Tuesday, October 7, 2008

फिर वही शाम.. पियरायी..

संझा की वही चिरपरिचित पियरायी रोशनी थी (गोधूलिबेला की प्राकृतिक नहीं, चालीस वॉट की बिजलीवाली) जिसमें आदमी अंधेपने को प्राप्‍त होता-सा महसूस करता है, या फिर अंधेपने से ऊपर उठी जिजीविषा की मार में निर्लज्‍ज आंखें बावज़ूद जीवन्‍त बनी रहती हैं तो चिथड़ा जीवन की औकात अपनी समस्‍त विविधता में मचल-मचलकर सामने खुलती चलती है. मेरे बाइफ़ोकल चश्‍मे के बाहर यही मनोरम नज़ारा आजू-बाजू की चार गुमटी, गोइंठा समेटती दो चीकट लड़कियों और हारे आसमान के नीचे गिरे हुए रेलवे लाइन के दूसरे छोर तक पसरा दिख रहा था. आंतरिक कर्मठ जिजीविषा के असर में ही होगा मेरी आवाज़ भी गिरी हुई थी. मनोहर, रामधनी का साला और नये कट का लाल फ़्रेमवाला चश्‍मा चढ़ाये वेदप्रतापजी अंधेपने को प्राप्‍त हो चुके होंगे जभी अभी भी उत्‍साहवर्द्धक ओज में मुस्‍कराते हुए पान चुभला रहे थे. सिगरेटवाला अकेला मैं ही था, मगर पियरायी शाम की तर्ज़ पर फ़ि‍लहाल बुझा हुआ था.

मनोहरलाल ने चहककर सबको इत्ति‍ला की कि साल के आखिर तक सिद्धनाथ इलेक्ट्रिक्‍स के बगलवाली दूकान का मामला कचहरी से सलट जायेगा, तो तय है रेलायंस मोबाइल की डीलरशिप में आराम से नोट काटेंगे. और उसमें बहुत माथाफोड़ाई का संकट दिखा तो बैजनाथ के पार्टनरशिप में चायनीज़ रेस्‍टुरेंट तो कहीं गइबे नहींये किया है!

रामधनी के साले ने मुस्‍कराती नज़रों के लाड़ से मेरी ओर देखा. वेदप्रतापजी की बहकी नज़रें जाने क्‍या देख रही थीं, अलबत्‍ता मनोहर की बात पर, या जाने मेरी हालात पर, धीमे-धीमे संतोषप्रद वह मुड़ी ज़रूर हिला रहे थे. अचानक भरे मन सुख के अहसास में मनोहर ने कोई तरन्‍नुम छेड़ने की कोशिश की, मगर पानभरा मुंह गायन की राह में आने लगा तो अंतत: खीझकर गाने का इरादा तज दिया, चुपचाप पान ही चुभलाते रहे. जबकि मैं हतप्रभ, अन्‍य गंभीर प्रश्‍नों के साथ-साथ, इस सवाल पर भी चिंतित होता रहा कि यह रामधानी का साला किस वजह से हमारे गुट में सटा रहता है, और सटे रहने के अनंतर मिनट-मिनट पर इनसे और उनसे नज़र जोड़ता आखिर किस बात पर इस तरह मुस्कियाता रहता है? जबकि मैं कदम-कदम पर नज़रें गिरा लेने को मजबूर होता रहता हूं?..

पता नहीं कोई वाजिब वजह थी या महज़ पियरायी शाम का असर, मैं यह सोचकर फिर कातर होने लगा कि ले मोंद दिप्‍लोमातिक का अंग्रेजी संस्‍करण उपलब्‍ध है लेकिन फ़ि‍लहाल मेरे हाथ में नहीं है? या मेरे हाथ में दैनिक जागरण के पियराये पन्‍ने क्‍यों हैं, ग्रांटा का ताज़ा अंक क्‍यों नहीं? फिर सोचते-सोचते इस बात पर भी ख़ून जलने लगा कि दशहरा आ रहा है मगर अपने पास अपने रावणों को जलाने का कोई साधन नहीं. ठीक-ठीक अपने राम की पहचान का भी नहीं..

कहते हैं दिल की तह से कोई चीज़ मांगो तो वह मुराद पूरी हो जाती है. मैंने अंतर से मचल-मचलकर कहा ऐ हमारी नसीबों के मालिक, हमारी ज़िंदगियों से यह चालीस वॉट की पीली शामें निकल जायें..

मगर कहां.. पियरायी सांझ हौले-हौले अपनी चिथड़ा मदहोशियों में हुमकती रही..

4 comments:

  1. दशहरा आ रहा है मगर अपने पास अपने रावणों को जलाने का कोई साधन नहीं. ठीक-ठीक अपने राम की पहचान का भी नहीं..

    अत्यंत सही बात कही आपनें

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  2. उन अधिकांश लोगों की कितनी बुरी स्थिति होगी जिन्‍हें चालीस वाट की पियरायी रोशनी भी नसीब नहीं। उनके जीवन की सांझ ढिबरी की स्‍याह कालिख में ही कहीं गुम हो जाती होगी..

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  3. पियरायी सांझ को हौले-हौले अपना काज करने दिजिये..आप अपना करिये-सांझ पर आपन कौन बस-खैर, सो तो आप पर भे कहाँ!! बहुत धासूं लिखे हैं भाई!!

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