Saturday, September 13, 2008

उठते, उड़ते..


इस पल ‘ओह, कैसा भरा-भरा अघाया’ और
अगले ही ‘लो, देखो, सब छितराया!’
मन लिये भीड़ में झाड़ता हूं गर्दाये पंख
हांकता हूं खुद को ‘हुल्‍ले ले ले!’
अटकता-उमगता उड़ता हूं हौले-हौले जैसे
कोई बुढ़ाता कौवा बिजली के जंगली जालों से
बाल-बाल बचता, बारिशी बिछलाहटों में
‘एक-दो-तीन-चार’ गुनता धीरे-धीरे
समझदार हो रहा हो, रह-रहकर कुंए
के काले पुराने पत्‍थर पर पैर धोते
किसी तमिल ब्राह्मण की तरह मंत्र बुदबुदाये-
चील उड़ता आसमान में, बेंग टर्राते खोहों में
और मैं हिलगता, बुनता, बिगड़ता- कहां?
कहां? कहां? जहां दिन है न रात है?...


एक अटका हुआ संगीत है
एक छूटी-उखड़ी हुई बात है
कांपते परदे के पार टूटा झरोखा है
बीहड़ बरगद का अंधेरा है, बारिश
के गीलेपन की थरथराहट में
थोड़ी-सी तुम्‍हारे समझ लेने की
उम्‍मीद और खुद को कहते-बिनते
बुनते रहने की ढेरों बात है.

5 comments:

  1. बहुत खूब। प्रमोद जी आपकी लेखन शैली का मैं कायल हो गया। आपका गद्य भी जब पढ़ता हूं तो लगता है कि कविता ही है

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  2. उधेड़-बुन में कुछ
    खोजती-बुनती सी, कुछ अलग
    तेवर की रचना.....अच्छी लगी.
    ========================
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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  3. गीलेपन की थरथराहट में
    थोड़ी-सी तुम्‍हारे समझ लेने की
    उम्‍मीद और खुद को कहते-बिनते
    बुनते रहने की ढेरों बात है.

    भावना की गलियों में उमड़ते असमंजसों को बखूबी चितेरा आपने. बधाई स्वीकारें

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  4. बहुत खूब! दुबारा पढ़ना पड़ता है आपको...

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  5. अरब सागर में एक जहाज
    मनवां पानी से सदा नराज-हुल्ले ले ले।

    मस्तूल पर बैठा कौआ
    चुभलाता विचार-बताशा

    देखो मैं कितना प्यासा।
    हाय कितना प्यासा-हुलेल्ले लेले।

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