Monday, September 22, 2008

दु:ख की लोरी

कभी लगता है अंधों की बारात है कोई जंगली रात है, विद्युत बहुरंगी वाद्यों पर मां-बहन की गालियां बज रही हैं कोई भावुकता में लबरेज़ फुसफुसाता है अहा, कैसी तो भक्ति बजबजा रही है, अफ़ग़ानिस्‍तान से अज़रबैजान तक सबको प्रभुवत्‍सल बना रही है! मैं हड़बड़ाता, खड़खड़ाता- फिर धीमे-धीमे चरमराता- कान के परदों की संवेदना सुनूंगा, रात के बाद दिन की राह तकता, मन के सूने निर्जन में, कल्‍पनाविहुत चंद नये पहाड़ बुनूंगा, हकलाता कहूंगा- कविता, कला, समय, समाज- अंधेरे में गुमनाम पतों पर जाने कहां-कहां तक पसरी कैसी तो लम्‍बी चिट्ठि‍यां लिखूंगा.

थके-थके जब और आंख खोले रखना दुश्‍वार हो जायेगा, कोई छोटी बच्‍ची कहीं नज़दीक बुदबुदायेगी अब सो जाओ, अंकल, मैं तुम्‍हारे सपने में गुज़रना चाहती हूं, अपने में भरे-हरे बरगद की बड़ाई व उसकी जटाओं-सी उझरायी तुम दु:ख का एक विशाल वृक्ष हो, मैं बेमतलब की पगलायी, नाटकीयता में नहायी झंझावाती बारिश में शरण खोजती छोटी-सी चिड़ि‍या हूं, सुख की गुड़ि‍या हूं, जिसे किसी तरह तुम बचा लोगे, अं‍कल, अपने लिये सच्‍ची बना लोगे?

अचकचाया, ज़रा सा चिढ़ा-चिढ़ा मैं एक ओर सरक जाऊंगा, अपने एकाकीपन में थोड़ा और दरक जाऊंगा, क्‍योंकि मुझे सूझेगा नहीं मैं क्‍या गुन्‍ताड़ा बुन रहा हूं, क्‍योंकि सच्‍चायी यह भी होगी कि सुबह एक अदृश्‍य पीतल के लोटे व कांसे की गगरी के साथ मैं एक स्‍नेहसंगिनी नदी की खोज में निकला होऊंगा, जिस खोज का अलबत्‍ता कुछ न हुआ होगा, उस खोज को किसी अपहचानी विदेशी गाने की तरह गा, ख़ून और आंख की जांच करवाने में उलझ चुकने के उपरांत मैंने चश्‍मे का फ़्रेम व बाइफ़ोकल की गुत्‍थी सुलझायी होगी, रफ़ी को धता बताता तलत महमूद को गुनगुनाता एक जोड़ी चप्‍पल और तंत्रा के टीशर्ट्स उठाये होंगे, झुंझलाहट व खीझ में टुनकता रहा होऊंगा कि अजब हैरतनाक़ दिन है, सुबह से फटी हुई टोंटी की मानिंद पैसे बहा रहा हूं, फिर भी देखो, किस बेहयायी से दु:ख की लोरी गा रहा हूं!

8 comments:

  1. "सुबह से फटी हुई टोंटी की मानिंद पैसे बहा रहा हूं, फिर भी देखो, किस बेहयायी से दु:ख की लोरी गा रहा हूं!" आखिरी पैराग्राफ और ये लाइन...पसंद आए यही कहूँगा !

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  2. बेहतरीन पीस, महाराज!!

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  3. पोस्ट अच्छी है लेकिन गुन्ताड़ा शब्द इतने दिनों बाद कहीं पढ़ने का मिला। उसकी इमेजेस में जा रहा हूं और मजा ले रहा हूं...

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  4. दुख की ऐसी मीठी लोरियाँ गाना बेहयाई नहीं, विद्रोह है।

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  5. बात तो सही है गुरुदेव। आप तो मन की गांठ खोल देते हैं लेकिन हम उसमें उलझ जाते हैं।

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  6. ऐसा अच्छा अच्छा कैसे लिख लेते हैं बंदानवाज़ ?
    बहुत प्यारी-सच्ची पोस्ट है ....

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  7. आपकी गांठ को ढीली करने की नीयत से आतुर प्यार।

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