Tuesday, October 28, 2008

दिवाला समझ.. उर्फ़ आई वॉज़ नॉट देयर..

बिहार के होनहार बच्‍चों के सामने मालूम नहीं फ़ि‍लहाल क्‍या रास्‍ते हैं. जो होनहार नहीं हैं वे तो खींसें निपोरे बिहार में रोज़ पिट ही रहे हैं (इस पिटने की बहुविध परतें हैं, बहुत बार साफ़-साफ़ दिखती हैं, बहुत बार धुंधलके में अपना बहारी-बयार बुनती रहती हैं), हाथ कंगन को आरसी क्‍या की होनहारी की परख में निकले बकिया बाहर आकर पिटने की एक बड़ी सच्‍चायी का सामना कर रहे हैं, उसके बाद अपनी हिम्‍मत व होनहारी की व्‍याख्‍या बिहार में तोड़फोड़ मनाते हुए कर रहे हैं. तेईस वर्षीय राहुल राज ने होनहारी के इस लोकप्रिय व प्रचलित व्‍याख्‍या को ज़रा बदल दिया; बाहर आकर उसकी अभी पिटाई नहीं हुई थी, लेकिन वह अजनबी, अजाने भभ्‍भड़ भरे शहर में चीख़-चीख़कर पीटने को ललकार रहा था. दो दिन पहले मैंने एक्‍सप्रेस में छपे विनय सीतापति के एक लेख का लिंक दिया था जिसकी शुरुआत मुंबई की हवलदारी में लगे कोल्‍हापुर के पांडुरंग देसाई की हतप्रभावस्‍था के विशद चित्र से हुई थी. राहुल राज के चित्र इसी बौखलाये हतप्रभावस्‍था का एक्‍सटेंशन हैं. फर्क़ बस इतना है कि शहरी आलोड़न की इस राजनीतिक खींचतान में पांडुरंग देसाई के पास पीटने के अधिकार हैं, तेईस वर्षीय राहुल राज के पास न केवल वह अधिकार नहीं था, उस अधिकार को क्‍लेम करने की कोशिश में होनहार बच्‍चे को अपनी जान गंवानी पड़ी.

मुंबई की पुलिस होनहार होती तो- हाथ या पैर घायल करवाकर- राहुल शायद अभी ज़ि‍न्‍दा रहता. मगर, फिर, तब मुंबई की राजनीति का दिवालियापन नहीं रहता. गुंडई और लंठई के सही संकेत, सिग्‍नेचर ज़ि‍न्‍दा नहीं रहते. इस उलझाव को पढ़ने की शायद तेईस वर्ष के होनहार राहुल में सामर्थ्‍य नहीं थी. वर्ना वह मुंबई में होने, व अपने को व्‍यक्‍त करने के दूसरे तरीके आजमाता. हाल में देखी टॉड हेंस की फ़ि‍ल्‍म ‘आई अम नॉट देयर’ के आखिर में एक क़ि‍रदार की कही पंक्तियां दिमाग में बज रही थीं:

“People are always talking about freedom. Freedom to live a certain way, without being kicked around. Course, the more you live a certain way, the less it feels like freedom. Me? I can change during the course of a day. I wake and I'm one person, and when I go to sleep, I know for certain I'm somebody else. I don't know who I am, most of the time. It's like you got yesterday, today, and tomorrow, all in the same room. There's no tellin' what can happen.”

बीइंग नॉट देयर- नॉट इन इ कन्‍वेंशनल सेंस- परहेप्‍स ईज़ द ओन्‍ली वे दीज़ नैस्‍टी टाइम्‍स कैन सेव होनहार बिहारी बच्‍चाज़ बोथ इनसाइड बिहार, एंड आऊट ऑफ़ ईट..

Sunday, October 26, 2008

अस्थिरता पैदा करनेवाली ताक़तें..

