Tuesday, October 28, 2008

दिवाला समझ.. उर्फ़ आई वॉज़ नॉट देयर..

बिहार के होनहार बच्‍चों के सामने मालूम नहीं फ़ि‍लहाल क्‍या रास्‍ते हैं. जो होनहार नहीं हैं वे तो खींसें निपोरे बिहार में रोज़ पिट ही रहे हैं (इस पिटने की बहुविध परतें हैं, बहुत बार साफ़-साफ़ दिखती हैं, बहुत बार धुंधलके में अपना बहारी-बयार बुनती रहती हैं), हाथ कंगन को आरसी क्‍या की होनहारी की परख में निकले बकिया बाहर आकर पिटने की एक बड़ी सच्‍चायी का सामना कर रहे हैं, उसके बाद अपनी हिम्‍मत व होनहारी की व्‍याख्‍या बिहार में तोड़फोड़ मनाते हुए कर रहे हैं. तेईस वर्षीय राहुल राज ने होनहारी के इस लोकप्रिय व प्रचलित व्‍याख्‍या को ज़रा बदल दिया; बाहर आकर उसकी अभी पिटाई नहीं हुई थी, लेकिन वह अजनबी, अजाने भभ्‍भड़ भरे शहर में चीख़-चीख़कर पीटने को ललकार रहा था. दो दिन पहले मैंने एक्‍सप्रेस में छपे विनय सीतापति के एक लेख का लिंक दिया था जिसकी शुरुआत मुंबई की हवलदारी में लगे कोल्‍हापुर के पांडुरंग देसाई की हतप्रभावस्‍था के विशद चित्र से हुई थी. राहुल राज के चित्र इसी बौखलाये हतप्रभावस्‍था का एक्‍सटेंशन हैं. फर्क़ बस इतना है कि शहरी आलोड़न की इस राजनीतिक खींचतान में पांडुरंग देसाई के पास पीटने के अधिकार हैं, तेईस वर्षीय राहुल राज के पास न केवल वह अधिकार नहीं था, उस अधिकार को क्‍लेम करने की कोशिश में होनहार बच्‍चे को अपनी जान गंवानी पड़ी.

मुंबई की पुलिस होनहार होती तो- हाथ या पैर घायल करवाकर- राहुल शायद अभी ज़ि‍न्‍दा रहता. मगर, फिर, तब मुंबई की राजनीति का दिवालियापन नहीं रहता. गुंडई और लंठई के सही संकेत, सिग्‍नेचर ज़ि‍न्‍दा नहीं रहते. इस उलझाव को पढ़ने की शायद तेईस वर्ष के होनहार राहुल में सामर्थ्‍य नहीं थी. वर्ना वह मुंबई में होने, व अपने को व्‍यक्‍त करने के दूसरे तरीके आजमाता. हाल में देखी टॉड हेंस की फ़ि‍ल्‍म ‘आई अम नॉट देयर’ के आखिर में एक क़ि‍रदार की कही पंक्तियां दिमाग में बज रही थीं:

“People are always talking about freedom. Freedom to live a certain way, without being kicked around. Course, the more you live a certain way, the less it feels like freedom. Me? I can change during the course of a day. I wake and I'm one person, and when I go to sleep, I know for certain I'm somebody else. I don't know who I am, most of the time. It's like you got yesterday, today, and tomorrow, all in the same room. There's no tellin' what can happen.”

बीइंग नॉट देयर- नॉट इन इ कन्‍वेंशनल सेंस- परहेप्‍स ईज़ द ओन्‍ली वे दीज़ नैस्‍टी टाइम्‍स कैन सेव होनहार बिहारी बच्‍चाज़ बोथ इनसाइड बिहार, एंड आऊट ऑफ़ ईट..

6 comments:

  1. आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

    समीर लाल
    http://udantashtari.blogspot.com/

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  2. Bahut sundar sabd chitran. Deepavali ke deepakon ka prakash aapke jeevan path ko aalokit karta rahe aur aapke lekhan ka margdarshan karta rahe, yahi shubh kamnayen.

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  3. बिहार में ७७ से ८० तक रही । जब तब रद्द होती परीक्षाएँ, चोरी डाके, बसों में भेड़ बकरियों से लदे लोग , परन्तु कितने अच्छे लोग ! ये ही लोग जब बिहार से बाहर आते हैं तो सफल भी हो जाते हैं ।

    आपको व आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ।
    घुघूती बासूती

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  4. ये वाला राहुल कोई राजीव या प्रमोद का कुलदीपक थोड़े ही था जो सिल्वर स्पून इन माउथ के साथ पैदा होते हैं. उसे तो होनहारी साबित करनी थी, दुर्भाग्य से नहीं कर सका. दो चार को चटका चुकता तो शायद ज्यादा नाम कमा कर जाता.

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  5. बिहार को शायद फ़िर चाणक्य़ और चंद्रगुप्त चाहिये और भारत को गांधी !!

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