Friday, October 17, 2008

प्रतिभा की नियति पतन, और सिर्फ़ पतन है?

सवाल ज़रा उलझा, व अरविन्‍द अदिगा की लेखकीय ऊंचाई को पढ़ लेने से कहीं ज़्यादा की समीक्षात्‍मक समझ की मांग करता है, मगर तीन कदम पीछे जाकर, व वापस नज़दीक आकर दुबारा पढ़ि‍ये तो कुछ ऐसा उलझा हुआ नहीं भी है. खास तौर पर मुझसे तीक्ष्‍ण मस्तिष्‍क वाले प्रतिभानिष्‍णात के लिए तो नहीं ही है जो यूं भी अदिगा-पदिगा की लेखकीय ऊंचाइयों से चार नहीं, चौदह फीट ऊपर रहकर भारतीय लेखन पर नज़र मारता है. और मारता है भी तो उसे अंग्रेज़ी के कॉम्‍प्‍लेसेंट चश्‍मे से जांचने की जगह, चेक, किरगीज़ व स्‍वाहिली लेंसों से परखने में कहीं ज़्यादा यक़ीन करता है! मगर.. देखिये, सवाल पर से ठीक से परदा नहीं उठा और मैं हूं कि आलरेडी उसपर सियाही गिराने लगा. कहने का मतलब सवालविमुख होने लगा. प्रतिभा के अतिरेक के यही नतीजे होते हैं. आप सवाल करिये अफ़ग़ानिस्‍तान के मौज़ूदा संकट की वज़हें क्‍या हैं. प्रतिभाप्रसूत व्‍यक्ति- यानी मैं- ऐसे मासूम सीधे सवाल का सीधा जवाब देने की जगह अमरीकी विदेशनीति के गहर में उतर जायेगा. और गहर में इतने सारे व ऐसे-ऐसे चक्‍कर काटता रहेगा कि सवाल करनेवाले की अफ़ग़ानिस्‍तान के तथाकथित संकट में ही नहीं, मानवता के कैसे भी संकट व संबद्ध सवालों में दिलचस्‍पी ख़त्‍म हो जायेगी. माने सीधा सवाल है प्रतिभा की नियति पतन, और सिर्फ़ पतन है? उसमें उतरने की जगह, देखिये, मैं बाहर-बाहर दौड़ता किस-किस तरह के पोज़ मार रहा हूं? प्रतिभातिरेक का एक लक्षण यह भी है. यही पोज़ मारते रहना. मगर मेरे पैर, व मुंह पर चढ़े भाव दुख रहे हैं तो मैं अब और पोज़ नहीं मारूंगा, उलझे सवाल का तथाकथित सीधा-सीधा जवाब पकड़ने की कोशिश करूंगा.

कभी-कभी लगता है पता नहीं किस बौद्धिक भुरभसपने की बहक में पोज़ लेकर फ्रांसिस फुकुयामा ने इतिहास का अंत जैसे फ़तवेदार स्‍टेटमेंट दे दिया था, जबकि ऐतिहासिक सच्‍चायी अब ज़्यादा यह लग रही है कि बहुत सारे सवाल मुंह बाकर सामने खड़े हो गये हैं, जिनका जवाब फुकुयामा तो क्‍या हमारे जैसे पहुंचे हुए बुद्धिजीवियों दे नहीं पा रहे (जवाब के सीधेपन को तथाकथित से विशेषित करने के मोह का इसीलिए संवरण न कर सका!). माने कोई माई का बौद्धिक लाल सामने आकर बता दे अमरीकी इकॉनमी किधर जा रही है? या आनेवाले वक़्तों में विदेशनीति किधर से निकलकर किधर घुस जायेगी? या हमारे यहां आरबीआई में जो डॉलर का रिर्ज़व है, और जितनी डॉलरीय नाटकीय कमाई होनी थी हो गयी, आनेवाले समय में अब बहुत नहीं होनेवाली है, तो यह जो मुक्‍तबाज़ारी नवभारत की सारी तरक़्क़ी डॉलर-केंद्रित थी, डॉलरी बादलों के छंटने के बाद घंटा क्‍या केंद्रित रहेगी, और न रहेगी तो नवभारत की तरक़्क़ी किधर घुसकर किधर से निकल आयेगी, इसका कोई बापपुत्र ठीक-ठीक जवाब देगा? दे पायेगा? मैं देने की सोचते-सोचते इकॉनमिस्‍ट के ताज़ा अंक के पीडीएफ फ़ाइलों को डाऊनलोड करने की पतली गली में निकल लेता हूं..

