Monday, November 3, 2008

सपना होगा.. हक़ीक़त कैसी होगी, जुसेप्‍पे?..

पता नहीं कितना वास्‍तविक वास्‍तविक था, मगर तीन से तीन सौ तक की गिनती के बावज़ूद हवा व पत्‍तों की नमी वैसे ही पहले जैसी बनी रही तो मैं लगभग पैर में लिनेन के मोज़ों व धुली कमीज़ की चिकनायी में वैसे ही यकीन करने लगा जैसे अदबदाकर इन दिनों हर कोई अमरीकी चुनावों में गहरे अर्थ खोज निकालने का दावा कर रहा है. मैं अर्थ की खोज में निकले से ज़्यादा खुदा-खंदा हुआ था, बावज़ूद लिनेन की लहक में लचक रहा था, माने सीधे अर्थों में बड़ा खुश-खुश फ़ील कर रहा था, और चूंकि इस तरह से फ़ील कर रहा था जभी साफ़ हो जाना चाहिये था कि सच्‍चायी नहीं सपना होगा. लेकिन प्रेम के फ़रेब की ही तरह सपनों की धूप-छांव से भी छूटते-छूटते में लोग भौं के बाल व होंठों की लाल जला लेते हैं, मैं होंठों पर हाथ धरे नय्यर और सलिल चौधरी में किसे गाऊं की दुविधा में सुलग रहा था. मगर चारों ओर खुशी थी, खुशी की सुखावस्‍था थी. लेकिन अपने साथ जैसा होने से मैं बचा नहीं पाता, ज़रा पीछे, संशय की बदलियां भी साथ-साथ चल रही थीं, और पैरों के नीचे की हरी घास को रह-रहकर हैरत से देखने व अंगूठे से कुरेदने व मन ही मन बुदबुदाने से मैं बाज नहीं आ पा रहा था कि किसी फ़ि‍ल्‍मी सेट की डेंटिंग-पेंटिंग में बहककर इन्‍हें सच्‍चायी मानने की भावुकता मत करो, बच्‍चा!

लेकिन यह भी सच्‍चायी है कि हवा का असर होता है, फिर सपने की ही हवा क्‍यों न हो, तो उसके असर में सब तरफ सावन के सुहानेपन की छतरी भी थी, सुख के बड़े-बड़े पोल्‍का डॉट्स थे, और उसके नीचे बेवक़ूफ़ दीवाना मैं चहक रहा था. कैसे-कैसे तो बिम्‍ब बुन रहा था.. एक्रीलिक व चारकोल की एक समूची सीरीज़ खत्‍म करने के बाद मैंने दुनिया के खस्‍ता दिमाग़ी हाल पर पाओलो कोएल्‍हो नुमा एक पतली किताब लिखी थी, जिसकी पाओलो कोएल्‍हो नुमा बिक्री तो नहीं हुई लेकिन शोभा दे को जिसने पीछे कर दिया, और अभी आगे चलते-चलते में यूं ही अलसाये एक फीचर फ़ि‍ल्‍म भी बना डाली जिसे इंडियन पैनोरामा ने निहायत बेमतलब व अनुपयोगी बताकर भले खारिज कर दिया लेकिन कान और बर्लिन दोनों ही फेस्टिवल की हतप्रभ सेलेक्‍शन कमिटी ने हाथोंहाथ लोप भी लिया, और मैं नासमझ हूं कि बर्लिन के कांफरेन्‍स में यूरोपियन पत्रकारों को हिंदी के मौत की अ नॉट सो थ्रिलिंग स्‍टोरी बता रहा था!..

ओह, हाऊ मैसमराइज़िंग एंड एनचांटेड वन्‍स मैक बि‍लीव वर्ल्‍ड कैन ग्रो इनसाइड..