सुगिनिया होती तो मुंह पर आंचल दाबकर कहने से बाज नहीं आती कि मूस मोटइहें, लोढ़ा होइंहें. उसे नहीं दिखता कि सच्‍चायी उसके मूस और लोढ़े के रूपक से कहीं ज़्यादा विरूप, विसंगत शक्लें भी अख्‍ति‍यार करती है. सुगिनिया का कसूर नहीं. तीन उंगलियों से मुंह पर आंचल थामकर सामनेवाले को अपनी तार्किकता से निरस्‍त करने की उसकी समझ है. मगर सामनेवाले का विस्‍तार व अंदर-अंदर पसरते भूगोल के पेंच एक ऐसा नया इंद्रजाल बुन लेंगे कि सुगिनिया तो क्‍या, ठीक-ठीक सामनेवाले तक को उसकी बुनावट की वाजिब समझ न होगी, फिर सुगिनिया की समझ पर उंगली रखना कहां तक वाजिब होगा. न होगा. क्‍योंकि एक सीधे, फूहड़ अंदाज़ में देखने की कोशिश करें तो शायद सुगिनिया का रूपक ऐसा अटपटा व बेमेल भी न लगे. अपने बेलगाम, बेशर्म लालच में अमरीकी निवेशक कंपनियों ने किसी मूस से बेहतर कहां बिहेव किया था? और रंग उतरने के बाद किसी लोढ़े से ज़्यादा क्‍या उनकी साख रह गयी है?

शायद मैं बहक रहा हूं.. अभी हाल तक, और आनेवाले वक़्तों में भी जाने कब तक, अपने, व दुनिया के कहां-कहां किन-किन मुल्‍कों की नियति-नियंताओं को वाजिब इज़्ज़त नहीं दे रहा हूं, विश्‍वविजयी अश्‍वमेघ की सवारियों को सुगिनिया के लेवल की इमैजरी पर उतार कर उनकी उत्‍कट विश्‍वपरिवर्तनकारी प्रतिभा का न्‍याय नहीं कर रहा. यहां-वहां घुटने गिरा कल के पर्वतारोही आज अवरोह की गोह में दया की भीख भले मांगते दीख रहे हों, कल को गिरह मज़बूत होते ही जबड़ों की ताक़त लौटेगी तो उनको कहने की क्‍या, लोढ़ा सोचने तक के पहले मैं चार मर्तबा सोचूंगा. और नहीं सोचूंगा तो लोढ़ा वे नहीं होंगे, मैं मूस होऊंगा!

ओह, सुगिनिया के लिए सब कितना आसान है. मुंह पर आंचल धरकर जो कहना हो कह चुकने के बाद निश्चित हो लेती है. जबकि मैं जाने कहां से कैसे चला आया कैसे हादसे की प्रतीति में एकदम किंकर्तव्‍यविमूढ़ हो गया हूं. और ऐसा नहीं कि कहीं मेरे पैसे डूबे हों. पैसों के डूबने के लिए पहले उनका होना ज़रूरी होता. तो बिन पैसा डूबे की अवस्‍था में भी जाने क्‍यों मैं लिटरली डूबा-डूबा-सा दिन गुज़ार रहा हूं. बुद्धि नहीं चल रही. बुद्धि न चलने के वाजिब रूपक भी नहीं सूझ रहे. कातरता में, सुगिनिया के आसरे से, इसको-उसको मूस व लोढ़े की उपाधि में साजकर छुट्टी पाना चाहता हूं. मगर, चूंकि आगे-आगे तुम सजन, पाछे-पाछे बुद्धि वाली बुद्धि का कहीं कांटा भी साथ-साथ गड़ा चलता है तो ठीक-ठीक मूस को पहचानने, व लोढ़ा पुकारने से परहेज करने को भी मन करता है. जबकि, देखिये, आज सुबह से दस-बारह खोजी रपटों को बांचने के बाद अदबदाकर मन कर रहा है कि कहीं खुले में बीस लोगों के बीच जाकर खड़े हों और जोर-जोर से कहना शुरू करें कि इस देश में अस्थिरता पैदा करनेवाली सबसे बड़ी ताक़त कोई है तो वह इस देश की सरकार है. मगर, फिर देखिये, ऐसी सीधी बात कहने में भी बुद्धि आड़े आ रही है!

हारकर मैं फिर सुगिनिया का मुंह जोहूंगा. वह बदमाश समय नहीं खायेगी, मुंह पर तीन उंगली के नीचे आंचल साटकर दन्‍न से कह देगी..

(क्‍या कहेगी इसकी इतनी ज़रा सी कल्‍पना तो आप में होगी ही?)...

मुंबई मेरी जान.. किसकी?

