Thursday, October 2, 2008

आसपास..


किताबें होंगी आसपास होंगी
उनको पढ़ने का जतन न होगा
बीच-बीच में रूखी पड़ी उंगलियां
कुम्‍हलाये भुलाये ज़ि‍ल्‍द, पेपरबैक
अचकचायी घबरायी ढूंढ़कर बाहर
करेंगी, टटोलेंगी, फुसफुसाकर हथेलियां
फेरेंगी, जैसे लम्‍बी चोटखायी आवारगी
के बाद घर लौटे बच्‍चे के रूखे बालों में
फेरती है हाथ. मां अंतरंग भरोसे का साथ
इसी दिन के लिए व्‍याहकर लाये थे इस
घर में की तड़पती एक नज़र पूछेगी बिजलियों
के नंगे तारों-सी कितने तो निर्मम प्रियतम सवाल
भरी बोतल की शराब-सा लरकेगा कुछ भीतर
फिर बेहोशी की एक सियाह चादर
में धीरे-धीरे सब घुल जायेगा. तड़पती
एक हिंसा बचेगी, स्‍नेहिल अंतरंगता
का संवाद भूल जायेगा. सूखी उंगलियां
बिनव्‍याही बहनों की तरह सवाल करेंगी इन
हथेलियों में छिपी थी कोई बहार? मुट्ठी भर प्‍यार?
मालूम है, सब कहते हैं, यही कहीं होगा
फटी आंखें ढूंढ़ती रहती हैं, फिर भी मिलता
क्‍यों नहीं? साथ-साथ चलता है, हर सांस
उसकी उपस्थिति है, फिर संगत का तुक
बनता क्‍यों नहीं? हाथ होंगे, गरदन होगी
धूप में चिनकते नंगे कंधों पर छूटते समय
की गर्द होगी, बीत रहे समय का दुलार
न होगा, किताबों की रोशनायी न होगी
रोज़-रोज़ चुक रहा जीवन होगा, सुलगता
सलीकेदार तहज़ीब के चमकते पन्‍ने न होंगे?

फुसफुसाती आवाज़ें मोम की मानिंद
पिघलती चलती हैं, मैं आंखों पर हथेलियां
ढांपें गिनता हूं कितना वक़्त बीता..

किताबें होंगी. आसपास होंगी
उनको पढ़ने का जतन न होगा.

8 comments:

  1. कितना खूबसूरत है ,अज़दक का अन्तरंग !

    ReplyDelete
  2. फुसफुसाती आवाज़ें मोम की मानिंद
    पिघलती चलती हैं, मैं आंखों पर हथेलियां
    ढांपें गिनता हूं कितना वक़्त बीता..

    ये लाइने दिल को छु गयी !!बेहद उम्दा !!बेहतरीन !!आभार

    ReplyDelete
  3. आपकी बात सुंदर है, मार्मिक भी। यह पढ़ते हुए न जाने क्यों रघुवीर सहाय की याद आई, शायद आपने जो फॉर्म चुना या जिस फॉर्म में यह कविता व्यक्त हुई...

    ReplyDelete
  4. बढिया रचना है।




    आप सभी को गाँधी जी, शास्त्री जी की जयंति व ईद की बहुत बहुत बधाई।

    ReplyDelete
  5. the candle burns at the other end too .. and if you are good ..the book will read you as well ..

    ReplyDelete
  6. गजब कि वक्‍तृता है। विचारों का कलाइडोस्कोप बनाते हैं आप।

    ReplyDelete
  7. फटी आंखें ढूंढ़ती रहती हैं, फिर भी मिलता
    क्‍यों नहीं? साथ-साथ चलता है, हर सांस
    उसकी उपस्थिति है, फिर संगत का तुक
    बनता क्‍यों नहीं?

    हमेशा पढ़कर सोच में डूबने की मजबूरी।

    ReplyDelete
  8. खूबसूरत !!आनन्द आ गया.

    ReplyDelete