कट टू. स्‍वस्‍थ पत्‍ते के गाढ़े हरे रंगोंवाला एक मेंढक फुदकता मेरे पैरों के आगे से गुज़र गया. और उसके पीछे हाथ में पिन, या वैसा ही कोई दूसरा संगीन हथियार लिये कोई वहशी बच्‍चा उसकी जान लेने को नहीं भागा. न ही मेंढक के सामने से गुजरने पर मैं गश खाकर गिरते-गिरते बचा, जिसके न होने की अस्‍वाभाविकता में मन को तभी ताड़ जाना चाहिये था कि गुरु, डोंट गेट फूल्‍ड, इट्स ऑल जस्‍ट अ फेयरी वर्ल्‍ड. तभी पास कहीं फ़ोन के घनघनाने की आवाज़ आयी. बड़ौदा से मुन्‍नी थी. मुझसे कहीं ज़्यादा चहक-उमगभरी. आवाज़ की खनक से फ़ोन आया जैसा नहीं लग रहा था. लग रहा था बाजू में बैठी मटर छीलती (उसकी महंगाई पर झींकती) उमगती आवाज़ में पास के छह घरों तक अपनी जीत दर्ज़ करवा रही हो.

हंसते हुए गुलगुले-विजयीभाव से मुन्‍नी ने ख़बर किया कैसे बिना पैरवी के बेटी का एडमिशन संपन्‍न हुआ. डोनेशन के लिए एक-डेढ़ लाख भी नहीं मांग रहे हैं. मैं चुपचाप सिर झुकाये मुस्‍कराता रहा, बताकर मुन्‍नी की सांझ बिगाड़ना नहीं चाहता था कि इट्स नथिंग रीयल, ईडियट! सपनीले संदेशों में सच्‍चायी पर पूरी तरह परदा मत गिरा लो, भोली औरत, बाद को कलेजे में उमेठे उठेंगे तब हमें कसूर मत देना! ऐसा ही और भी काफी कुछ ब्‍ला ब्‍ला ब्‍ला. तभी कहीं ज़रा आगे चेलो का दबा हुआ संगीत सुन पड़ा और सूखे बालों के गिर्द सुर्ख़ लाल मफ़लर लपेटे, उदासियों के धुंध में लिपटे जुसेप्‍पे पर नज़र गयी. बेसाख़्ता मेरे मुंह से निकला- इट्स ऑल ड्रीमी एंड डेंजरस, लुक वेयर यू आर हेडिंग, फ्रेंड?..

मेरी फंसी आवाज़ का फीक़ापन होगा, या खुद के फ्रेंड पुकारे जाने का ठंडा अस्‍वीकार, गीले पत्‍तों पर जुसेप्‍पे के जूतों के चर्र-मर्र की बेचैनियों में कोई ढीलापन नहीं आया. बज रहे चेलो की आवाज़ अचानक जब बंद हो गयी और मिनट भर में साफ़ हो गया गाढ़े इमोशनल लैंडस्‍केप के धुंधले, दिवालियेपन को दूर करने में सहूलियत का कोई बैकग्राउंड स्‍कोर हमारी मदद नहीं करेगा, इतिहास व समय की अपनी समझ के सीमित साधनों से अलग हमारे नंगे-वल्‍नरेबलपने को ढंकने के लिए कोई, कैसी भी पुड़ि‍या हमारे हाथ न होगी! तभी कभी जुसेप्‍पे ने कदम रोककर गंभीरता से आसपास का नज़ारा लिया, फिर सर्द नज़रों से मेरी तरफ देखा तो मेरी जान में जान आयी, हालांकि सच्‍चायी यह भी थी किस मुंह जुसेप्‍पे से क्‍या बात करूंगा सोचकर मैं भीतर ही भीतर गड़ा भी जा रहा था..