मुंबई किसके बाप की है.. या जिसके भी बाप की नहीं है पर एक अच्‍छी टिप्‍पणी तीन दिन पहले इंडियन एक्‍सप्रेस में विनय सीतापति ने लिखी है. मौज़ूदा माहौल की संक्षिप्‍त लेकिन असरकारी समीक्षा है, एक नज़र आप भी मार लें, यहां..

Friday, October 17, 2008

प्रतिभा की नियति पतन, और सिर्फ़ पतन है?

सवाल ज़रा उलझा, व अरविन्‍द अदिगा की लेखकीय ऊंचाई को पढ़ लेने से कहीं ज़्यादा की समीक्षात्‍मक समझ की मांग करता है, मगर तीन कदम पीछे जाकर, व वापस नज़दीक आकर दुबारा पढ़ि‍ये तो कुछ ऐसा उलझा हुआ नहीं भी है. खास तौर पर मुझसे तीक्ष्‍ण मस्तिष्‍क वाले प्रतिभानिष्‍णात के लिए तो नहीं ही है जो यूं भी अदिगा-पदिगा की लेखकीय ऊंचाइयों से चार नहीं, चौदह फीट ऊपर रहकर भारतीय लेखन पर नज़र मारता है. और मारता है भी तो उसे अंग्रेज़ी के कॉम्‍प्‍लेसेंट चश्‍मे से जांचने की जगह, चेक, किरगीज़ व स्‍वाहिली लेंसों से परखने में कहीं ज़्यादा यक़ीन करता है! मगर.. देखिये, सवाल पर से ठीक से परदा नहीं उठा और मैं हूं कि आलरेडी उसपर सियाही गिराने लगा. कहने का मतलब सवालविमुख होने लगा. प्रतिभा के अतिरेक के यही नतीजे होते हैं. आप सवाल करिये अफ़ग़ानिस्‍तान के मौज़ूदा संकट की वज़हें क्‍या हैं. प्रतिभाप्रसूत व्‍यक्ति- यानी मैं- ऐसे मासूम सीधे सवाल का सीधा जवाब देने की जगह अमरीकी विदेशनीति के गहर में उतर जायेगा. और गहर में इतने सारे व ऐसे-ऐसे चक्‍कर काटता रहेगा कि सवाल करनेवाले की अफ़ग़ानिस्‍तान के तथाकथित संकट में ही नहीं, मानवता के कैसे भी संकट व संबद्ध सवालों में दिलचस्‍पी ख़त्‍म हो जायेगी. माने सीधा सवाल है प्रतिभा की नियति पतन, और सिर्फ़ पतन है? उसमें उतरने की जगह, देखिये, मैं बाहर-बाहर दौड़ता किस-किस तरह के पोज़ मार रहा हूं? प्रतिभातिरेक का एक लक्षण यह भी है. यही पोज़ मारते रहना. मगर मेरे पैर, व मुंह पर चढ़े भाव दुख रहे हैं तो मैं अब और पोज़ नहीं मारूंगा, उलझे सवाल का तथाकथित सीधा-सीधा जवाब पकड़ने की कोशिश करूंगा.

कभी-कभी लगता है पता नहीं किस बौद्धिक भुरभसपने की बहक में पोज़ लेकर फ्रांसिस फुकुयामा ने इतिहास का अंत जैसे फ़तवेदार स्‍टेटमेंट दे दिया था, जबकि ऐतिहासिक सच्‍चायी अब ज़्यादा यह लग रही है कि बहुत सारे सवाल मुंह बाकर सामने खड़े हो गये हैं, जिनका जवाब फुकुयामा तो क्‍या हमारे जैसे पहुंचे हुए बुद्धिजीवियों दे नहीं पा रहे (जवाब के सीधेपन को तथाकथित से विशेषित करने के मोह का इसीलिए संवरण न कर सका!). माने कोई माई का बौद्धिक लाल सामने आकर बता दे अमरीकी इकॉनमी किधर जा रही है? या आनेवाले वक़्तों में विदेशनीति किधर से निकलकर किधर घुस जायेगी? या हमारे यहां आरबीआई में जो डॉलर का रिर्ज़व है, और जितनी डॉलरीय नाटकीय कमाई होनी थी हो गयी, आनेवाले समय में अब बहुत नहीं होनेवाली है, तो यह जो मुक्‍तबाज़ारी नवभारत की सारी तरक़्क़ी डॉलर-केंद्रित थी, डॉलरी बादलों के छंटने के बाद घंटा क्‍या केंद्रित रहेगी, और न रहेगी तो नवभारत की तरक़्क़ी किधर घुसकर किधर से निकल आयेगी, इसका कोई बापपुत्र ठीक-ठीक जवाब देगा? दे पायेगा? मैं देने की सोचते-सोचते इकॉनमिस्‍ट के ताज़ा अंक के पीडीएफ फ़ाइलों को डाऊनलोड करने की पतली गली में निकल लेता हूं..

