Wednesday, October 1, 2008

संध्‍या समय..

संध्‍या को याद है शाम को छोटी मौसी के साथ वह खटाल आंखों के सामने दुहवाकर भैंस का दूध लाने जाया करती थी. बीच-बीच में पीपल के बड़े पेड़ के नीचे पूंछ से मक्खियां उड़ाती भैंस को लगातार देखकर आंखें दुखाती संध्‍या फिर जिरह सुनती कि पांच लोग सामने खड़े थे तब भी कैसे सोमारु ने दूध में पानी फेंट लिया, और फिर सब भूलकर ऊंचे टीले के बलुआही मिट्टी में लगे हरे-पीले छोटे टमाटरों के पौधों को निरखने निकल जाती, और बाद में घर लौटते हुए, बार-बार टखने खुजाती शिकायत करती कि कल वह छोटी मौसी के साथ नहीं आयेगी क्‍योंकि सोमारु के यहां बहुत मच्‍छड़ काटते हैं, और कल शाम होते ही छोटी मौसी से पहले संध्‍या तैयार होकर स्‍टील का जार लिये बाहर चबूतरे पर जाकर बैठ जाती कि सोमारु के यहां जाना है! जाने हुए रास्‍तों व पहचानी भूमिकाओं के कितने सरल दिन थे सोचकर कभी-कभी संध्‍या की आंखें भर आती हैं. छोटी मौसी की हाईस्‍कूल वाली किताबों में एक फटे किनारोंवाला नोटबुक था जिसमें छोटी मौसी की गोल-गोल हैंडराइटिंग में कहां-कहां के गाने लिखे हुए थे, कुछ गाने छोटी मौसी को जबानी याद थे, कुछ की धुनें बीच-बीच में नोटबुक खोलकर अकेले में प्रैक्टिस करती वह दुरुस्‍त किया करती, और संध्‍या के चले आने पर खीझकर कहती- अब क्‍या है? देखती नहीं मैं प्रैक्टिस कर रही हूं?

संध्‍या बुरा मानकर एक कोने खड़ी रहती, फिर बाहर लौटने की जगह बुदबुदाकर कहती मैं भी प्रैक्टिस करूंगी. ये मुंह और मसूर की दाल वाले ऐसे जवाब के जवाब में छोटी मौसी नोटबुक बंद करके आंखें तरेरती संध्‍या को देखती, और देखती रहती. संध्‍या को छोटी मौसी का इस तरह आंखें तरेरकर देखना अच्‍छा नहीं लगता. वह सोचती रुमा स्‍टोर जाना मेरे बगैर छोटी मौसी से सपरता नहीं, जिस दिन खटाल न जाऊं मौसी का चेहरा उतर जाता है, फिर अपने नोटबुक से छोटी मौसी मुझे इतना दूर-दूर क्‍यों रखती हैं?..

फटे किनारोंवाली गानों के नोटबुक की ही तरह छोटी मौसी के पास और सारे नोटबुक थे, सबके भीतर अलग-अलग रहस्‍यलोक भरा लगता. एक नोटबुक के ऊपर स्‍क्रीन से निकालकर लगाया हुआ ज़ाहिदा का कवर था, एक दूसरे पर मुस्‍कराते हुए अनिल धवन की फ़ोटो थी. अक्‍सर होता कि छोटी मौसी एकदम सीरियस होकर फ़ोटो देखते-देखते दबी आवाज़ में गुनगुनाने लगती- मुझको अपने गले लगा लो, ऐ मेरे हमराही. मुझको कितना प्‍यार है तुमसे ये कैसे बतलाऊं.

छोटी मौसी को इतना उदास देखकर संध्‍या का दिल डूबने लगता, वह पूछे बिना रह नहीं पाती कि हमराही का मतलब क्‍या, छोटी मौसी? मतलब बताने की जगह छोटी मौसी हाथ पकड़कर उसे कमरे से बाहर ले जाती और अकेले वापस लौटकर अंदर से दरवाज़ा बंद कर लेती. बाहर संध्‍या के लाख पैर पटकने और तड़प-तड़पकर दसियों मर्तबा इसकी याद दिलाने पर कि वह फिर कभी भी छोटी मौसी के साथ रुमा स्‍टोर नहीं जायेगी, छोटी मौसी पर इसका कोई असर नहीं पड़ता और बंद दरवाज़े के बाहर के खुले में मुंह फुलाये संध्‍या क़ैद बनी रहती, और तबतक रहती जबतक पड़ोस की सपना के साथ छोटी मौसी का कोई काम नहीं निकल आता..

कमरे के एकांत में सलीके से फ्रॉक सहेजकर, घुटने पर नोटबुक फैलाये फिर संध्‍या एक-एक पन्‍ना उसी सुघड़ता से पलटती मानो वह उसी का नोटबुक हो, और उसके मुंह की दबी गुनगुनाहट उसकी अपनी नहीं मिठास में नहायी छोटी मौसी की आवाज़ हो जो छिटक-छिटककर किसी अदृश्‍य हमराही से गले लगा लेने की गुज़ारिश कर रही हो!

कैसे भले, भोले नोटबुकों के भोले और सरल दिन थे. बाद में छोटी मौसी का नोटबुक सहेजना रह गया, लेकिन संध्‍या लिखने-पढ़नेवाली बनी, उसका संचयन चलता रहा. जिन दिनों थीसीस लिख रही थी उसके पास चमड़े की नक़ल की जिल्‍दवाला एक नोटबुक जोहानेसबर्ग का था, दूसरा क्‍योतो में बना हाथ के काग़ज़ का. किन्‍हीं दिनों क्‍या-क्‍या नहीं हुआ करता था. अब नहीं है. नोटबुक क्‍या, अब तो अचानक ज़रूरत निकल आने पर लिखने के लिए एक अदद काग़ज़ का टुकड़ा भी ढूंढना पड़ता है..

(जारी)

4 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर पीस भाई जी!!

    नोटबुक क्‍या, अब तो अचानक ज़रूरत निकल आने पर लिखने के लिए एक अदद काग़ज़ का टुकड़ा भी ढूंढना पड़ता है...

    जिंदा पीस!!वाह!

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  2. बहुत सुंदर जीवन्त भाव और विचार चित्रण। आप का पढ़ा हमेशा समय मांगता है। मैं हूँ कि अपनी अयोग्यता के कारण आप का लिखा पढ़ने से महरूम रह जाता हूँ।

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  3. इतना अच्छा ब्लाग मैने पहले क्यो नही पढा इसका थोडा अफ़सोस हुआ मुझे !चलिये देर आये दुरुस्त आये !!इरफ़ान जी को टटोलते सही जगह पहुंच ही गयें॥

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