मैंने चहककर कहा तुम्‍हें हाल के दिनों के टीवी कवरेज़ की एक वीडियो दिखाना चाहता था. शर्म, गलाजत व सरकारी मशीनरी के पतन के ऐसे दृश्‍य हमारे जैसे डिजेनरेट, पॉलिटिकली पिछड़े मुल्‍क में ही संभव है- उम्र से ज़्यादा अपनी मेहनत की ज़िंदगी में बूढ़ा हो रहा एक उत्‍तर भारतीय टेंपो ड्राईवर है, अपनी गाड़ी के सामने ये मैं किन लोगों के बीच कहां फंस गया वाले एक्‍सप्रेशन के साथ लॉस्‍ट खड़ा है. बूढ़े को सामने से हटाने की कोशिश करता कोई बाईस-तेईस का मरगिल्‍ला जवान है, हाथ में हाथ भर का पत्‍थर लिये है, जिसे लपक-लपककर वह टेंपो के शीशे की तरफ ले जाना चाह रहा है, लेकिन बूढ़ा ऐन रास्‍ते में खड़ा है. कहानी आगे यह होती है कि मरगिल्‍ला जवान घुमाकर एक चपत बूढ़े के लगाता है, फिर दूसरा, तीसरा, उसके बाद और. बीच शहर में सरेआम डिफेंसलेस खड़ा खोया बूढ़ा गाल पर पड़ते इज़्ज़त के तमाचों का बुरा नहीं मान रहा, अंदर ही अंदर मान भी रहा हो तो वह उसके चेहरे पर शर्म व तक़लीफ़ की शक़्ल में ट्रांसलेट नहीं हो रहा, बेचारा फ़ि‍लहाल सिर्फ़ अपनी गाड़ी को बचाने की मिन्‍नतों की कहानी बना हुआ है..

- फिर? बिना मेरी ओर देखे जुसेप्‍पे की सर्द फुसफुसाहट सुन पड़ती है.

- फिर क्‍या, मैंने हंसते हुए आगे बताया, दो कौड़ी का एक लौंडा एक कमज़ोर, लाचार, मददहीन बूढ़े को सरेआम बेइज़्ज़त करता रहा, फिर उसे एक ओर ठेलकर हाथ का पत्‍थर गाड़ी के शीशे पर गिराता आसपास नयी राजनीतिक हक़ीक़त का ऐलानिया बयान देता रहा, टीवी वाले इन तस्‍वीरों को घुमा-चलाकर उस हक़ीक़त को मान्‍यता व विस्‍तार देते रहे.

- तुम्‍हारे साथ कुछ नहीं हुआ? तुम भी तो कमज़ोर, लाचार, मददहीन.. अजनबी शहर में पराये हो? गीले पत्‍तों पर जूतों की चर्र-मर्र करता जुसेप्‍पे दसेक कदम आगे गया.

(जारी)

3 comments:

  1. पढ़ रहा हूँ...जितना समझ आ रहा है, समझ भी रहा हूँ..जारी रहिये.

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  2. गाढ़े इमोशनल लैंडस्‍केप के धुंधले, दिवालियेपन को दूर करने में सहूलियत का कोई बैकग्राउंड स्‍कोर हमारी मदद नहीं करेगा
    बहुत बढ़िया पंक्ति.....

    मेंढक के रंग-रोगन पर खूब बारीके से गौर कर लिया , जबकि वो तो फुदकता हुआ निकल गया !!!

    ये जो उड़न तश्तरी जी ने बात कही है ...हम इसे समझने की कोशिश कर रहे हैं....

    कभी बताएंगे कि राउरकेला से इलाहाबाद कैसे पहुंचे...फिर वहां ...और वहां से यहां...सब कुछ....इधर ही बता डालिये , उधर न सही....

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  3. डरते डरते चुपचाप मुम्बई में कदम रखने का विचार था परन्तु टीवी अखबार देख अब लगता है केवल डरते डरते ही नहीं सहमते व छिपते छिपाते यह काम करना होगा । और मत डराइए ।
    घुघूती बासूती

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