बाबा मार्क्‍स ने पता नहीं किस बंगालन की संगत में भांग पीकर, या किसी बिहारिन की मुहब्‍बत में चचा ग़ालिब का शेर पढ़कर भावुकता की पीनक में कभी कह दिया था कि एक दिन पूंजीवाद का नाश होगा और उसके अनंतर सर्वहारा-शासन में सब छककर मौज़-मज़े का जीवन जीयेंगे. बाबा मार्क्‍स को आज कोई उनके कब्र से बहरिया कर अपने कहे का जवाब पूछने लगे तो बाबा की घिग्‍घी बंध जायेगी और बुढ़वा छटपटाकर एक बार फिर भांग-भांग करने लगेगा! माने पूंजीहारा, या चलिये, पूंजीविजयी ही, ससुर, वह कौन शासन होगा भला जिसमें आमजन मौज़-मज़े का जीवन जियेगी? सबको पीने का पानी व खाने को अन्‍न मिल जाये वही अब छप्‍पनभोग माफिक सपना हुआ जा रहा है, और आप मौज़-मज़े की बात पेल रहे थे? इकॉलाजी को आपको कुच्‍छो ध्‍यान-ट्यान गया था कि नहीं, जर्मन महामनीषी?..

प्रतिभा कितना आत्‍ममुदित, आत्‍मदग्‍ध रहती है इसका बुढ़वा बाबा से बड़ा प्रमाण और क्‍या मिलेगा? पूंजीवाद के बारे में इतना सोच लिये लेकिन पूंजीवाद पर्यावरण की कितना और कहां-कहां मां-बहिन करेगी, इसको सोचने से रह गए! पोस्‍ट के शीर्षक में हमने प्रतिभा का पतन ऐसे ही नहीं डाला है, उसके पीछे लॉजिक काम कर रही है. अब ज़रा इकॉलाजी वाले लॉजिक पर लौटिये! अमरीका में प्रतिहज़ार व्‍यक्ति पर 480 कार की खपत है, सारी दुनिया में अपनी मैनुफैक्‍चरिंग ठेल चुकने पर भी चीन में अब भी प्रतिहज़ार पर 10 कार की ही खपत है. बाबा मार्क्‍स वाले बिंदास मौज़-मज़े के रस्‍ते पर चलते हुए अब ज़रा क़यास लगायें कि चीन भी अमरीका से आगे नहीं तो कम से कम अमरीका के प्रतिहज़ार पर 480 कारों की खपतवाले बराबरी के मार्क पर पहुंच गया है. परिणाम क्‍या होगा? यह होगा कि इतने मात्रा में प्रदूषण होगा कि आप भले अपने घर में जमे रहें, हमारे जैसे और शर्मसार होंगे, अदबदाकर सांस लेने के लिए पृथ्‍वी से बाहर निकल जायेंगे! मैं नहीं कह रहा, मेरा दिमाग नहीं खराब हुआ कि नैनो की बुकिंग करवानेवालों की लात खाऊं, प्रमोद नहीं ऑक्‍सफोर्ड में पढ़ानेवाले कोई प्रीतम सिंह हैं, ईपीडब्‍ल्‍यू में बहक रहे हैं..

वर्ल्‍डवॉच इंस्टिट्यूट का एक 2006 की रपट रेखांकित करती है कि बाकी दुनिया की रहने दें, महज़ चीन और भारत ने अमरीका के स्‍तर का स्‍त्रोतों का दोहन व उसी अनुपात का प्रदुषण फैलाना शुरू कर दिया तो उसे सस्‍टेन करने के लिए एक नहीं, हमें दो-दो पृथ्वियों की ज़रूरत पड़ेगी!

