Sunday, October 26, 2008

अस्थिरता पैदा करनेवाली ताक़तें..

सुगिनिया होती तो मुंह पर आंचल दाबकर कहने से बाज नहीं आती कि मूस मोटइहें, लोढ़ा होइंहें. उसे नहीं दिखता कि सच्‍चायी उसके मूस और लोढ़े के रूपक से कहीं ज़्यादा विरूप, विसंगत शक्लें भी अख्‍ति‍यार करती है. सुगिनिया का कसूर नहीं. तीन उंगलियों से मुंह पर आंचल थामकर सामनेवाले को अपनी तार्किकता से निरस्‍त करने की उसकी समझ है. मगर सामनेवाले का विस्‍तार व अंदर-अंदर पसरते भूगोल के पेंच एक ऐसा नया इंद्रजाल बुन लेंगे कि सुगिनिया तो क्‍या, ठीक-ठीक सामनेवाले तक को उसकी बुनावट की वाजिब समझ न होगी, फिर सुगिनिया की समझ पर उंगली रखना कहां तक वाजिब होगा. न होगा. क्‍योंकि एक सीधे, फूहड़ अंदाज़ में देखने की कोशिश करें तो शायद सुगिनिया का रूपक ऐसा अटपटा व बेमेल भी न लगे. अपने बेलगाम, बेशर्म लालच में अमरीकी निवेशक कंपनियों ने किसी मूस से बेहतर कहां बिहेव किया था? और रंग उतरने के बाद किसी लोढ़े से ज़्यादा क्‍या उनकी साख रह गयी है?

शायद मैं बहक रहा हूं.. अभी हाल तक, और आनेवाले वक़्तों में भी जाने कब तक, अपने, व दुनिया के कहां-कहां किन-किन मुल्‍कों की नियति-नियंताओं को वाजिब इज़्ज़त नहीं दे रहा हूं, विश्‍वविजयी अश्‍वमेघ की सवारियों को सुगिनिया के लेवल की इमैजरी पर उतार कर उनकी उत्‍कट विश्‍वपरिवर्तनकारी प्रतिभा का न्‍याय नहीं कर रहा. यहां-वहां घुटने गिरा कल के पर्वतारोही आज अवरोह की गोह में दया की भीख भले मांगते दीख रहे हों, कल को गिरह मज़बूत होते ही जबड़ों की ताक़त लौटेगी तो उनको कहने की क्‍या, लोढ़ा सोचने तक के पहले मैं चार मर्तबा सोचूंगा. और नहीं सोचूंगा तो लोढ़ा वे नहीं होंगे, मैं मूस होऊंगा!

ओह, सुगिनिया के लिए सब कितना आसान है. मुंह पर आंचल धरकर जो कहना हो कह चुकने के बाद निश्चित हो लेती है. जबकि मैं जाने कहां से कैसे चला आया कैसे हादसे की प्रतीति में एकदम किंकर्तव्‍यविमूढ़ हो गया हूं. और ऐसा नहीं कि कहीं मेरे पैसे डूबे हों. पैसों के डूबने के लिए पहले उनका होना ज़रूरी होता. तो बिन पैसा डूबे की अवस्‍था में भी जाने क्‍यों मैं लिटरली डूबा-डूबा-सा दिन गुज़ार रहा हूं. बुद्धि नहीं चल रही. बुद्धि न चलने के वाजिब रूपक भी नहीं सूझ रहे. कातरता में, सुगिनिया के आसरे से, इसको-उसको मूस व लोढ़े की उपाधि में साजकर छुट्टी पाना चाहता हूं. मगर, चूंकि आगे-आगे तुम सजन, पाछे-पाछे बुद्धि वाली बुद्धि का कहीं कांटा भी साथ-साथ गड़ा चलता है तो ठीक-ठीक मूस को पहचानने, व लोढ़ा पुकारने से परहेज करने को भी मन करता है. जबकि, देखिये, आज सुबह से दस-बारह खोजी रपटों को बांचने के बाद अदबदाकर मन कर रहा है कि कहीं खुले में बीस लोगों के बीच जाकर खड़े हों और जोर-जोर से कहना शुरू करें कि इस देश में अस्थिरता पैदा करनेवाली सबसे बड़ी ताक़त कोई है तो वह इस देश की सरकार है. मगर, फिर देखिये, ऐसी सीधी बात कहने में भी बुद्धि आड़े आ रही है!

हारकर मैं फिर सुगिनिया का मुंह जोहूंगा. वह बदमाश समय नहीं खायेगी, मुंह पर तीन उंगली के नीचे आंचल साटकर दन्‍न से कह देगी..

(क्‍या कहेगी इसकी इतनी ज़रा सी कल्‍पना तो आप में होगी ही?)...

7 comments:

  1. कहेगी क्या-इही न- "धत्तत!!"

    आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

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  2. आप ने सही कहा।
    दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  3. ****** परिजनों व सभी इष्ट-मित्रों समेत आपको प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। मां लक्ष्‍मी से प्रार्थना होनी चाहिए कि हिन्‍दी पर भी कुछ कृपा करें.. इसकी गुलामी दूर हो.. यह स्‍वाधीन बने, सश‍क्‍त बने.. तब शायद हिन्‍दी चिट्ठे भी आय का माध्‍यम बन सकें.. :) ******

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  4. ****** परिजनों व सभी इष्ट-मित्रों समेत आपको प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। मां लक्ष्‍मी से प्रार्थना होनी चाहिए कि हिन्‍दी पर भी कुछ कृपा करें.. इसकी गुलामी दूर हो.. यह स्‍वाधीन बने, सश‍क्‍त बने.. तब शायद हिन्‍दी चिट्ठे भी आय का माध्‍यम बन सकें.. :) ******

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  5. सुगिनिया को ठीक से समझ नहीं पाई, शायद इसलिए कि जानती ही नहीं । हाँ, लालचजनित मंदी को कुछ कुछ समझती हूँ ।
    दीपावली की शुभकामनाएं ।
    घुघूती बासूती

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  6. और आपने फ़िर बुद्धी के आड मे बिना कहे बहुत कुछ कह दिया !!सुगनीया तो स्ट्रेट फ़ारवर्ड होती है !!डिप्लोमेटीक होने के लिये तो डीग्रीया चाहिये !!

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