बाबा मार्क्‍स ने पता नहीं किस बंगालन की संगत में भांग पीकर, या किसी बिहारिन की मुहब्‍बत में चचा ग़ालिब का शेर पढ़कर भावुकता की पीनक में कभी कह दिया था कि एक दिन पूंजीवाद का नाश होगा और उसके अनंतर सर्वहारा-शासन में सब छककर मौज़-मज़े का जीवन जीयेंगे. बाबा मार्क्‍स को आज कोई उनके कब्र से बहरिया कर अपने कहे का जवाब पूछने लगे तो बाबा की घिग्‍घी बंध जायेगी और बुढ़वा छटपटाकर एक बार फिर भांग-भांग करने लगेगा! माने पूंजीहारा, या चलिये, पूंजीविजयी ही, ससुर, वह कौन शासन होगा भला जिसमें आमजन मौज़-मज़े का जीवन जियेगी? सबको पीने का पानी व खाने को अन्‍न मिल जाये वही अब छप्‍पनभोग माफिक सपना हुआ जा रहा है, और आप मौज़-मज़े की बात पेल रहे थे? इकॉलाजी को आपको कुच्‍छो ध्‍यान-ट्यान गया था कि नहीं, जर्मन महामनीषी?..

प्रतिभा कितना आत्‍ममुदित, आत्‍मदग्‍ध रहती है इसका बुढ़वा बाबा से बड़ा प्रमाण और क्‍या मिलेगा? पूंजीवाद के बारे में इतना सोच लिये लेकिन पूंजीवाद पर्यावरण की कितना और कहां-कहां मां-बहिन करेगी, इसको सोचने से रह गए! पोस्‍ट के शीर्षक में हमने प्रतिभा का पतन ऐसे ही नहीं डाला है, उसके पीछे लॉजिक काम कर रही है. अब ज़रा इकॉलाजी वाले लॉजिक पर लौटिये! अमरीका में प्रतिहज़ार व्‍यक्ति पर 480 कार की खपत है, सारी दुनिया में अपनी मैनुफैक्‍चरिंग ठेल चुकने पर भी चीन में अब भी प्रतिहज़ार पर 10 कार की ही खपत है. बाबा मार्क्‍स वाले बिंदास मौज़-मज़े के रस्‍ते पर चलते हुए अब ज़रा क़यास लगायें कि चीन भी अमरीका से आगे नहीं तो कम से कम अमरीका के प्रतिहज़ार पर 480 कारों की खपतवाले बराबरी के मार्क पर पहुंच गया है. परिणाम क्‍या होगा? यह होगा कि इतने मात्रा में प्रदूषण होगा कि आप भले अपने घर में जमे रहें, हमारे जैसे और शर्मसार होंगे, अदबदाकर सांस लेने के लिए पृथ्‍वी से बाहर निकल जायेंगे! मैं नहीं कह रहा, मेरा दिमाग नहीं खराब हुआ कि नैनो की बुकिंग करवानेवालों की लात खाऊं, प्रमोद नहीं ऑक्‍सफोर्ड में पढ़ानेवाले कोई प्रीतम सिंह हैं, ईपीडब्‍ल्‍यू में बहक रहे हैं..

वर्ल्‍डवॉच इंस्टिट्यूट का एक 2006 की रपट रेखांकित करती है कि बाकी दुनिया की रहने दें, महज़ चीन और भारत ने अमरीका के स्‍तर का स्‍त्रोतों का दोहन व उसी अनुपात का प्रदुषण फैलाना शुरू कर दिया तो उसे सस्‍टेन करने के लिए एक नहीं, हमें दो-दो पृथ्वियों की ज़रूरत पड़ेगी!