बहुत सारे सवाल हैं. जवाब नहीं है. प्रतिभा की नियति पतन है का है. उसका है. मैं स्‍वयं हूं. प्रत्‍यक्ष प्रमाण हूं. रोज़ देख रहा हूं सवाल बढ़ रहे हैं मगर अपनी प्रतिभा से उन्‍हें काट दूं यह हो नहीं पा रहा. रोज़ कुछ और कतरा-कतरा हुआ जा रहा हूं. जबकि कुछ लोग हैं हमारी तरह समय व सवालों की वेदी पर कटने की जगह पेड़ व पंछी निहार रहे हैं, स्‍वास्‍थ्‍य सुधार रहे हैं! ईश्‍वर उन्‍हें सुखी रखे, हम सबकी सवालकट शुभकामनायें उनतक पहुंचाये..

(अभय के लिए. मुझे गरियाने में भले सकुचा लें, भले आदमी को बधाई देने में मत शरमाइयेगा. बच्‍चे का आज जन्‍मदिन है.)

Monday, October 13, 2008

भड़ुकी भर अनुसंधान

तक़लीफ़ होगी मुंह पर और तक़लीफ़ की चादर गिराकर सड़क पर बहकता किसी अजनबी ज़बान का गाना गाने लगूंगा. ट्रैफिक की चिल्‍ल-चां, हदर-बदर नहीं दिखेगी, दिखेगा कैसा तो बियाबान, हज़ारों वर्षों का इतिहास से बाहर सूना पड़ा रेगिस्‍तान है, नशे की नाद से जबड़ा लगाये मैं कोई काफ़ि‍र ऊंट हूं, अपनी सहूलियत में बदलता रोज़ किसिम-किसिम के झूठ हूं, कहां जा रहा हूं? या उतरा था किसी तीस हज़ारी रंगीन बायस्‍कोप में, अब लौटकर अपने में आ रहा हूं?

अचानक मचलकर सर्च इंजन में टीपकर पकड़ना चाहता हूं राष्‍ट्रीय परायेपन का ठीक-ठीक बयान, अपने दुचित्‍तेपने का असंभव अनुसंधान, किसी तरह हाथ आये सिरा ऐसी कोई पहचान. फिर मन कहता है अलख निरंजन, जय जदुनंदन, भड़ुकी में चुल्‍लू भर लिये तृप्‍त रहो, बेटा, बात-बात पर चिंता, भंगार के लोहे-सा इतना काहे खड़खड़ाते हो? इसका अंत नहीं है, चीन की दीवार है, ऐसी ऊंचाई की चांदनी तान खुद को क्‍यों उड़ाते हो?

देहात के कुंए पर भीतर गोड़ लटकाये कौनो उज़बक़-सा दांत फैलाये चहकता हूं, या लोबान में लहकते पहुंचे हुए ध्‍यानी, ज्ञानी-सा उद्धत अगरबत्‍ती और आग होने लगता हूं, फिर लगता है रहते-रहते क्‍यों फितूर चढ़ता है, किसे गोली दे रहा हूं, दांतों में ब्‍लेड दबाये, कान जाने किसकी लड़ाई के छर्रों में चिथवाये, तीन टांग का सपनों के फ़रेब में हारा कुत्‍ता हूं, रोटी के फेर में अंगारभरे तंदूर में दौड़ रहा हूं, गरदन पर कोई सुरीलापन तैरता होता की उम्र में उजाड़ किसी क़ि‍ले में फटा कटखनापन भूंक रहा हूं?

अभी-अभी समुंदर से भागकर बाहर आये तीन बच्‍चे हैं, लंगोट लहकाते पेटें खुजा रहे हैं, मालूम नहीं उनका मज़ाक है या मेरी मदहोशी, लग यही रहा है मेरी आंखों में अपनी पतंगें उड़ा रहे हैं..

Friday, October 10, 2008

अ और बं..


स्‍ट्रक्‍चरल इकॉनमी की तुरही बजा रही नियो-लिबरल लन्‍तरानी फ़ि‍लहाल अपना फटा सहला रही है. अलबत्‍ता फटा संभाले में आ नहीं रहा. यूरोप से बाहर फुदकता दुनिया के अलग-अलग देशों में अपने गोड़ फैला रहा है. फटही का प्रकार, व विस्‍तार दोनों ही आनेवाले दिनों में और-और बढ़नेवाला है. हमारी तो पहले ही ईंटें उखड़ी हुई हैं, आपकी दहलीज़ तक न चली आये, कदम ज़रा संभालकर चलें..

