Saturday, September 6, 2008

कोशी से कितनी दूर?..

राहत है कोशी से दूर हूं. रह-रहकर नाटकीय ऊर्जा से गरजते बंबई के मेघ ही दहशतज़दा किये जाते हैं, कोशी की निकटता में जाने क्‍या हालत होती, कांपने लगता. फिर कांपता ही रहता- बताशा, पेड़ा की बुकनी, बबुनी की घुघनी, ब्‍लॉग की बमचक सब समाज में भरोसा और उम्‍मीद की तरह फुर्र हो गए होते.. आगे कुछ और होता तो यही होता कि कांपते-कांपते की जि‍जीविषा चुक गयी होती और कांपने की सब छवियों के मीडिया प्रत्‍यार्पण व समाज कन्‍ज़्यूम कर सके के माल-कन्‍वर्सन के अनंतर मैं बह गया होता? कभी बाद में कहीं कोई भोली आवाज़ बुदबुदाकर कहती- एक था अज़दक?..

कितनी खुशी हो रही है बंबई में बादल गड़गड़ गरजते हैं, नीचे जल नहीं ट्रैफिक के दलदल में बहलता हूं, कोशी की हवायें मेरे कंधे और चेहरे पर आकर मचलने नहीं लग रहीं. बिहारी होने का चरम आत्‍मीय अंतरंग आत्‍मीय आनंद बिहार में रोज़-बरोज़ का जीवन जीने के चरम लौमहर्षक, वीभत्‍सकारी अनुभव में नहीं अझुरा रहा! ऐसे ही मीठे, बच गए होने के आह्लादकारी मीठे आलोड़नों पर ‘कितने पास फिर भी कितने दूर!’ जैसे रुमानी मुहावरे का ईज़ाद हुआ होगा. बिहार मेरी आत्‍मा की उंगलियों के पोर पर है, जीभ के छोर पर है, लेकिन कोशी का झंझोर मैं अपने सपनों के नज़दीक भी कहां फटकने दे रहा हूं. सुबह के सहज नाश्‍ते की चुभकार में कैसा रसिकलाली सुख है कि कोशी की कजरारी आंखें हमारे नयनों में उतरकर गड़ नहीं रही, न हमारे जीवन को हुमच-हुमचकर पटक रही है!..

जिनके जीवन में जल आना था, तबाहियों का गाना व टूट-टूटकर जिनका जीवन बिलाना था, वो मृतप्राय व ध्‍वस्‍त न हुए हों, और अभी भी आसमान और हवाओं में हाथ भांजते रहने की ताक़त रखते हों, लेकिन अंत में अंतत: उनकी औकात क्‍या है? चार दिन तक भूखे रहने के बाद पांचवे पेट में कहीं से कुछ अन्‍न पहुंच जाये, हाहाकारी जिजीविषा कहीं किसी तरह का ज़रा ठौर पा जाये, इतना ही भर तो उनके जीवन चरम कौतुकगान होगा, सहरसा का मगही सौगाती पान होगा? हमसे- दूर-दूर उड़ रहे प्रमुदित पाखियों- की ऊंचे उड़ानों से इन टुटही वितानों के दो कौड़ि‍या चिरकुट मुर्दा मचानों की क्‍या तुलना? हतभागे, कुभागे, अभागे, भोर के हिलोर में जीवन का पंक, कोशी की पीठ व गोद में झूल-झूलकर होते रहें दंग! मैं नहीं हूं. सुखी हूं. उमंग में हूं. चेहरे पर खामखा की गंभीरता है मगर उमगियाये सुख में नी‍तीश कुमार भी हैं. मुख्‍यमंत्री को सुखसागर में तैरते हुए गंभीर दिखना पड़ता है; इसी गुरुगंभीरी अदाओं की सफल दिखलाइयों पर मुख्‍यमंत्रित्‍व चलता है; अब तो समूचे देश में कहीं नहीं बूड़ता तो बिहार में बूड़ने की बात कहां से आयेगी.. मगर पता नहीं क्‍यों सुबह-सुबह बेवजह बेकली हो रही है कि लाखों-लाख बिहारी बाढ़हारे अभागों की संगत में कितना तो अच्‍छा होता कि बिहार का मुख्‍यमंत्री व उसका समूचा मंत्रीमंडल कोशी के कलकल को ऊपर हैलीकॉप्‍टर से देख नहीं रहे होते, उस दलदल के बीचोंबीच बुड़-बुड़ बुड़बुड़ाते, बूड़ते दहल रहे होते. या लोगों के गुस्‍से ने ही उनको इस जल में बहा दिया होता?..

मज़ाक कर रहा हूं. चिंता की बात नहीं है. ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा. मन का एक कोमल भाव था, मैं मात्र उसे उगल रहा था, मंत्री-संत्री कहीं दहलेंगे नहीं, इस देश में ऐसी परिपाटी रही नहीं. कभी रही भी होगी तो ज़माने पहले उसे बहाकर अपने सुख के निजी ककून में हम सुघड़, सुरक्षित होना सीख गए हैं. बहलना-दहलना, बहना अभागे, हतभागों के जिम्‍मे..

कोशी से इतनी दूर बंबई के कचर-मचर में रहते हुए कैसी गदबद आनंदानुभूति हो रही है. आप भी उठाइये, जो बह रहे हैं कृपया उन्‍हें चैन से बहते रहने दें, ऐसी गंदी, छिछोरी, विनाशकारी, ग़ैरतरक़्क़ीपसंद छवियों से नज़र परे हटाइये!

(रवीश कुमार के पढ़े की प्रतिक्रिया में)

2 comments:

  1. निवेदन

    आप लिखते हैं, अपने ब्लॉग पर छापते हैं. आप चाहते हैं लोग आपको पढ़ें और आपको बतायें कि उनकी प्रतिक्रिया क्या है.

    ऐसा ही सब चाहते हैं.

    कृप्या दूसरों को पढ़ने और टिप्पणी कर अपनी प्रतिक्रिया देने में संकोच न करें.

    हिन्दी चिट्ठाकारी को सुदृण बनाने एवं उसके प्रसार-प्रचार के लिए यह कदम अति महत्वपूर्ण है, इसमें अपना भरसक योगदान करें.

    -समीर लाल
    -उड़न तश्तरी

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  2. AAPKA BLOG DEKHA MAJA AAYA , KYA AAP JANSATTA VALE HEE HAIN YADEE HANA, TO KHOJ POORE HUEE GANGOTREE KEE - ATUL CHATURVEDI

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