Monday, November 10, 2008

किसका खेत किसकी मूली के बीच बेचारा देश..

जातीयता बड़ा लुभावना प्रेम है. मन में ऐसे-ऐसे मरोड़ उमेंठता है कि बर्मा से अफ़ग़ानिस्‍तान तक के ‘अहो भारत! अहो भारत!’ की पुरानी घिसी छवि के स्‍मरण में हम ठुनकने लगते हैं. अफ़ग़ानिस्‍तान क्‍या ईरान तक पहुंच जाती भारत-भारती की जोत, सिकंदर सा कोई जांबाज दुस्‍साहसी नौजवान होता जाने कैसे-कैसे सोये राष्‍ट्रीय अरमान पेर लेता, पूर लाता? मगर दुर्दिन-दुर्दशा के अहोभाग्‍य, देश के जांबाज दुस्‍साहसी नौजवान देश जीतने नहीं, घर से बाहर नौकरी खोजने निकलते हैं. कल तक अमरीका में खोज रहे थे, अब लौटकर यहां खोजेंगे. चूंकि दुस्‍साहसी हैं उनके खोजने पर उन्‍हें देश और नौकरी दोनों मिल जायेगी (हालांकि नौकरी- किसी भी तरह की- के बारे में इस दावे से कहने में अब थोड़ा संकोच होता है). जो दुस्‍साहसी नहीं हैं उन्‍हें यहां-वहां बिना मांगे लातें ज़रूर मिल रही हैं, नौकरी नहीं मिल रही. भूले से कहीं मिल जाती है तो विगलित भावुक लात खाया मन देशभाव में धन्‍य हो जाता है कि हो धन्‍य क़ि‍स्‍मत, इस देश में एक नौकरी पर तो कम से कम हमारा क्‍लेम निकल आया! बकिया तो सच्‍चायी यह है कि क़ि‍स्‍मतवालों के लिए मुलुक में घर की जोरू और पड़ोस के चार घरों की मोहब्‍बत का आसरा है, और उतना ही आसरा है, भारत-भारती और देश की मोहब्‍बत का नहीं है. देश कहीं बसता है तो रिलायंस इंडस्‍ट्री और रिलायंस मोबाइल और इंडियन बोर्ड ऑफ़ क्रिकेट कंट्रोल के लिए बसता होगा, मुलुक से मुंह उठाये देश की तरफ़ देखनेवालों के लिए गायब हो गया है. राष्‍ट्रीयता ठंडा माने कोला की बोतल में डालकर हम काफ़ी पहले पी चुके हैं. जिज्ञासा-जिज्ञासा जितना करें, शिक्षा की दमक हममें नहीं है, जातीयता की पुरानी ऐंठी हुई ठसक है, तो जातीयता को राष्‍ट्रीयता से कन्‍फ़्यूज़ कर रहे हैं.

जातीयता की इसी पुरानी चोटखायी ठसक में राजस्‍थान के गुज्‍जर भाई बंदूक बाहर करवा के तेल से उसकी सफाई करने लगते हैं, बैठे-बिठाये बंदूक गैंग का निर्माण हो जाता है. महाराष्‍ट्र में अलग-अलग समूह व पहचानों के लोग राज ठाकरे से किसी मवाली के गिर्द गोलबंद होने लगते हैं क्‍यों? क्‍योंकि शहरी परायेपन की तक़लीफ़ में जातीय अस्मिता व अरमानों की हूक उठी है, देश उनको एड्रेस नहीं कर रहा, न उसके पास इनके रिड्रेसल का कोई एजेंडा है, राज ठाकरे के पास गुस्‍सा निकालने का है, तो मराठी माणूस की चोटखायी लहरायी मानसिकता उसके गिर्द लटक ले रही है. यह जातीयता ही है राष्‍ट्रीयता नहीं. ठीक-ठीक की प्रांतीयता भी नहीं है. प्रांतीयता होती तो यह चिंतित मराठी माणूस विदर्भ के किसानों की सोचता. नहीं सोच पा रहा. क्‍यों नहीं सोच पा रहा? क्‍योंकि भारत-भारती का रेकर्ड बजानेवालों ने उसके हिस्‍से की राष्‍ट्रीयता चोरमंडली के अपने गिरोहबंद मुनाफ़ों में खाकर हजम कर लिया है!