(ऊपर की तस्‍वीर बोईंग-बोईंग से साभार)

Tuesday, October 7, 2008

फिर वही शाम.. पियरायी..

संझा की वही चिरपरिचित पियरायी रोशनी थी (गोधूलिबेला की प्राकृतिक नहीं, चालीस वॉट की बिजलीवाली) जिसमें आदमी अंधेपने को प्राप्‍त होता-सा महसूस करता है, या फिर अंधेपने से ऊपर उठी जिजीविषा की मार में निर्लज्‍ज आंखें बावज़ूद जीवन्‍त बनी रहती हैं तो चिथड़ा जीवन की औकात अपनी समस्‍त विविधता में मचल-मचलकर सामने खुलती चलती है. मेरे बाइफ़ोकल चश्‍मे के बाहर यही मनोरम नज़ारा आजू-बाजू की चार गुमटी, गोइंठा समेटती दो चीकट लड़कियों और हारे आसमान के नीचे गिरे हुए रेलवे लाइन के दूसरे छोर तक पसरा दिख रहा था. आंतरिक कर्मठ जिजीविषा के असर में ही होगा मेरी आवाज़ भी गिरी हुई थी. मनोहर, रामधनी का साला और नये कट का लाल फ़्रेमवाला चश्‍मा चढ़ाये वेदप्रतापजी अंधेपने को प्राप्‍त हो चुके होंगे जभी अभी भी उत्‍साहवर्द्धक ओज में मुस्‍कराते हुए पान चुभला रहे थे. सिगरेटवाला अकेला मैं ही था, मगर पियरायी शाम की तर्ज़ पर फ़ि‍लहाल बुझा हुआ था.

मनोहरलाल ने चहककर सबको इत्ति‍ला की कि साल के आखिर तक सिद्धनाथ इलेक्ट्रिक्‍स के बगलवाली दूकान का मामला कचहरी से सलट जायेगा, तो तय है रेलायंस मोबाइल की डीलरशिप में आराम से नोट काटेंगे. और उसमें बहुत माथाफोड़ाई का संकट दिखा तो बैजनाथ के पार्टनरशिप में चायनीज़ रेस्‍टुरेंट तो कहीं गइबे नहींये किया है!

रामधनी के साले ने मुस्‍कराती नज़रों के लाड़ से मेरी ओर देखा. वेदप्रतापजी की बहकी नज़रें जाने क्‍या देख रही थीं, अलबत्‍ता मनोहर की बात पर, या जाने मेरी हालात पर, धीमे-धीमे संतोषप्रद वह मुड़ी ज़रूर हिला रहे थे. अचानक भरे मन सुख के अहसास में मनोहर ने कोई तरन्‍नुम छेड़ने की कोशिश की, मगर पानभरा मुंह गायन की राह में आने लगा तो अंतत: खीझकर गाने का इरादा तज दिया, चुपचाप पान ही चुभलाते रहे. जबकि मैं हतप्रभ, अन्‍य गंभीर प्रश्‍नों के साथ-साथ, इस सवाल पर भी चिंतित होता रहा कि यह रामधानी का साला किस वजह से हमारे गुट में सटा रहता है, और सटे रहने के अनंतर मिनट-मिनट पर इनसे और उनसे नज़र जोड़ता आखिर किस बात पर इस तरह मुस्कियाता रहता है? जबकि मैं कदम-कदम पर नज़रें गिरा लेने को मजबूर होता रहता हूं?..

पता नहीं कोई वाजिब वजह थी या महज़ पियरायी शाम का असर, मैं यह सोचकर फिर कातर होने लगा कि ले मोंद दिप्‍लोमातिक का अंग्रेजी संस्‍करण उपलब्‍ध है लेकिन फ़ि‍लहाल मेरे हाथ में नहीं है? या मेरे हाथ में दैनिक जागरण के पियराये पन्‍ने क्‍यों हैं, ग्रांटा का ताज़ा अंक क्‍यों नहीं? फिर सोचते-सोचते इस बात पर भी ख़ून जलने लगा कि दशहरा आ रहा है मगर अपने पास अपने रावणों को जलाने का कोई साधन नहीं. ठीक-ठीक अपने राम की पहचान का भी नहीं..