बहुत सारे सवाल हैं. जवाब नहीं है. प्रतिभा की नियति पतन है का है. उसका है. मैं स्‍वयं हूं. प्रत्‍यक्ष प्रमाण हूं. रोज़ देख रहा हूं सवाल बढ़ रहे हैं मगर अपनी प्रतिभा से उन्‍हें काट दूं यह हो नहीं पा रहा. रोज़ कुछ और कतरा-कतरा हुआ जा रहा हूं. जबकि कुछ लोग हैं हमारी तरह समय व सवालों की वेदी पर कटने की जगह पेड़ व पंछी निहार रहे हैं, स्‍वास्‍थ्‍य सुधार रहे हैं! ईश्‍वर उन्‍हें सुखी रखे, हम सबकी सवालकट शुभकामनायें उनतक पहुंचाये..

(अभय के लिए. मुझे गरियाने में भले सकुचा लें, भले आदमी को बधाई देने में मत शरमाइयेगा. बच्‍चे का आज जन्‍मदिन है.)

11 comments:

  1. जी हां। आजकल इहे फैसन न है।

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  2. हफाई छूट गई..फिर से आवेंगे जरुर..मगर अभी तो दब के निकलते हैं.

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  3. खूब सारे हैं और धांसू हैं। सवालों से जूझना बड़ा जटिल काम हैं। कहते हैं जूझकर भी क्या कल्लेंगे? इसीलिये चद्दर ओढ़कर सो
    जाते हैं। अभय को जन्मदिन की गुलगुली बधाइयां!

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  4. जे मरकस बाबा फिर याद आने लगे हैं।

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  5. हे अजदकीय पीडा से त्रस्त मानुष , अचानक तुम्हे ये क्या हो गया है जो इतना लंबा पाठ एक साथ पढाने लगे हो ,मित्र कुनैन की गोलॊ एक ही काफ़ी होती है पूरा डब्बा खिलाने से से क्या फ़ायदा :०

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  6. बब्बा के किए धरे की व्याख्या में काहे अपनी बुद्धि खपाते हैं..
    क्या कहा...इसे धार चढ़ाना कहते हैं ...ओहो...त फिर चढ़ाइये...हम भी चद्दर तानते है..

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  7. आज कापी कलम लेकर बैठे थे क्या? देखकर लगता है जैसे की-बोर्ड पर अंगुली नहीं बल्कि कापी पर कलम चला दिए हैं.

    अभय जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.

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  8. @सीकुमार,
    कापी कलम नहीं काफ़ी और सितम लेके बैठे थे. इच्‍छा तो यह भी थी कि बगल में कौनो डालरवाला ब्रीफकेस लेके बैठते, डालर तो घंटा कंहवा ले भेटाता, पता चला घर में एगो ब्रीफकेसो तक नहीं है..

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  9. बाबा मार्क्स की बात सही लगी !! चिंता और सवाल बिना जवाब के हजम नही होते !!वैसे जिंदगी भी एक सवाल है
    जिसे करते है सभी हल
    पर सभी के जवाब होते है
    आधे-अधुरे और गलत !

    (ये लाईने कही पढी थी )

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  10. janmadin thik-thak nibat gaya.. badhaiyan kaam aai

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  11. इकोलॉजी को साधने से बब्बा रह गये या उनके वर्ग-धकियाउ चेले चपाटे उनको पूरी तरह समझने में...

    जॉन बेल्लामी फॉस्टर, पॉल बर्केट जैसों ने बिसरे सिरे को थोड़ा पकड़ा है.....लेकिन मार्क्सवादी नामधारी पार्टियों के सामने किसका पतन हुआ और किसका शीघ्रपतन जैसी ज़रुरी बहसें हैं....

    http://pubs.socialistreviewindex.org.uk/isj96/foster.htm#30

    http://www.monthlyreview.org/ecologyvcap.htm

    http://www.amazon.com/Marx-Nature-Red-Green-Perspective/dp/0312219407

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