादर वाला कोई होटेल? कोई ढंग का होटेल होगा? किसके लिए होगा?

यहां तक पहुंचने का सारा उद्यम व्‍यर्थ और मूर्खतापूर्ण लगने लगता है. ऐसे झमेलों में क्‍यों फंसता हूं... हमेशा फंसता हूं. फ़ि‍ल्‍म और शोध की बात भूलकर चिंता करने लगता हूं बिना पोस्‍टर छपवाये यहां से जल्‍दी निकलने की कैसे सूरत बने. रिक्‍शेवाले को एक सड़क पर मुड़ने को कहता हूं, वह मेरी बात नहीं समझता, नाक की सीध में चलता चला जाता है! ऐसी कितनी जगहें होंगी जहां सरल संवाद तक असंभव है और दिल्‍ली में तरक्‍की का हल्‍ला होता रहता है. पढ़ाई की दुनिया होगी इन आदिवासियों के बीच? क्‍या पत्रिकायें आती होंगी यहां? किताबें?... क्‍यों दिमाग का बोझ बढ़ा रहा हूं? क्‍या करना है मुझे चाईबासा का?

खाने को होटल नहीं मिलता, एक पुराने चर्च के बड़े अहाते के बाहर फ्रांसिस टोप्‍नो मिल जाते हैं. मेरी मुश्किल सुनने और उसका समाधान सोच पाने से हारकर अंतत: सकुचाते हुए सुझाते हैं कि मेरा खाना उनका जिम्‍मा. मगर उसके पहले तय होता है मुझे सुनील टिग्‍गा से मिलवाने ले चलेंगे. फ़ादर टोप्‍नो की राय में चाईबासा संबंधी कोई भी शोध सुनील से मिले बिना अधूरी है. उत्‍साही बच्‍चा है, लोगों से मिलता रहता है. जब देखो रांची-दिल्‍ली करता रहता है. कागज़-बही मेंटेंन करता है. ढेरों कहानियां हैं उसके पास. कहानियां! कागज़-बही मेंटेन करता है कि हॉलैण्‍ड और जर्मनी की एजेंसियों को किसी एनजीओ के लैटरहेड पर मददनामा भेजकर पैसों की वसूली कर सके? कागज़-बही मेंटेन करने की शिक्षा पाकर यहां के आदिवासियों ने रोजग़ार का यही तरीका सीखा है? फ़ादर फ्रांसिस टोप्‍नो से अब तक कुछ चिढ़ होने लगी है, उनसे ऐसा ही कुछ आक्रामक प्रश्‍न करना चाहता हूं. मुंह से सवाल निकलता है- मिस्‍टर सुनील टिग्‍गा किस एनजीओ के लिए काम करते हैं?

- एनजीओ? नहीं, सुनील एनजीओ में नहीं, फ़ादर हंसते हुए जवाब देते हैं, सेकेंडरी स्‍कूल में टीचर है!

सुनील के तीन कमरों के छोटे-से घर पहुंचकर और बाहर खेलते हुए छोटे अधनंगे बच्‍चे से जानकर खुशी होती है कि पापा घर पर नहीं है. अच्‍छा है, व्‍यर्थ के प्रवचन से बचना होगा. फ़ादर की दया से जो भी खाने को हाथ लगे, खाकर चुपचाप इस मनहूस जगह से गायब हो जाना चाहता हूं. असमंजस में अटके फ़ादर से निकल चलने का मैं ऐसा ही कुछ इशारा करता हूं, कि तभी परदा उठाकर सुनील की पत्‍नी नमस्‍ते में हाथ जोड़े बाहर आती है. छींट के हरे रंग की सस्‍ती साड़ीवाली औरत आने का हमारा मक़सद जानकर कहती है सुनीलजी लौटते ही होंगे, हम अंदर चलकर इंतज़ार करें. चाय पियेंगे? फ्रांसिस हंसता हुआ मिसेज़ सुनील के पीछे सामनेवाले दरवाज़े की ओर बढ़ता है. अजीब आदमी है, मेरी राय पूछने की ज़रुरत भी नहीं महसूस की. थका हुआ पीछे-पीछे जाता हूं. क्‍यों जा रहा हूं? क्‍या जानना है मुझे इस हरे रंग की साड़ीवाली औरत के घर के मनहूस अंधेरे में?..

