Friday, October 10, 2008

अ और बं..


स्‍ट्रक्‍चरल इकॉनमी की तुरही बजा रही नियो-लिबरल लन्‍तरानी फ़ि‍लहाल अपना फटा सहला रही है. अलबत्‍ता फटा संभाले में आ नहीं रहा. यूरोप से बाहर फुदकता दुनिया के अलग-अलग देशों में अपने गोड़ फैला रहा है. फटही का प्रकार, व विस्‍तार दोनों ही आनेवाले दिनों में और-और बढ़नेवाला है. हमारी तो पहले ही ईंटें उखड़ी हुई हैं, आपकी दहलीज़ तक न चली आये, कदम ज़रा संभालकर चलें..

(ऊपर की तस्‍वीर बोईंग-बोईंग से साभार)

9 comments:

  1. एक आवाज कांपती हुई कहती है- डरो मत हमें कुछ न होगा!

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  2. वित्त मंत्री का भी मोजा फटने वाला होगा। बहुत पहने लिये और खा लिए सेल का माल। अब इकोनमी में नमी आ गई है। बाज़ार ने सरकार हुज़ूर के सामने गुहार लगाई है। सरकार हुजूर ने भी माई बाप के ओहदे का ख्याल रखते हुए साठ हज़ार करोड़ दे दिया है। एक्के दिन में। किसानों का २० हज़ार करोड़ कुछ साल में चरणबद्ध तरीके से माफ होने वाला है।

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  3. वित्त मंत्री का मोजा भी फट चुका होगा। इकोनमी से इको गायब हो गया है नमी रह गई है। जो सरल हिंदी में मंदी कहला रही है। सहला रही है बाज़ार वालों की। बाज़ार ने भी माई बाप सरकार हुज़ूर से गुहार की है। फटे मोजा से जितना निकल सकता था सरकार हुज़ूर ने निकाल कर दे दिया है।

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  4. अब कहाँ-कहाँ गोड संभालें, ससुर जहाँ देखो वहीं फर्र से फटा है...महाराष्ट्र मे भीतरी-बाहरी, कश्मीर मे बाहरी-बाहरी, उडीसा मे बाहर न अंदर .....सब जगह तो फटेहाल हैं अब इससे ज्यादे का फटेंगे, और फट गये तो भी क्या...हम कहेंगे - फटना हमारी नियति है..न फटे तो ही आश्चर्य करें।

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  5. क्या परेशान हों। हमारा मोजा तो फटा था, है, रहेगा। :-)

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  6. आपकी उखड़ी हुई एक ईंट से हमारा गोड़ चोटिल हो गया. हम सोच रहे हैं उसी ईंट से ए गो घर बना डालें....:-)

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  7. जो पहल से ही फटही में गुजर कर रहा हो उसे क्‍या..लेकिन यह सब पढ़-सुन कर अच्‍छा नहीं लग रहा है..

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  8. फाटल-चिरकुट तो हम पहने ही हैं अब का होगा? जो होगा उ झेलने की आदत तो है ही अपने को !

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  9. भविष्य की ओर उम्मीद और टकटकी बाँधे हम भारतीय , शायद कल फ़िर से सुधरे !

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