Thursday, November 6, 2008

सुबह-सुबह..



क्‍या करूंगा अपनी छिपी लिये प्रतिलिपि की बस में चढ़ जाऊंगा? सुरभि से कहूंगा हंस रही हो इसलिए कि हमने अब तक तुम्‍हारी जहाजी देखी नहीं है. बस में बैठे-बैठे दिखेगा सब ऑलमोस्‍ट आइलैंड ही है? अपने आइलैंड में धीमे बुदबुदाऊंगा हारमोनियम के घिसे कोनोंवाली पुरनिया सीपिया अच्‍छी है. कहूंगा आइलैंड ही सही ऐसी-तैसियों का हिसाब अच्‍छा है? या चंद्रहास से करूंगा हास लचकते लदिगा की भिंडी के पौधे पर कोंहड़ा उगाने की तुम्‍हारी तस्‍वीर अच्‍छी है. कहूंगा राल्‍फ़ नाडर की चिट्ठी, आइलैंड के अकेलेपन में ही सही, अच्‍छी है?

3 comments:

  1. समझने के प्रयास में हूँ...
    टिप्पणी करने से लजाना तज यह लघुटिप्पणी-प्रयास है

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  2. @डाक साब, तजिये लजाना, इसी चक्‍कर में तो देखिये, मैं बस चढ़ने से रह गया..

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  3. एकांगी होने पर यही न होगा..कभी उड़न तश्तरी पर आओ..तो नजरिया बदले..कुछ उदासी छटे..मगर आप हैं कि मानियेगा थोड़ी.

    आने वाला हूँ बम्बई..तभी बतिया जायेगा इस बार अलग से. :)

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