परदा उठाकर कमरे में घुसते ही मैं एक अपहचाने भाव में जड़ हो जाता हूं. सुनील की पत्‍नी घर के कंजास के लिए क्षमा मांगते हुए हमें कुर्सियों की ओर निकलने का इशारा करती है- सब उन्‍हीं का ‘कचड़ा’ है, घर को म्‍यूजियम बना दिये हैं!

सहारे के लिए कोने की एक मेज़ थामे मैं हतप्रभ अपनी जगह जड़ खड़ा रहता हूं. यह कैसे संभव है? आदिवासियों के अशिक्षित यहां इस बियाबान, उजाड़लोक में? लेकिन संभव है जभी तो दिख रहा है! मेज़, फ़र्श, बेंत की खूबसूरत, नक्‍काशीदार अलमारियों में सब तरफ किताबें ही किताबें भरी हैं. पुरानी, नयी, काले ज़ि‍ल्‍दों में, हार्डबाउंड. जहां किताबें नहीं हैं वहां पुराने फ़ाईल्‍स हैं, दूसरे कागज़-पत्‍तर हैं. और बेंत की जो नक्‍काशीदार अलमारियां दिख रही हैं, ऐसी इतनी खूबसूरत मैंने पहले देखी नहीं! रोम, वेनिस, लंदन में भी नहीं!

(* प्रियंकर की फ़रमाइश पर कुछ सच और काफी झूठ यह साहित्यिक संस्‍मरण पिछले वर्ष दिसम्‍बर में कभी लिखा गया था. ढेर सारे संपादन के साथ 'समकालीन सृजन' में छपकर अभी थोड़े वक़्त पहले बाहर आया है. अब चूंकि ब्‍लॉग पर इन दिनों में कोई गुडई या 'भलई' कर नहीं रहा, साहित्यिक ऑर अदरवाइस, तो इस छपे टुकड़े को ठेलने के मोह से बच न सका. जिन्‍हें दिलचस्‍पी होगी वे एक नज़र मार लेंगे, जिन्‍हें न होगी वह मुझे माफ़ करेंगे. इतने सारे संपादन के लिए प्रियंकर को मैंने माफ़ किया ही..)

23 comments:

  1. ऐसे लगा जैसे किसी नाव पर बैठा कर लहरों पर घुमा लाये....
    A brilliant piece....!!

    पता नहीं क्या है जो साथ में अटक गया है...झटका भी नहीं जा रहा...कल ही किसी को कह रही थी आप बात नहीं भाव लिखते हैं...और बखूबी लिखते हैं....

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  2. acchey lagey...bhaav....kafi imaandar si post lagi...

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  3. शानदार पोस्‍ट। इससे ज्‍़यादा कुछ लिखना चाहती हूं लेकिन शब्‍द गुमे जाते हैं।

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  4. बाबू साब !

    यात्रा संस्मरण मांगा और टिका दिया संस्मरण . तब बेचारा संपादक क्या करेगा . बीन-बीन कर यात्रानुमा कुछ निकालेगा कि नहीं ? अपने प्रिय लेखक को कौन भकुआ संपादक छोड़ना चाहेगा . तो हमने बीन-बीन कर बना दिया 'बचपन का शहर : एक पुनर्यात्रा' . अलबत्ता चाईबासा के सुनील टिग्गा प्रसंग को छोड़ दिया जाना मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत खल रहा था . पर जिंदगी में ऐसी फांस और ऐसे अफ़सोस न हों तो ससुरी जिंदगी कैसी .

    पूरा संस्मरण डाल कर अच्छा काम किया है . रहा-बचा अपराधबोध दूर हो रहा है .

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  5. बेहतरीन...आनन्द आ गया.

