Wednesday, September 10, 2008

अंधेरे में बाजा..

निराशाओं के दमकते पोस्‍टरों के अंधेरों से गुज़रता हूं सनक्-सनक् बजती है काली दोपहर. किताबों के पीछे कभी पागल हुए के सवाल के जवाब में आईटी की अच्‍छी कमाई, घुंघराले बाल व घनेरी आंखोंवाला- उंगलियों में सिगरेट फंसाये, ज़रा सा सिर झुकाये नौजवान मुस्‍कराता बताता है लिटरेचर कभी सपरा नहीं, नहीं पढ़ी किताबें, एक कज़ि‍न है वह पढ़ती है. गिटार के पीछे पागल हुआ करता था मगर वह भी जाने कब किस ज़माने की बात है. इन दिनों बस पैसे बजते हैं कनपटी पर, मन के अंदर पता नहीं क्‍या खालीपन बजता है.

राजधानी में कोई दोस्‍त फ़ोन पर तमकता है देखा तुमने, शर्म आयी? बाढ़-पीड़ि‍त लालू की गाड़ी के आगे हाथ हिला रहे थे, जीते जी अपने मुर्दापने का घोषणापत्र सुना रहे थे, अबे, ऐसे हारों का क्‍या दु:ख करना? लुटे हुओं से इतना तक न हुआ कि पटना लूट आते, पंद्रह-बीस बस, कोई मंत्री पर थूक, किसी मंत्रालय को फूंक आते? थेथरई और थूक पर गिरे हुओं का गंवारा हारा बेचारा समय है. समझदार लोग बताते थे समाजों में परिवर्तन इवोल्‍यूशनरी या रिवोल्‍यूशनरी तरीकों से आता है, यहां तो दोनों ही तरीके लगता है एक-दूसरे को मुंह बिरा रहे हैं, लात खाये अभागे इतना बूड़े हुए हैं कि चूतड़ की तक़लीफ़ भूलकर बीच-बीच में रोते हुए मुस्‍करा रहे हैं, और लात लगानेवाले, हमेशा के बेहया थे, कभी गंभीर भंगिमाओं में, ज़्यादातर थेथरई में लहक-लहक गाल बजा रहे हैं!

अल्‍लसुबह से देर रात तक हथेलियों की कोमल घुली त्‍वचा पर, पलकों की नरम गर्म उदासियों पर क्‍या-क्‍या तो कैसा पराया, पिराया सुर बजता है. बीच-बीच में कभी भक्‍क् कहीं रोशनी चमकती है, फिर देर तक कसमसाये पैरों में कोई अनदिखा कांटा फंसा रगड़ता है, अंदर गहरे गड़ता है. गड़ता है गड़ता है. बजता है.

बजने में गड़ता है. फिर गड़ने का बजता है.

5 comments:

  1. sach aisa hi kuchh hota hai,maine suna hai,jhoot ke makan me kiraye ki kholi me rehta hai,dard bhi doobey hue logo par aansoo bahata hai magar shaam hote hi wo besharmom ki mehfil ke chiraag jalata hai.phoolon ka theka to mil gaya hai neta aur veshyaon ko,garib ke hisse me to sirf kaanta aata hai.sateek likha aapne.naman aapki bebek kalam ko

    ReplyDelete
  2. यही कड़वा सच है। अब तो इवोल्यूशन और रिवोल्यूशन दोनों ही भूल जाना है। आगे बढ़कर खड़ा होने वाला कौन है? बहुत अच्छा लिखा है आपने। इन पंक्तियों ने सोचने को मजबूर कर दिया--- इन दिनों बस पैसे बजते हैं कनपटी पर, मन के अंदर पता नहीं क्‍या खालीपन बजता है.

    ReplyDelete
  3. बहुत अच्छा लिखा है। यही कड़वा सच है। अब रिवोल्यूशन की तो कोई उम्मीद ही नहीं है। इन दिनों बस पैसे बजते हैं कनपटी पर, मन के अंदर पता नहीं क्‍या खालीपन बजता है.---इन पंक्तियों ने मन को छू लिया

    ReplyDelete
  4. बजने में गड़ता है. फिर गड़ने का बजता है.

    -सच कह रहे हैं-ऐसा ही होता है. अक्सर अहसासा भी है.

    ReplyDelete
  5. लुटे हुए यदि अपनी बस्‍ती के दलाल को लूटने की कोशिश करते हैं, तो इतने फर्जी मुकदमों में फंसा दिए जाते हैं कि पूरा जीवन उसी में कट जाता है। अभी तक तो उन्‍हें नेता, अफसर और दलाल ही लूटते थे, अब कानून झाड़नेवाले भी उन्‍हें जमकर लूटते हैं। और, तब कोई पढ़ा लिखा उनकी मदद में खड़ा होकर अपनी कमीज मैला नहीं करना चाहता।
    जो खुले आसमान तले लुट रहा है वह मुर्दा नहीं है, मुर्दा वह है जो कमरे के अंदर से यह सब देखता है और बिना बाहर निकले क्रांति की बात करता है।

    ReplyDelete