Friday, September 19, 2008

सुख का भूगोल..

रात को सोने, और सोने से ज़्यादा सोचने के लिए, अंधेरा करने के बाद मैंने खुद से उसी तर्ज़ पर सवाल किया जिस तर्ज़ पर आठवीं में शर्तिया फेल होने जा रहा बच्‍चा अदबदाकर खाने की थाली पर बैठे अनमनाये बाप से अकुलाया सवाल करता है कि उसके अस्‍सी परसेंट नंबर उठाने पर बापजान दूकान से नयी साइकिल उठवा रहे हैं न? नयी साइकिल के कन्‍ज़्यूमरिज़्म को लेकर उत्‍साहविकल होने की जगह मैं भाषायी कम्‍यूनलिज़्म के दायरों में भावविह्वल घूमता रहा. खुद से पूछनोपरांत खुद को सूचित किया (फॉर अंप्‍टीन्‍थ टाईम) कि एक फ़ि‍ल्‍म बन जाती तो अच्‍छा होता, हालांकि बन चुकने के अनंतर मैं सुखी होऊंगा ही इसका आत्‍मविश्‍वास अब खड़खड़ाता लगता है (दैट्स आल्‍सो ऊड नॉट बी हैपेनिंग फॉर द फ़र्स्‍ट टाईम). संभवत: ताकेशी कितनो की तरह मैं भी नाक पर तर्जनी चलाते हुए बुदबुदाऊं कि पता नहीं दूसरे क्‍या मेरी फ़ि‍ल्‍मों में देख लेते हैं, मुझे तो ऐसा कुछ खास नहीं दिखता..

ख़ैर, मैं बहक रहा हूं, रात के अंधेरों में अपनी इच्‍छालोक की छाया, माया की चर्चा कर रहा था, उसी पर लौटता हूं. यही कि एक इच्‍छा होती तो है (सबके कुछ न कुछ होती है), मगर ससुरी, पता नहीं उम्र है क्‍या है, कि अब ऐसी नहीं होती कि उसके इश्‍क में खुद को भूल जायें, लुटा दें, रात को सफ़र पर निकलें और सुबह आसमान पता नहीं किस नये रंग में सजा दें..

एक दूसरे मित्र हैं वर्षों से किताब लिखने का सपना पाले हैं, सोचते हैं शायद किताब लिख लिये जाने पर सुखी हो जायें. मगर सुखी होने की यह भोली हसरत फिर भी शायदों के दायरे में ही है. इसीलिए किताब लिखी भी नहीं जा रही. कि शायद न हों. फिर? दूसरे, मित्र का यह भी मानना है कि किसके लिये लिखें. हिंदी में पढ़ने की अब रवायत कहां रही. जो लिखा जा रहा है, और पढ़ा, वही लिखना है तो बेहतर है फिर न ही लिखी जाये किताब. इस तरह जीवन के वृहत्‍तर अरमान के सबसे बड़े बैलून के ठीक नीचे उतना ही बड़ा छेद भी नत्‍थी बना रहता है. न लिखी किताब के पन्‍नों का साउंडट्रैक मन की हवाओं में फड़फड़ाता है, हथेलियों की महक में आकर रचता-बसता नहीं.

एक तीसरे हैं. मित्र. पुरानी इच्‍छा थी वर्ष में एक बार पहाड़ ज़रूर जायें. समय की अच्‍छी सिर-फुटव्‍वल वाली नौकरी है मगर पिछले छह-सात वर्षों से फ़ुरसत में समय निकालकर पहाड़ जा रहे हैं. ऐसे वेकेशनल ‘एडवेंचर’ के पीछे आइडिया यह रहता है कि शायद मन में पहाड़ की ऊंचाई व आत्‍मा में प्रकाश की ललायी बनी रहे. छह दिवसीय अवकाशोनंतर आकर नौकरी ज्‍वॉयन कर लेते हैं और नौकरी की रेल पर पुन: छुकछुक बहके-बहके से डोलते रहते हैं. ज़रूरत की मात्रा में मुस्‍करा देते हैं, और ऐसी ज़रूरत पड़ ही गयी तो कविता भी सुना देते हैं. वर्ना ऊधो को देने और न माधो से लेने में यक़ीन रखनेवाले साफ़-सुथरे व्‍यक्ति हैं, सुखी हैं. जिस इच्‍छा के पीछे जीवन था वह नियम से पूरी हो रही है तो फिर शिकायत की वज़ह कहां बचती है?

जाने किस तरह का समय है और यह किस तरह की सुख की सड़कें हैं. कभी-कभी लगता है खुद को दबोचकर सवाल किया जायें कि गुरु, इतना उड़ो मत, ज़रा हमारी सवाल का साफ़-साफ़ जवाब दो! इस सारे जीवनरूपी अल्‍लम-गल्‍लम की बुनावट क्‍या? सफ़र के रस्‍ते क्‍या, सफ़र की मंज़ि‍ल क्‍या?

मगर फिर यह सोचकर घबराहट भी होती है कि शायद खुद के सवाल पर कहीं ऐसा न हो कि खुद ही पलटकर अजनबीयत में उलट सवाल करे- आर यू टॉकिंग टू मी?..

सुखी होने के भूगोल का नक़्शा समय और उम्र की इस मुकाम पर आकर जाने क्‍यूं व कैसा तो धुंधला हो गया है. रहते-रहते बिजलियां कड़कती हैं, फिर देरतक घनेरा अंधेरा तना रहता है. मन ख़्याल करे, व अटेंशन दे तो पीछे कहीं बारीश की बूंदों के बजने का म्‍यूज़ि‍क सुनायी देता है, वर्ना वह भी पता नहीं कब किसी अबूझ-अपहचाने शोर के साउंडट्रैक की शक्ल अख्‍ति‍यार कर लेता है. बीच-बीच में इच्‍छारूपी बिजलियों की कड़कड़ाहटों से चौंकने से अलग जीवन का ज़्यादा समय हम कमरे, लिफ़्ट, सीढ़ि‍यों का सफ़र करने, बिल भरने व शहर के एक निहायत छोटे हिस्‍से की माया समझ लेने की कसरतों, हसरतों में गुजार देते हैं. और कभी-कभी तो अपनी आह की आवाज़ तक भी नहीं सुन पड़ती.

4 comments:

  1. सच है कभी-कभी अपनी आह तक नही सुन पाते हम्।

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  2. हर आदमी अपनी अपनी तरह से सुख को ढूँढने में लगा हुआ है...सबके लिए सुख की परिभाषा अलग अलग है!

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  3. मगर सुखी होने की यह भोली हसरत फिर भी शायदों के दायरे में ही है.

    -सभी के साथ यही है...

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  4. हम तो यहीं अटक गये- आर यू टाकिंग टु मी!

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