Wednesday, November 5, 2008

यहीं कहीं पड़ा होगा, देश..

कहीं न रुकनेवाली रेल होगी, या कब से बंद पड़ी होगी, घूमता जो दिखता होगा मन के घुमड़ते भाव होंगे, भूले हुए घाव, पहचानी आवाज़ों की अनौपचारिकता के बीच अजानेपन के निर्मम स्‍त्राव होंगे. सवारियां लदती सी दिखती होंगी, चेहरे अपनी जगहों पर अड़े कभी दरकते खड़े गिरते से दिखते होंगे. डूबने से ठीक पहले हचकती नाव के लसर-धसर का अंतहीन विस्‍तार ग़रीब की रोज़ की ज़द्दोज़हज थका हुआ कारोबार होगा.

जबड़े पर हाथ धरे दर्द में दोहरा होता एक ग्रामीण लगभग रोने लगेगा किस जनम के पाप भुगत रहा है, एक औरत मुरझायी बतायेगी फुसफुसायेगी क्‍या करती जितना कर सकती थी, किया फिर भी इस दफ़े त्‍यौहार रह ही गया, जाने बच्‍चे किस हाल में हैं, बाहर सूखने को अदौरी छोड़ आयी थी किसी ने हटाया कि नहीं. कहीं पीठ पीछे घरघराती बुर्ज़ूगवार ज़नाना आवाज़ जाने कौन सी मर्तबा दोहरायेगी अगला टेशन आये तो खबर कर देना, बच्‍चा, शायत यहीं होगा गांव और कितनी दूर होगा. बुढ़ि‍या को कोई जवाब नहीं देगा.

लसर-धसर डोलती हैं सवारियां कहीं पहुंचने का वहम बना रहता है. मैं उनींदे में उंगलियां टटोटला हूं, हाथ, नाक, कितनी खुशी है अपने साथ ही हूं खोया नहीं हूं. हालांकि आंख खुलने पर अब गांव नहीं आता, सिगरेट पर सिगरेट पर सिगरेट धूंकते रहने के बावज़ूद नांव याद नहीं आता. सलीके की गुज़ारिश में एक फीक़ी मुस्‍कान याद आती है, कुछ देर तक बोल लेने की पुरानी आदत, टटोल लेने की हड़बड़ में भीड़ के संगत की ग़लतफ़हमियां बनी रहेंगी नहीं मिल रहा मगर यहीं कहीं होगा- नांव, गांव, सफ़र, अच्‍छे थोड़े कुछ पड़ाव, कोई आख़ि‍र कैसे तो मिल गयी मंज़ि‍ल- एक देश, कहीं यहीं वहीं पड़ा होगा, देर-सबेर मिलेगा?

5 comments:

  1. संवेदनशील मन, जब ढलता है शब्दों में, तो आते हैं ऐसे ही विचार.सिगरेट के छल्लों की तरह, दिखायी देने लगता है, आस-पास का संसार.धुवां-धुवां स्मृतियाँ, नहीं सुनती हैं, विवेक के परामर्श.झेल जाते हैं, सहृदयता के सोपान, धुप-छाँव की आड़ी-तिरछी विडम्बनाएं सहर्ष.

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  2. नहीं मिलेगा....देश की कोई नहीं सोचता...

    देश अंग्रेजों को मिलेगा....मंगोलों को मिलेगा....तुरकन को मिलेगा....अरबों को मिलेगा....
    देश मिलेगा धर्म को....हिन्दू को....मुसलमान को....ईसाई को...
    देश मिलेगा रंग को.....कालों को.....गोरों को ...गोरों में कालों को...कालों में गोरों को....चितकबरों को....
    तुम्हें क्यों मिलेगा....
    मुंबई कबसे रह रहे हैं प्रमोदसिंहजी ?

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  3. रेल न रुके तब कहीं उनींदा पड़ा अलसाया देश मिल भी सकता है ,
    मन का क्या ? उसकी रेल रुकती है कभी ?

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  4. जिसने देखा है केवल वही समझ सकता है इन सहज भावों को.

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  5. मैं उनींदे में उंगलियां टटोटला हूं, हाथ, नाक, कितनी खुशी है अपने साथ ही हूं खोया नहीं हूं.

    अत्यंत उम्दा अभिव्यक्ती है आपकी प्रतिलीपी भी अच्छी लगी !!

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