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  6. खाने और स्‍वस्‍थ्‍य रहने की तरह. किताबों की अलमारी से दूर रहते हुए लगता मैं सभ्‍यता से दूर रख दिया गया होऊं. अलमारी के अभाव में किताबों का जगर-मगर कहीं और टिका होना, या फिर उन्‍हें फ़र्श पर बिखरी देखकर लगता जैसे आज नहाना रह गया!

    पूरी ईमानदारी से पढ़ ली साहब,
    भूमिका पर ही नज़र टिक गयी थी
    किताबों से सहज लगाव के कारण
    शीर्षक ने ही आकर्षित किया,
    फिर ऊपर आपका यह मंतव्य पढ़कर
    लगा कि पुस्तकों की ऐसी दीवानगी का
    ये किस्सा तो घर-घर तक पहुँचना चाहिए.
    ....सच एक-एक शब्द पढ़ गया...और मन
    प्रसन्न हो गया....आभार.
    ==================================
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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  7. काश , हम भी समकालीन सृजन जैसी पत्रिका निकालते जिसमें आपके सच्चे झूठे , साहित्यिक , निजी संस्मरण छापने की खुशी हम भी महसूस करते और हमारे आधा दर्जन बकलमखुद के आग्रहों को इज्जत भी मिल जाती।
    पर कहां हम , कहां शब्दों का सफर और कहां प्रमोद बाबू ,प्रियंकरजी !!!

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  8. @अजित लायन वडनेरकर साहब, बकलमखुद के बहाने इस तरह सार्वजनिक रोना-गाना कहीं से भी कोई जायज़ बात है? इतना लंबा यहां ठेल दिये, इसे देखकर घबराने की जगह आप हे बरमोद, हाय प्रीजंकर कर रहे हैं? ऐसे सुबुक से ही बच्‍चा लोग सबक लेगा?

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  9. बकलमखुद के बहाने इस तरह सार्वजनिक रोना-गाना कहीं से भी कोई जायज़ बात है?
    जे बहानेवाली बात खूब निकाली ! यानी आपको पता है कि हम रोना सुबकना चाहते हैं , पर बहान नहीं मिल रहा ? इधर ठेलने आ गए बहाने से ? किधर है हमारा दुखड़ा ? शिकायत दर्ज कराई तो दुखड़ा बता कर चुप कराने आ गए ? और जिस बकलमखुद की खातिर ये राग फैलाया है वो सार्वजनिक संपत्ति नहीं है का ? उसकी बात करने में शरम आनी चाहिए हमें ? आपने और अनामदासजी ने सार्वजनिक रूप से नहीं लिखा था....उसी की बात याद दिलाई है ...काश...पत्रिका ...प्रियंकरजी...प्रमोदबाबू...वगैरा वगैरा ....
    मजाक वजाक नहीं समझते हैं का ? ई बड़प्पन के छुहारे कब तक खिलाते रहेंगे हमें परभू ?
    बच्चा लोगन तो परमोद-गाथा पढ़कर ही न सबक लेगा ? ओही बात तो कह रहे हैं ।

    "शब्‍दों की टुटही नाव पर सवार, शब्‍दों की चौकन्‍नी रात में हूकता हूं, चीखता हूं, कोई सुलगती अगिन-लक़ीर कहां बनता हूं?.."

    ऐसा महंगा मत लिखिये बकलमखुद में, कुछ सस्ता ही लिखिये। पर क्यों लिखेंगे । हम कौनो साहित्यिक पत्रिका तो नहीं निकालते हैं न ...

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  10. बहुत दिनों के बाद ब्लॉगजगत में आकर आपको पढ़ने का मोह कैसे रोका जा सकता है....किताबों की अल्मारी की चाहत में हम पढ़ते गए...सपने पूरे हो या न हों...सपनों की दुनिया बेहद खूबसूरत होती है....बस यही खूबसूरती जीना आसान कर देती है...
    आप छपे टुकड़े को ठेलने का मोह रोक ना पाए और हम पढ़ने का.... आभार

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  11. आपकी बेहतरीन पोस्‍टों में से एक है ये। कई बार पढ़ा सुबह से अब तक। कई जगह दिल डूबने लगा तो कई जगह एकदम उम्‍मीद बंधी। किताब की अलमारी का ऐसा सफ़र आज से पहले कभी देखा सुना नहीं था। सचमुच शानदार पोस्‍ट।

    ................

