Wednesday, November 12, 2008

तारा-तारा ज़मीन पर? या व्‍हॉट?

या व्‍हाई आई ऐम थिंकिंग लिटिल लेस दीज़ डेज़?..

पता नहीं इतनी सारी और चीज़ें हैं मगर मैं तारों के बारे में ही क्‍यों सोचना चाहता हूं. कम से कम सिने तारिकाओं की ही सोचता? या ज़्यादा सोचने के गुमान में यही सोच लेता कि आजकल सोचना कम क्‍यों हो गया है. लेकिन ग़ौर करनेवाली बात है सोचना सचमुच कम हुआ है या उस सोच की प्रदर्शनी कम हुई है की महज़ सामयिक लाक्षणिकता है, जैसाकि रियो द जनेरो में एक अदृश्‍य जनसमुद्र के आगे जनसमुद्र का नेता बनने की कामना रखनेवाले कमातोल पियेर रादिकालेंस्‍की ने सही-सही फ़रमाया ही है नियो-लिबरल इकॉनमी का बोरिया-बिस्‍तर उठ गया है जो कह रहे हैं ग़लत कह रहे हैं, वे जन को बरगला रहे हैं जो यहां-वहां बैंको के सरकारीकरण में जननोन्‍मुखता पढ़ ले रहे हैं! नियो-लिबरल इकॉनमी कहीं किसी सरकार की जेब में नहीं गयी, सरकारें अब भी उसी की जेब में पड़ी हैं; इतने सारे हाय-तौबा के बाद बस घड़ी भर को दम ले रही है. दम ले चुकने के इम्मिडियेटली बाद फिर ‘प्रॉफिट-प्रॉफिट!’ करती ठुमकने लगेगी, और इस कॉरपोरेट प्रॉफिट की राह में जिस किसी सरकार ने राष्‍ट्रवाद, जनवाद, या जो कोई भी विवाद किया उसे कुहनैटा मारके तड़ से प्रॉफिटवाद के रास्‍ते पर लिये आयेगी. और राष्‍ट्र हेंहें-लेले करते प्रॉफिटवाद के रास्‍ते तड़ से आ भी जायेंगे. जनता बरबाद होगी तो इसमें किसी और का नहीं जनता का ही कसूर होगा, क्‍योंकि प्रॉफिटवाद के इस बनैले महकाऊ दौर में जनता भी कोई राजनीतिक गोलबंदी नहीं सोच पाती, कभी आत्‍मा के उमेंठे के अनोखे दुर्लभ क्षणों में समाज-राजनीति सोचती भी होगी लेकिन मूल्‍य और जीवन उसका जो है कि प्रॉफिटवाद के गिर्द ही गोलबंद हुआ है.. एक मिनट, एक मिनट!

मैं भी ससुर, कंहवा के गोली केने चलौंली के जाने किन अजाने रास्‍तों पर दागने-दगने लगता हूं. क्‍या कह रहा था? हां, कह रहा था कि नियो-लिबरल इकॉनमी की तरह सोचना तात्‍कालिक तौर पर सेंटर स्‍टेज में दिख भले न रहा हो, है स्‍टेज पर ही. लेकिन जहां भी है वह तारों के बारे में क्‍यों सोचना चाह रहा है? आर दे वर्थ इट? तारे से हमें कुछ मिलेगा? एनी प्रॉपर प्रॉफिट? नहीं मिलेगा तो फिर ससुर तारे की औकात क्‍या! ज़मीन पर रहे चाहे गड्ढे में, हू केयर्स. साथ ही एक सोचनेवाली बात यह भी है कि भारत जैसे देश में एक तारा ज़मीन पर नहीं रहेगा तो कहां रहेगा? तारे को तो अलाने नेता और फलाने बिल्‍डर और इंडस्ट्रियलिस्‍ट का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि पैर टिकाने लायक जगह के नीचे से ज़मीन खींच नहीं ले रहे हैं! आसमान पर तो ऑस्‍कर की फील्डिंग में लगे इन दिनों आमिर रहेंगे, भले ताज़ा माली हालात ऐसे न हों कि खुद ऑस्‍कर भी आसमान में रहना बहुत अफ़ोर्ड कर सके. इंडियन क्रिकेट रहेगी. भले चार महीने बाद ज़मीन पर आ जाये. खुद धोनी साहब क्रिकेट के बंगले से बाहर निकलकर जीवन की वास्‍तविकताओं की झोपड़ी में घुसें और बिहार के रास्‍ते क्रिकेट की सफ़ेदी नहीं बिहारी धूसर पहनकर मुंबई पहुंचे, पलक झपकते में शायद नवनिर्माण वाले उन्‍हें भेया होने की सज़ास्‍वरूप निर्वाणावस्‍था तक पहुंचा दें, तड़ से धोनी बाबू जान जायेंगे आसमान नहीं, ज़मीन पर ही हूं. या यह देश ज़मीन पर है. ज़मीन पर ही रहेगा. आसमान पर सिर्फ़ रिलायंस के ‘कर लो दुनिया को मुट्ठी में’ टाइप के नारे जायेंगे. और इतनी मात्रा में जायेंगे कि आसमान में तारों का रहना दूभर हो जायेगा, अदबदाकर वह ज़मीन पर आयेंगे, और गनीमत होगी ज़मीन पर ग़र थोड़ी जगह बची हुई हो, क्‍योंकि इसकी भी ढेरों संभावना है कि कल को न बची रहे. फिर तारे ज़मीन पर नहीं कहां? नामके फ़ि‍ल्‍म को बनाने की ज़रूरत बनेगी, और हो सकता है फ़ि‍ल्‍म के लिये पैसे निकल आयें, बनाने को मैं तैयार हो भी जाऊं मगर हो सकता है तब झमेला यह रहे कि खुद मेरे नीचे ज़मीन न रहे, किसी पहाड़ में हिंदी कविता नहीं निर्वाण के बिम्‍ब ढूंढ रहा होऊं?..

लेकिन बड़ी मुश्किल है इन दिनों पता नहीं क्‍या है सोच नहीं पा रहा हूं. जबकि आप देखिये, बिना सोचे इतना हेंहें कर रहे हैं. और करते हुए दीख सिर्फ़ इसलिए नहीं रहे हैं कि आपके पैर ज़मीन पर नहीं हैं? सोच आसमान में है और पैर ज़मीन की जगह आपके मुंह में?..

1 comment:

  1. प्रमोद जी ज्यादा नही सोच पा रहे है तो ठीक ही है!!टंटा गया समझो वैसे सोचने पर किसी भले मानुष ने ये भी कहा है कि ..

    कि हरदम सोचते रहना किसी की शुद्धता उत्कृष्टता का नहीं लक्षण है
    गधा भी सोचता है घास पर चुपचाप एकाकी प्रतिष्ठित हो
    कि इतनी घास कैसे खा सकूंगा
    और दुबला हुआ करता है।

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