Monday, October 13, 2008

भड़ुकी भर अनुसंधान

तक़लीफ़ होगी मुंह पर और तक़लीफ़ की चादर गिराकर सड़क पर बहकता किसी अजनबी ज़बान का गाना गाने लगूंगा. ट्रैफिक की चिल्‍ल-चां, हदर-बदर नहीं दिखेगी, दिखेगा कैसा तो बियाबान, हज़ारों वर्षों का इतिहास से बाहर सूना पड़ा रेगिस्‍तान है, नशे की नाद से जबड़ा लगाये मैं कोई काफ़ि‍र ऊंट हूं, अपनी सहूलियत में बदलता रोज़ किसिम-किसिम के झूठ हूं, कहां जा रहा हूं? या उतरा था किसी तीस हज़ारी रंगीन बायस्‍कोप में, अब लौटकर अपने में आ रहा हूं?

अचानक मचलकर सर्च इंजन में टीपकर पकड़ना चाहता हूं राष्‍ट्रीय परायेपन का ठीक-ठीक बयान, अपने दुचित्‍तेपने का असंभव अनुसंधान, किसी तरह हाथ आये सिरा ऐसी कोई पहचान. फिर मन कहता है अलख निरंजन, जय जदुनंदन, भड़ुकी में चुल्‍लू भर लिये तृप्‍त रहो, बेटा, बात-बात पर चिंता, भंगार के लोहे-सा इतना काहे खड़खड़ाते हो? इसका अंत नहीं है, चीन की दीवार है, ऐसी ऊंचाई की चांदनी तान खुद को क्‍यों उड़ाते हो?

देहात के कुंए पर भीतर गोड़ लटकाये कौनो उज़बक़-सा दांत फैलाये चहकता हूं, या लोबान में लहकते पहुंचे हुए ध्‍यानी, ज्ञानी-सा उद्धत अगरबत्‍ती और आग होने लगता हूं, फिर लगता है रहते-रहते क्‍यों फितूर चढ़ता है, किसे गोली दे रहा हूं, दांतों में ब्‍लेड दबाये, कान जाने किसकी लड़ाई के छर्रों में चिथवाये, तीन टांग का सपनों के फ़रेब में हारा कुत्‍ता हूं, रोटी के फेर में अंगारभरे तंदूर में दौड़ रहा हूं, गरदन पर कोई सुरीलापन तैरता होता की उम्र में उजाड़ किसी क़ि‍ले में फटा कटखनापन भूंक रहा हूं?

अभी-अभी समुंदर से भागकर बाहर आये तीन बच्‍चे हैं, लंगोट लहकाते पेटें खुजा रहे हैं, मालूम नहीं उनका मज़ाक है या मेरी मदहोशी, लग यही रहा है मेरी आंखों में अपनी पतंगें उड़ा रहे हैं..

2 comments:

  1. बहुत सुंदर पंक्तियाँ हैं.........बहुत सही कहा आपने.

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  2. अचानक मचलकर सर्च इंजन में टीपकर पकड़ना चाहता हूं राष्‍ट्रीय परायेपन का ठीक-ठीक बयान॥

    अद्भुत संयोजन !!आपको समझने के लिये समय की दरकार होती है!!

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