    जीवन क्‍या इतनी आसानी से खत्‍म होता है? किताबों की अलमारियां क्‍या इतनी आसानी से सपनों से गायब होती हैं? होने दी जा सकती हैं?...
    और
    फिर भी वह गरीबी की चमकीली कला-कौशल की ज़हीन व सबको दंग कर देनेवाली अलमारी होगी! ज़रूर होगी, क्‍यों न होगी?

    कमाल।

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  12. 'बकलम खुद' आप नाहीं दिये . अउर ई वडनेरकर बाबू हमको टोहनिया-कुहनिया रहे हैं . हम तो कुच्छौ नाहीं बिगाड़े उनका . हम भी रिकमंड करता हूं कि उनको एक ठो 'आपबीती' दिया चाहे . सच्चा में झुट्ठा मिलाने का धतकरम को तो आप परफ़ेक्शनकारी कला बना ही दिए हैं . ई झुट्ठा का 'एलॉय' से आपका २४ कैरेट का माल बहुतै 'ड्यूरेबल' लखाता है .

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  13. शुक्रिया प्रियंकर भाई,
    प्रमोद बाबू की शरारतें कम नहीं हो रही हैं...ये हम समझते हैं...बचपन से ऐसे नहीं थे ये ...बाद में हुए हैं...अब बकलमखुद जब लिखेंगे तभी तस्दीक हो जाएगी सारी बातों की..

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  14. दुबारा बांचे इसे। पहली बार किताब में और दूसरी बार यहां। अच्छा लगा। अब इसमें कित्ता सच है और कित्ती मिलावट ये तो आप भी न बता पायेंगे फ़िर सवाल पूछना बेकार। वैसे आपकी दीदी आपके
    बारे में सही ही समझती होंगी- दीदी अब भी यही समझती है मैंने जान-बूझकर देरी की थी. मैं दिखाना चाहता था सबसे अलग हूं प्रियंकर जी के संपादन में निकली ये समकालीन सृजन बेहतरी्न निकली है।

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  15. प्रमोद मेरे घर भी आए थे। बेंत के सोफे पर बैठने से पहले किताबों की आलमारी में झांकने लगे। आलमारी छोटी थी इसलिए ज़मीन पर बैठ गए। इस संस्मरण को पढ़ते वक्त बार बार मेरी आलमारी और प्रमोद का बैठ कर देखना याद आते रहा। उस वक्त मालूम नहीं चला कि प्रमोद किताबों की इस आलमारी में अपने ख्वाबों का कोई मकान ढूंढ रहे हैं।

    ज़िंदगी के अनुभव भले ही अंदर से कचोटते हों लेकिन संस्मरण बन कर क्यों निखर जाते हैं समझ में नहीं आता। बहुत रोने का भी मन हुआ, उन लोगों को पुकारने का भी मन हुआ कि लौट आइये प्रमोद के यहां। कुछ किताबों के साथ,लाइब्रेरी बनाने के लिए।

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  16. प्रमोदजी,
    पढ़कर लबालब हूं। पानी हिलता है। काई धीरे-धीरे हटती है। अंदर कुछ परछाइयां आती-जाती दिखती हैं। मेरे बचपन में पिता की लकड़ी की पेटी है। कई सालों तक वह मेरे लिए रहस्य रही। कहीं कहीं से उसके खपच्चे उखड़ते दिखते थे। हल्के रहे रंग की उस पेटी का रंग जहां-जहां से उड़ चुका था उससे पेटी का पूरा हरा अजीब लगता था। वह पेटी मेरे लिए रहस्य थी। उसमें क्या है? एक दिन उन्होंने ने ही खोल कर दिखाई। आप यकीन करेंगे। उसमें किताबें थीं। उसमें से कुछ जर्जर किताबें मेरे अस्तव्यस्त रैक में अब भी सांसें ले रही हैं।
    और उसमें दास केपिटल की दो मोटी-मोटी जिल्दें भी हैं।
    ravindra vyas