भारत ही नहीं, कहीं भी देश किसका होता है? उसकी नीतियां और उसके हित किसके हित में होते हैं. बाबू बुद्धदेव बंगाल में जबरिया जनता के मुंह में उसका हित ठेल रहे थे कि बाबू रतनजी टाटा की सोच रहे थे? सन् अस्‍सी के बाद से रिलायंस की कितनी आर्थिक धांधली और घपलों के मामले हैं, उनमें से कितनों में उन्‍हें सज़ा हुई है. समझौतों की बात नहीं कर रहा, वास्‍तविक सज़ा की कर रहा हूं, कभी हुई है? सहारासम्राट सुब्रत सहारा की? कभी होगी? राष्‍ट्रीय संसाधन, संरक्षा-सुरक्षा इन आठ-दस प्रतिशत लोगों की सेवा के लिए है कि विदर्भ और बिहार के लातखाये भगोड़ों के लिए? बिहारी तो उन्‍नीसवीं सदी के उत्‍तरार्द्ध से ढोर-डंगरों की तरह नाव और गाड़ि‍यों में लदकर रोज़गार की खोज में भटक रहे हैं, बिहार में परायापन महसूसते रहे हैं, बाहर आकर कहां से राष्‍ट्रीय ममत्‍व महसूसने लगेंगे?

महसूसने की भावुकता में कोई बहकेगा तो बहकते-बहकते ज़रा ठहरकर सोचने की कोशिश करे इस राष्‍ट्रीय भूगोल का महज़ कारोबारी विस्‍तार के लिए किसी मुनाफ़ाख़ोर के वकील और एजेंट की ज़बान तो नहीं बोल रहा, क्‍योंकि देश के टूटने का सबसे ज़्यादा नुकसान इन राष्‍ट्रीय कारोबारियों को ही है, पहले से ही टूटे, अंगभंग करवाये आमजन को अब देश की चिंता नहीं, अपनी जातीयता की है. और अकबक घबराहट में कुछ वैसी ही है जैसे किसी भी हद तक हालात खराब करवाकर किसी भी सूरत में अपनी कुर्सी बचाये रखने की महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री विलासराव देशमुख की है, क्‍योंकि वही सबको दिख रहा है, अपनी चमड़ी और ज़्यादा से ज़्यादा अपनी कुर्सी, देश नहीं दिख सकता. देश देखने की समझ व शिक्षा व तद्जन्‍य संस्‍कार पैदा करने में देश चलानेवालों की जब समय था पैदा करवाने की इच्‍छाशक्ति नहीं थी. राष्‍ट्रीय संसाधनों की कालाबाज़ार लूट में आंखें मूंदे तब वे झपकियां ले रहे थे, अब उस बंदर-बांट में अपने हिस्‍से की गारंटी दुरुस्‍त करने की खातिर चुनाव लड़ते हैं, देश दुरुस्‍त करने की खातिर नहीं. देश दुरुस्‍तगी की बातें हमारा-आपका चूतिया काटने की गरज से, या फिर अख़बार व टीवी में महज़ स्‍पेस भरने की गरज से होता है.

5 comments:

  1. आप कह रहे हैं, लजाईये नहीं, टिपियाईये.
    कैसे न लजायें? थोडी-बहुत लज्जा तो बाकी है अभी. मैं अपनी बात कर रहा हूँ.

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  2. सारे बौद्धीक निकल गये अमेरीका को
    नालायको के हाथो मे भारत रह गया !!

    अजदक का अर्थ जानकर अच्छा लगा !! धन्यवाद

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  3. देश बेचारा फँस गया, स्वारथ के मझधार।
    अजदक जी के पेट में, उठी मरोड़ अपार॥

    उठी मरोड़ अपार, जातिगत ताव देखकर।
    राजनीति में पूँजीपति का भाव देखकर॥

    कर ‘सिद्धार्थ’ प्रार्थना, है भगवान सहारा।
    डूबी लुटिया यहाँ, लुटा अब देश बेचारा॥

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  4. सही सही परमोद भाईसाब...

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  5. कटु किंतु सच आलेख

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