Saturday, November 8, 2008

किधर-किधर..

कभी लगता है बर्बरता का अंधा जंगल है मैं घबराये, सभ्‍यया का मुखौटा चढ़ाये किसी तरह बच निकलने की कोशिश कर रहा हूं. कभी लगता है सभ्‍य ही हैं पहचानने में मुझसे ग़लती हुई है, मैं महज़ अपनी ग़लतियां बदलने में हारा, ऐसी गजबज सभ्‍यता के आगे बेचारा कभी पूंछ कभी मूंछ टटोल रहा हूं और अदबदाकर फिर घबरा रहा हूं कि दोनों नदारद हैं..


सोचता हूं बचपन की बुरी आदत, पुरानी बीमारी है चिचरियां खींच ही रहा हूं फिर कुछ अपनी खींचूं? लेकिन फिर सोचता हूं यहां-वहां कहां-कहां खिंचे खुद को किस भीड़ से खोज लाऊंगा, नहीं पाऊंगा तो कैसी आंकना उकेर जाऊंगा? समय को पकड़ने की कोशिश करूं उसी में कहीं खुद का सूराग कुछ पहचाने दाग़ मिलेंगे?..


कितने वर्षों पहले घर से बाहर निकला अब तक बाज़ार की ज़द से बाहर हूं..


बाज़ार की ज़द से बाहर जीवन में कितना अंधेरा है, कोई पहचानी आवाज़ फुसफुसाकर कहती है बाज़ार के भीतर मन का है..


अंधेरा..


मुखौटा चढ़ाने-हटाने की रेलमपेल, निर्मम खेल में कुछ बाद फिर कहां याद रहता है कौन असली मैं था, कौन मुखौटा..


(स्‍केचेज़ अपने छोटाकार में असुविधाजनक हो रही हो तो उसे चटकाकर बड़ाकार देख सकते हैं)

18 comments:

  1. अहा यथार्थ बयान कर रहे हैं,कभी तो लगता है कहां फस गये हैं,फिर लगता है सब ठीक तो तो चल रहा है, आड़ी तिरछी ज़िन्दगानी तो हम कब से जीये जा रहे हैं,पटका जाते हैं फिर झाड़ के खड़े होते हैं और उठ के आगे बढ़ते है ऐसा लगता है कि हम अंधेरे को चीर के निकले जा रहे हैं,पर अब क्या अंधेरा और क्या उजाला सब ही एके जैसा लग रहा है,पर जीवन है बहुत खूबसूरत,इसका अपना ही प्रवाह है...

    ReplyDelete
  2. बहूत खूब....! इसकी भाषा संसार की सर्वाधिक सम्प्रेशनीय मानी जा सकती है...बिना कुछ कहे सबकुछ समझा दिया आपने.

    ReplyDelete
  3. दादा, स्‍केचिंग के साथ कमेंट्स भी बहुत भाया. आपकी सिगरेट पीने की अदा भी पसंद आई, लेकिन सार्वजनिक रूप से......

    ReplyDelete
  4. सुंदर चित्रण

    ReplyDelete
  5. पहले तो कमेन्ट बक्सा ठीक कर लेने की बधाई.

    फिर हमारी कथा को इतनी फोटू आदि समेत इतनी रोचकता से पेश करने का आभार. यही जीवन है..आपने सही अभिव्यक्त किया.

    शुभकामनाऐं. जल्दी बात होगी.

    ReplyDelete
  6. इन द राईट डाईरेक्शन ..

    ReplyDelete
  7. बहुत खूब....!सही अभिव्यक्त किया.

    ReplyDelete
  8. चलिए अब तो कुछ समझ में आने लगा है आपका ब्लॉग। कमेण्ट पोस्ट करने की सुविधा भी ठीक हो गयी। धन्यवाद।

    ReplyDelete
  9. अब लघुव्यथा कुछ समझ आ रही है !! आवश्यकतायें पुरी हो सकती है ईच्छायें नही !

    प्रमोद जी अजदक याने क्या॥
    कृपया बतायेंगे क्या ?

    ReplyDelete
  10. चिचरियों की कारगुजारी झेल लिये जाने पर आप सभी बंधुओं-बंधनाओं का आभार..

    @दीपक बाबू,
    अज़दक 'खड़ि‍या का घेरा' नामक एक नाटक का पात्र है, लिखवैया एक ब्रेख़्त साहब हुआ करते थेथे.

    ReplyDelete
  11. अज़दक भाई...,इस दुनिया में अभी नया...नया हूँ....यहाँ की तहजीब सीख रहा हूँ...असल में असली दुनिया में जीने की समझ भी कहा आई अब तक...आ भी jayegi....जैसे आ गया मैं आज आपके भी ब्लॉग पर.....padhta हुआ एक-dam से cartunon की दुनिया में आ पहुँचा...aakar fisal गया..दुबारा उठकर खड़ा हुआ.. darsal cartoon शब्दों के आगे की दुनिया है....jahan बहुत sambhal-sambhal कर ,व बड़ी najakat से पाँव dharne होते हैं....सो धर रहा हूँ....आपको पत्र-पत्रिकाओं से बाहर pahli बार देखा...बहुत acchha लगा सच.....!! अज़दक भाई...,इस दुनिया में अभी नया...नया हूँ....यहाँ की तहजीब सीख रहा हूँ...असल में असली दुनिया में जीने की समझ भी कहा आई अब तक...आ भी jayegi....जैसे आ गया मैं आज आपके भी ब्लॉग पर.....padhta हुआ एक-dam से cartunon की दुनिया में आ पहुँचा...aakar fisal गया..दुबारा उठकर खड़ा हुआ.. darsal cartoon शब्दों के आगे की दुनिया है....jahan बहुत sambhal-sambhal कर ,व बड़ी najakat से पाँव dharne होते हैं....सो धर रहा हूँ....आपको पत्र-पत्रिकाओं से बाहर pahli बार देखा...बहुत acchha लगा सच.....!!

    ReplyDelete
  12. Pramod bhai, kai dino baad apke blog ko dekha… age bhi kuch sketch dekhene ko milte rahene, is ummied ke saath….
    Nitin

    ReplyDelete
  13. बहुत अच्छे स्केच!

    ReplyDelete
  14. "ओह, जीवन कैसा तो विरल अनुभव है!"

    Wonderful post!

    ReplyDelete