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  17. इन दिनों बंबई से बाबूजी यहां आए हुए हैं. किताबों के सामने घंटों खड़े रहते हैं. एक किताब निकालते हैं. उलट-पुलट देखते हैं. फिर रख देते हैं. फिर बताते हैं 1982 के लॉकआउट के बारे में. किताबों से भरा एक कमरा था उनका. एक दिन उसमें छत से पानी चू गया. धीरे-धीरे सारी किताबों में दीमक लग गईं. वैकल्पिक नौकरी के लिए दूसरे शहरों में भटकते वह, जब लौटकर उस मकान में आए, तब तक सारी किताबें ख़त्‍म हो चुकी थीं. बताते हैं, फिर कभी वह उतनी किताबें नहीं जुटा पाए.
    ज़ंग खा चुकी उनकी आलमारी की मुझे याद है. हालांकि तब बहुत छोटा था मैं. फिर उसे साफ़ करके उसमें भाई-दीदी की स्‍कूली किताबें रखी जाने लगीं. याद है, जूते के डिब्‍बे को काट-छांटकर भाई ने एक घर बनाया था, गत्‍ते का, वह भी उसी में रहता था.
    जब मैं किताबों लायक़ हुआ, तो एक कोना मुझे भी मिल गया था उसमें. (बाद में एमस ओज की आत्‍मकथा में भी ऐसा ही एक प्रसंग पढ़ने को मिला था.) पर बहुत जल्‍द वह आलमारी भंगार में निकल गई.
    किताबें देखते-देखते, बोलते-बतियाते, अचानक वह चुप हो जाते हैं और फिर बार-बार उनकी हिफ़ाज़त के सवाल पूछते हैं, तो लगता है, वह अपने जीवन का एक शुद्धिपत्र लिख रहे हैं. नष्‍ट हो गई किताबों, छूट गई आलमारी से, बहाने से, क्षमा मांग रहे हैं.
    ..
    भावुक लेखक, तूने फुक्‍कट में भावुक कर दिया.

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  18. आप जब आये उसी दिन बेंत वाली किताब की अलमारी लाया था। आपने कुछ किताबें भी देखीं, मेरी समझ-बूझ के कुछ सवाल भी किये और वो कैसे भूल सकता हूँ जब मिलते ही आपने डॉटते हुये पूछा था कि पंकज! ’इंडिया ऑफ़्टर गाँधी’ नहीं लिये न तुम :-)

    सच में बहुत प्यारी पोस्ट है.. टोटली लव्ड इट..

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  19. हैरान हूं आपकी ये पोस्ट मैं कैसे मिस कर गई। आपको पढ़ना हमेशा बहुत से भावों में बहना होता है। किताबों से इतना प्यार, किताबों की अदद अलमारी का सपना जो कब हमारे साथ पलता है। गजब शायद आपकी बेहतरीन पोस्ट्स में से एक।

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  20. बिना लजाए कमेंट कर रहा हूं...

    एक अदद अलमारी नहीं बल्कि एक अलग छोटा सा कमरा... यह अंडरग्राउंड का दूसरे माले पर हो सकता है.. पूरा किताबों की अलमारियों से भरा हो... ऐसे सपने तक ले चुका हूं... आपको पढ़ा तो लगा कि कई लोग ऐसे ही सपने लेते हैं :)

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  21. बढ़िया। तकलीफदेह सच को भी दिलचस्प बनाकर लिखने की कला के आप पुराने कलाकार हैं। पोस्ट में कई जगह मैंने खुद को देखा।

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  22. शुक्रिया, अनुराधा, और बाकी? उम्‍मीद है विकट जीवन टिक-टिक ठीक गुज़रता होगा?

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