Saturday, November 1, 2008

अबरार और मंजरी: छह

जाने क्‍या वजह थी मैं चंद महीनों के लिए गायब रहा. शायद चारा काटनेवाली मशीन की अहमद की सेल्‍समैनी से जुड़े किसी फ़साद की सुनवायी में उसकी अदालती मदद की बाबत सहारनपुर गया था, फिर जाने अदालत के झमेले थे, या पड़ोस के बच्‍चों की संगत में ईख पेरने, या पतंगें उड़ाने पर अचानक कुछ ऐसी ज़ि‍म्‍मेदार नेह उमड़ती रही कि मैं बाहर का सब भूल, बीस हाथ की उस छोटी दुनिया में अटका रहा. इसी दरमियान भिनसारे खेतों में टहलते हुए किसी कीड़े ने काटा या जाने क्‍या, कान के भीतर एक बड़ी फुंसी निकल आयी, शुरू-शुरू में दीपू और रहमत सबके मज़ाक की चीज़ रफ़्ता-रफ़्ता मेरी जान लेने लगी. रात को बदहवाशी में मैं कान पर हाथ दाबे बत्‍ती जलाकर बवाल करने लगता. रफत बी हाथ में अल्‍मूनियिम का कटोरा लिये मेरे पीछे-पीछे यहां से वहां कमरों में टहलतीं और मैं बुदबुदाता-बकता चलता कि हाथ में तीन महीनों की ज़िंदगी बाकी है, बाकी अपनी स्‍टोरी का दी एंड हुआ, बी! या मैं किसानी करना चाहता हूं, या गांव में आपके नाम की एक बेकरी खोलना चाहता हूं, सच्‍ची, आपकी कसम, बी!

सुबह कंधे पर कंबल गिराये धूप में चाय सुड़कते अहमद मियां हौले-हौले मुस्‍कराते ज़ाहिर करते कि मेरी चिड़ीमारी से वे किस कदर आजिज़ आ गये हैं. रफत बी हमारे सिरहाने बिना दुआ-सलाम के चाय रख जातीं, फिर धूप में सूखने को कपड़े डालते हुए जाने किससे कहतीं मुजफ्फरनगर में उनकी एक ममेरी बहन है, ऐसी हसीन कि देखकर चांद भी शरमा जाये! मैं कान पर हाथ डाले चिढ़कर भुनभुनाता- अपनी पगलैटी बंद करो, रफत बी, और हमारे इस पजामे में एक नाड़ा आबाद करो!

उस टुटहा घर और घर से सटा बाहर नीम का एक बुर्ज़ूगवार पेड़, गांव की सस्‍ती, पथरीली मिठाइयां और कान की फुंसी पर हाथ धरे नहर के बाजू-बाजू की टहल. कभी बच्‍चों की हुड़दंग से खुश-खुश घर लौटता और चहकता हुआ रफत बी को ललकारता- तुम भी पूरे होशो-हवाश में कान खोलकर एक बात सुन लो, रफत बी!

- सुनाइए, सुनाइए? रफत बी होशो-हवाश खोयी-खोयी, मुस्‍कराती अपनी बहक में हमारी तक़लीफ़ बढ़ाये चलतीं.

- कुछ नहीं, छोड़ि‍ये, जाने दीजिये. अचानक जाने किस कमज़ोरी के असर में मैं एकदम हारी हुई मुर्दा आवाज़ में बुदबुदाता.

- ऐसे कैसे जाने दें, मियां, अब तो आपको कहनी ही होगी..

मैं ख़ामोशी के सूत कातता रफत बी का सीधा, सरल चेहरा देखता ताज़्ज़ुब करता रहता कि ऐसे मामूली चेहरे में इतनी नूर कहां से आती है.

अख़बार में लौटने पर ख़बर हुई हमारी ग़ैरमौज़ूदगी से फर्क़ पड़ा था न हमारी वापसी से कहीं कोई उत्‍साह की लहर दौड़ रही है. ज़माने की ऐसी इंतहा मोहब्‍बतों की पुरानी आदत थी सो उसकी खराशों के बनने का सवाल नहीं था, मगर सोच रखा था इतनी बड़ी ग़ैरहा‍ज़ि‍री में नैयर साहब की मेज़ पर दरख्‍वास्‍त रखने की कवायद करनी होगी, कुछ रोना-बिसुरना होगा, तो उसकी भी नौबत नहीं आयी. पहली मर्तबा नज़र पड़ते ही मैं माफ़ी मांगूं, उसके पहले ही भले आदमी का भोला सा सवाल था- पड़े-पड़े तुम्‍हारा जी उकता गया होगा, हमारी ओर से मैनपुरी एक शादी अटेंड कर आओ! जाओगे न?

पता नहीं किसकी शादी थी, मैं मैनपुरी शादी भी अटेंड कर आया. लौटकर कुछ अर्से बाद एक दिन कैंटीन में आपा दिखीं. खोयी-खोयी, उदास-उदास. ज़्यादा ग़ौर करना मैंने मुनासिब न समझा, अपनी में रहा, मगर आपा करवाना चाह रही होंगी जभी खुद मेरी मेज़ पर चली आयीं, बिना किसी स्‍वांग के सीधे सवाल किया- और तुम्‍हारे उस अजब दोस्‍त रंजीत देसाई के क्‍या हाल हैं?

- रंजीत? मैंने तो समझा था आप उसकी ख़बर दोगी? अहमदाबाद लौटकर ख़बर नहीं की?

दर्दघुली नज़र पर एक फीक़ी मुस्‍कान का फ़ीता चढ़ाकर मंजरी ने एक हल्‍की नज़र मुझे देखा, फिर सूने दीवार को पढ़ती बुदबुदाकर बोलीं- लौटा नहीं, मैंने अपने यहां से निकाल बाहर किया. बास्‍टर्ड, आई थिंक ही वॉज़ मोर इन लव विथ मोल्‍स ऑन माई बॉडी देन द रीयल वल्‍नरेबल मी!

(जारी)

2 comments:

  1. एक अजब उदासी भरी दास्तान बनती जा रही है..

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  2. एक कहानी तो यहीं बनी रखी है.


    लौटा नहीं, मैंने अपने यहां से निकाल बाहर किया. बास्‍टर्ड, आई थिंक ही वॉज़ मोर इन लव विथ मोल्‍स ऑन माई बॉडी देन द रीयल वल्‍नरेबल मी!

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