Tuesday, November 4, 2008

अंधेरों में बात..


मैं कहूंगा किस झोंक में उड़ी आती हो, अनजाने शहर की तंग गली का आख़ि‍री बंद दरवाज़ा हूं, गरदन के रोओं और चमकते बालों पर रहम करो लौट जाओ, तुम कहोगी बरसाती अंधेरिया रात में फटे पाल की नाव होगी तो क्‍या गरीब की कहानी न होगी, सफ़र को रवानी? आह का इक रस्‍ता होगा और हल्‍के नाज़ुक चिड़ि‍या की आंखों की चमक, थरथराती उड़ान होगी अर्थहीन ठहरा हुआ विराम क्‍यों होगा, न होगा. दोनों पंजों में चेहरा ढांपकर मैं कहूंगा कैसी बहकी बातें करती हो, ये आंखें पत्‍थर की हैं और पैर रेत के गढ़े हैं, देखने के हैं चलाने, काम में लाने के नहीं. मारकिन के पुराने घिसे कपड़े की फीक़ी मुस्‍की से चेहरा पोंछ तुम कहोगी साइप्रस, सुरीनाम, सलेमपुर कहां से आती है ऐसी करियायी, भारी कभी की न उतारी उदास हवायें, आकर बजती रहती हैं सूनी दीवारों पर निकलकर कभी जाती कहां हैं, इतना तो कहां-कहां का स्‍नेह बरसता रहता है, कहीं संचय होता है, कैसा सूखा पत्‍थर है सारा फिसलता रहता है? मैं कहूंगा मैं रात में खड़ा हूं तुम दिन को देख रही हो, रात के नज़दीक आओगी फिर मैं नहीं दिखूंगा. तुम कहोगी तुम रात की बात समझती हो, दिन में भी देखे हैं अंधेरे उन अंधेरों के घात समझती हो, लेकिन खुली बरसात इस तरह कटोरी लिये हाथ उदासियां बटोरते रहने की मेरी समझदारी नहीं समझती.

मैं कहूंगा मगर क्‍या कहूंगा? तुम कहोगी लेकिन फिर क्‍यों कहोगी.

1 comment:

  1. लफ़्जो की दुनियादारी मे आंखो की सच्चाई क्या
    मेरे सच्चे मोती झुठे उनकी झुठी बातें सच

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