कहते हैं दिल की तह से कोई चीज़ मांगो तो वह मुराद पूरी हो जाती है. मैंने अंतर से मचल-मचलकर कहा ऐ हमारी नसीबों के मालिक, हमारी ज़िंदगियों से यह चालीस वॉट की पीली शामें निकल जायें..

मगर कहां.. पियरायी सांझ हौले-हौले अपनी चिथड़ा मदहोशियों में हुमकती रही..

Thursday, October 2, 2008

आसपास..


किताबें होंगी आसपास होंगी
उनको पढ़ने का जतन न होगा
बीच-बीच में रूखी पड़ी उंगलियां
कुम्‍हलाये भुलाये ज़ि‍ल्‍द, पेपरबैक
अचकचायी घबरायी ढूंढ़कर बाहर
करेंगी, टटोलेंगी, फुसफुसाकर हथेलियां
फेरेंगी, जैसे लम्‍बी चोटखायी आवारगी
के बाद घर लौटे बच्‍चे के रूखे बालों में
फेरती है हाथ. मां अंतरंग भरोसे का साथ
इसी दिन के लिए व्‍याहकर लाये थे इस
घर में की तड़पती एक नज़र पूछेगी बिजलियों
के नंगे तारों-सी कितने तो निर्मम प्रियतम सवाल
भरी बोतल की शराब-सा लरकेगा कुछ भीतर
फिर बेहोशी की एक सियाह चादर
में धीरे-धीरे सब घुल जायेगा. तड़पती
एक हिंसा बचेगी, स्‍नेहिल अंतरंगता
का संवाद भूल जायेगा. सूखी उंगलियां
बिनव्‍याही बहनों की तरह सवाल करेंगी इन
हथेलियों में छिपी थी कोई बहार? मुट्ठी भर प्‍यार?
मालूम है, सब कहते हैं, यही कहीं होगा
फटी आंखें ढूंढ़ती रहती हैं, फिर भी मिलता
क्‍यों नहीं? साथ-साथ चलता है, हर सांस
उसकी उपस्थिति है, फिर संगत का तुक
बनता क्‍यों नहीं? हाथ होंगे, गरदन होगी
धूप में चिनकते नंगे कंधों पर छूटते समय
की गर्द होगी, बीत रहे समय का दुलार
न होगा, किताबों की रोशनायी न होगी
रोज़-रोज़ चुक रहा जीवन होगा, सुलगता
सलीकेदार तहज़ीब के चमकते पन्‍ने न होंगे?

फुसफुसाती आवाज़ें मोम की मानिंद
पिघलती चलती हैं, मैं आंखों पर हथेलियां
ढांपें गिनता हूं कितना वक़्त बीता..

किताबें होंगी. आसपास होंगी
उनको पढ़ने का जतन न होगा.

Wednesday, October 1, 2008

संध्‍या समय..

संध्‍या को याद है शाम को छोटी मौसी के साथ वह खटाल आंखों के सामने दुहवाकर भैंस का दूध लाने जाया करती थी. बीच-बीच में पीपल के बड़े पेड़ के नीचे पूंछ से मक्खियां उड़ाती भैंस को लगातार देखकर आंखें दुखाती संध्‍या फिर जिरह सुनती कि पांच लोग सामने खड़े थे तब भी कैसे सोमारु ने दूध में पानी फेंट लिया, और फिर सब भूलकर ऊंचे टीले के बलुआही मिट्टी में लगे हरे-पीले छोटे टमाटरों के पौधों को निरखने निकल जाती, और बाद में घर लौटते हुए, बार-बार टखने खुजाती शिकायत करती कि कल वह छोटी मौसी के साथ नहीं आयेगी क्‍योंकि सोमारु के यहां बहुत मच्‍छड़ काटते हैं, और कल शाम होते ही छोटी मौसी से पहले संध्‍या तैयार होकर स्‍टील का जार लिये बाहर चबूतरे पर जाकर बैठ जाती कि सोमारु के यहां जाना है! जाने हुए रास्‍तों व पहचानी भूमिकाओं के कितने सरल दिन थे सोचकर कभी-कभी संध्‍या की आंखें भर आती हैं. छोटी मौसी की हाईस्‍कूल वाली किताबों में एक फटे किनारोंवाला नोटबुक था जिसमें छोटी मौसी की गोल-गोल हैंडराइटिंग में कहां-कहां के गाने लिखे हुए थे, कुछ गाने छोटी मौसी को जबानी याद थे, कुछ की धुनें बीच-बीच में नोटबुक खोलकर अकेले में प्रैक्टिस करती वह दुरुस्‍त किया करती, और संध्‍या के चले आने पर खीझकर कहती- अब क्‍या है? देखती नहीं मैं प्रैक्टिस कर रही हूं?

