Sunday, September 14, 2008

छूटती चलती..


उंगलियों का पोर किसी नवकोंपल के हरेपन-सा हल्‍का होता, नहीं है
मन किन्‍हीं जापानी मांगा की सत्‍तररंगी कल्‍पनाओं में हहाता उड़ता
चकित-प्रज्‍जवलित विहगता, टिमटिमाती नीली रोशनी की नाव पर सवार
अनूठी, चमकती रचनाओं की एक महीन, महती किताब रचता, ऊपर
चमकते हरफ़ों में लिखता- ‘बिहार! बिहार!’, लेकिन कहां, नहीं लिखा..

हर वक़्त भारी चेतना पर किसी आदिम नशे की तरह
चढ़ी रहती है थकान, घिस-घिस-घिस घिसड़ता घिसता है मन
ललियाये पत्‍तों के बीच खुलता है दिगंत, सियाह चील की तरह
झपट्टा मारती आती है कल्‍पनाएं, और फिर उतनी ही तेज़ी से
गायब भी हो जाती हैं-
पलकों के मुंदने के विहंगम अंधेरों में..

छूटता, छूटता, छूटता सब छूटता चलता है
रोयें, कनपटी के बाल, देह का खिंचाव
नज़र की मार, कल्‍पना की कसी धार सब छूटते
छूटते चलते हैं, कितना सारा असबाब, ओह
कैसी अनोखी तो वह मेरी आत्‍मा का मणि
किताब, छूटती चलती है

छू ट ती च ल ती..

3 comments:

  1. siyah cheel ki tarah jhapatta marti aati hai kalpanayen,aur phir utni hi tezi se gayab bhi ho jaati hai palkon ke mundane ke vihangam andhere me.sach aisa hi kuch hota rehta hain,aur kuch sujhta bhi nahi

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  2. छूटता, छूटता, छूटता सब छूटता चलता है...

    इधर भी वही हाल है... क्या करें?

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  3. दुनिया का बोझ उठाने वाले
    ट्रकों पर दर्ज एक आम पंक्ति-
    सोचो , साथ क्या जाएगा ?
    इसे ट्रक साहित्य की
    उपमा चाहे तो दे सकते हैं
    या ट्रक सुभाषितानि का अलग वर्ग
    बना सकते हैं..
    पर यही सत्य है
    ज़िंदगी और क्या है गुरूजी ?

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