Wednesday, September 17, 2008

बारीशी भयभराहटों में लड़ि‍याया प्रेम..

परछाइयां भी जब घबरायी छुपी अपने में दुबकी हों, तड़पकर चीखती बिजलियों की कड़कड़ाती- बीसियों दिन से अनछुए, सूखे पड़े तवे को जैसे आर-पार नहलातीं- झमाझम बरसती घनेरी रात में जब मैं चमक-चमककर सोचूंगा अब गये तब गये, लेकिन नाचती रात तमक-तमककर भेद बुनती रहेगी कि इतने सावन बीत गये मगर उतने अभी बाकी हैं, थर-थर भयग्रस्‍त मन पर उम्‍मीद की बाती- बुझने-बुझने को आयी लेकिन देखो, फिर टिमटिमायी- और जोड़ी भर आंखों के सहोदर सपनसाथी हैं, तभी तुम आओगी. आओगी जैसे आपदा के गहरे सियाह मौक़े पर पहुंच आता है हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का अंधेरहंता. मैं चिंहुककर कहूंगा अब आयी हो जब कपड़े उड़ गये, कागज़ गल गये, और मैं भी गला ही चाहता हूं? लो, सम्‍भालो, फ़ि‍लहाल अभी तक मुझ अनगले को कहकर तुम्‍हारी भरी गोद में अपना निर्जन पैर पसार दूंगा, पूछूंगा अब बताओ मेरे पैर में सात उंगलियां क्‍यों नहीं हैं. तुम नहीं बताओगी, अंधेरे में जुगनू की आंख की मानिंद अपना दुलार चमकाओगी, मुस्‍कराओगी, कहोगी चलो, मैं तुम्‍हें भगाकर ले जाने आयी हूं. मैं कहूंगा फिर से कहो, फिर से कहो! अच्‍छा ग़ज़ब है पुरानी काली-सफ़ेद जर्मन फ़ि‍ल्‍म में लड़की मुस्‍कराती है तो अनार-से दांत दिखाती है, लेकिन तुम्‍हारा पता नहीं क्‍या है जब भी मुस्‍कराती हो खरबूजे की याद दिलाती हो? तुम जुगनू को बटुये में डालकर मुंह सिल लोगी, कसमसायी देह तानकर, अपना नहीं मेरा पैर पटकोगी, फिर-फिर वही घिसी लाइन दोहराओगी, मालूम नहीं तुम्‍हारा मैं क्‍या करूंगी. मैं चिंचियाता चहकूंगा क्‍यों, क्‍यों, सिर पर नहीं धरूंगी? अबकी तुम मुंह से नहीं आखों में जुगनू जलाओगी, ओह, अंधेरों में कैसा-कैसा तो उजियारा फैलाओगी..

4 comments:

  1. कपड़े उड़ जाएं, काग़ज़ गल जाएं और ख़ुद भी गलने के क़रीब होने पर भी उम्‍मीद तो बाक़ी रहती है न अनगली, पूरी साबुत, सूखी और पूरी तरह जिंदा।

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  2. बचा कर रखिए खरबूजे के बीज। निर्जन सड़क पर एक बुढ़िया, किसी के पाजामें की याद में बनी थैली से निकाल कर, लकड़ी की दोमुंही छिपटी से उन्हें फोड़ते काट देती है पूरा दिन। छिपटी के बीच फंसे बीज के कुट्ट से फूटने से पहले का तनाव उसे पिछली सदी की बारिश की रात में छोड़ आता है।

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  3. अंधेरों में कैसा-कैसा तो उजियारा....ओह!!!

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