संध्‍या बुरा मानकर एक कोने खड़ी रहती, फिर बाहर लौटने की जगह बुदबुदाकर कहती मैं भी प्रैक्टिस करूंगी. ये मुंह और मसूर की दाल वाले ऐसे जवाब के जवाब में छोटी मौसी नोटबुक बंद करके आंखें तरेरती संध्‍या को देखती, और देखती रहती. संध्‍या को छोटी मौसी का इस तरह आंखें तरेरकर देखना अच्‍छा नहीं लगता. वह सोचती रुमा स्‍टोर जाना मेरे बगैर छोटी मौसी से सपरता नहीं, जिस दिन खटाल न जाऊं मौसी का चेहरा उतर जाता है, फिर अपने नोटबुक से छोटी मौसी मुझे इतना दूर-दूर क्‍यों रखती हैं?..

फटे किनारोंवाली गानों के नोटबुक की ही तरह छोटी मौसी के पास और सारे नोटबुक थे, सबके भीतर अलग-अलग रहस्‍यलोक भरा लगता. एक नोटबुक के ऊपर स्‍क्रीन से निकालकर लगाया हुआ ज़ाहिदा का कवर था, एक दूसरे पर मुस्‍कराते हुए अनिल धवन की फ़ोटो थी. अक्‍सर होता कि छोटी मौसी एकदम सीरियस होकर फ़ोटो देखते-देखते दबी आवाज़ में गुनगुनाने लगती- मुझको अपने गले लगा लो, ऐ मेरे हमराही. मुझको कितना प्‍यार है तुमसे ये कैसे बतलाऊं.

छोटी मौसी को इतना उदास देखकर संध्‍या का दिल डूबने लगता, वह पूछे बिना रह नहीं पाती कि हमराही का मतलब क्‍या, छोटी मौसी? मतलब बताने की जगह छोटी मौसी हाथ पकड़कर उसे कमरे से बाहर ले जाती और अकेले वापस लौटकर अंदर से दरवाज़ा बंद कर लेती. बाहर संध्‍या के लाख पैर पटकने और तड़प-तड़पकर दसियों मर्तबा इसकी याद दिलाने पर कि वह फिर कभी भी छोटी मौसी के साथ रुमा स्‍टोर नहीं जायेगी, छोटी मौसी पर इसका कोई असर नहीं पड़ता और बंद दरवाज़े के बाहर के खुले में मुंह फुलाये संध्‍या क़ैद बनी रहती, और तबतक रहती जबतक पड़ोस की सपना के साथ छोटी मौसी का कोई काम नहीं निकल आता..

कमरे के एकांत में सलीके से फ्रॉक सहेजकर, घुटने पर नोटबुक फैलाये फिर संध्‍या एक-एक पन्‍ना उसी सुघड़ता से पलटती मानो वह उसी का नोटबुक हो, और उसके मुंह की दबी गुनगुनाहट उसकी अपनी नहीं मिठास में नहायी छोटी मौसी की आवाज़ हो जो छिटक-छिटककर किसी अदृश्‍य हमराही से गले लगा लेने की गुज़ारिश कर रही हो!

कैसे भले, भोले नोटबुकों के भोले और सरल दिन थे. बाद में छोटी मौसी का नोटबुक सहेजना रह गया, लेकिन संध्‍या लिखने-पढ़नेवाली बनी, उसका संचयन चलता रहा. जिन दिनों थीसीस लिख रही थी उसके पास चमड़े की नक़ल की जिल्‍दवाला एक नोटबुक जोहानेसबर्ग का था, दूसरा क्‍योतो में बना हाथ के काग़ज़ का. किन्‍हीं दिनों क्‍या-क्‍या नहीं हुआ करता था. अब नहीं है. नोटबुक क्‍या, अब तो अचानक ज़रूरत निकल आने पर लिखने के लिए एक अदद काग़ज़ का टुकड़ा भी ढूंढना पड़ता है..

(जारी)