Thursday, November 13, 2008

अरे, यायावर, रहेगा याद!

हिंदी में यात्रा संस्‍मरण व आत्‍मकथात्‍मक, अंतरमथात्‍मक साहित्‍य का अभाव दुर्भाग्‍यपूर्ण है. जोसेफ़ हेलर की सहज-सुलभ ‘कैच-22’ या ऐडम स्मिथ की ‘द वेल्‍थ ऑफ़ नेशन्‍स’ जैसी क्‍लासिक रचनाओं का अभी तक दुलर्भ बने रहना तो ख़ैर है ही. एक तरह से देखिए तो हिंदी में क्‍या-क्‍या नहीं है और इस अभावस्‍था की गहरायी इतनी गहरी है, यह लिस्‍ट इतनी लंबी है कि वह खुद में ही एक समूची किताब की सामग्री हो सकती है. हो सकती है क्‍या, है. सवाल है ऐसी किताब भी हिंदी का कोई लाल लिख दे वह भी अबतक कहां उपस्थित है? इट्स रीयली अ वेरी डीप एंड अ वॉल्‍यूमनस अफ़ेयर. ऑर अ बुक. एंड कृष्‍णा सोबती के ‘मित्रो मरजानी’ के आकारवाली किताब नहीं, अश्‍क़ की ‘गिरती दीवारें’ और बीसी वर्मा की ‘भूले-बिसरे चित्र’ के भारीपने वाली! दुर्भाग्‍यपूर्ण है. ऐसी दुखती रग है कि इस चिन्‍ता पर कैसे भी ललित-लेखन में दुर्भाग्‍य शब्‍द के दोहराव का ख़तरा बन जाता है! और एक बार बन जाने के बाद आगे भी निरन्‍तर बना रहता है! आप सौभाग्‍यपूर्ण चंद स्थितिओं का स्‍मरण करें (ओ, हाऊ लिटिल?), पलक झपकायें, और थोड़ा आगे जाकर पाइयेगा कि छोटी लाइनवाली दुर्भाग्‍यपूर्ण स्‍टेशनों का सिलसिला शुरू हो गया है!

क्‍यों है आख़ि‍र ऐसा? आज मसिजीवी के सौभाग्‍यमिश्रित दुर्भाग्‍यवृतांत पर एक नज़र जाते ही मन में कितने और कैसे-कैसे तो गहरे सवाल उठते गये. क्‍या ग्‍लोबलाइज़ेशन के बूम टाइम ने हिंदीवासियों को इतना अवसर भी नहीं दिया कि अज़रबैजान न सही, अमेज़न या एम्‍सटरडम तक की ही वे यात्रा कर सकें? और लौटकर अपना उल्‍टा-सीधा ‘ओहो, कैसा तो अजब, और फिर कितना ग़जब!’ वृतांत राजकमल के हवाले कर राजकमल को बिजी और हिंदीजगत को धन्‍य कर सकें? या समूचे बूमटाइम नोट काट रहे थे, अब डूमटाइम कटे-कटे से विदेश-भ्रमण पर निकलेंगे और उस भ्रमण वृतांत के परायण का सौभाग्‍य हिंदी पाठकों के हिस्‍से चंद वर्षों के अनंतर आयेगा? मगर देश के हिस्‍से एक बूमटाइम आया, और आकर गुज़र भी गया लेकिन अगर उसका तात्‍कालिक लाभ हिंदी को नहीं हुआ है तो यह भी खासा दुर्भाग्‍यपूर्ण ही है!

लेकिन दुर्भाग्‍यपूर्ण तो और भी प्रसंग हैं. एक तो यही कि बूम का इतना बम-बम हुआ मगर राष्‍ट्रीय स्‍तर वाली हिंदी की कोई पत्रिका सामने नहीं आयी. विस्‍तार के नाटकीय छलांग आये, दैनिक भास्‍कर जैसे अख़बार ने खूब सारा पैसा काटा और झोंका, अपने चकमक मुकुट में एक पत्रिका का मोरपंख भी जोड़ा- ‘अहा, ज़िंदगी!’.. ऐसी ज़हीन और पहुंची हुई पत्रिका है कि ‘द न्‍यूयोर्कर’ का एडीटर देख ले तो उसी दिन न्‍यूयॉर्क छोड़कर ऋषीकेश चला जाये और वहीं किसी गुफा में सौभाग्‍य व दुर्भाग्‍य के गहरे विमर्श में अपने को ससुर, वेस्‍ट कर डाले!

मगर एक संभावना यह भी है कि न्‍यूयॉर्कर का संपादक ‘अहा, ज़िंदगी!’ देखने के अनंतर ऋषीकेश जाकर वेस्‍ट होने की जगह भ्रष्‍ट हो जाये, एक ओरियंटल, इरोटिक ट्रेवेलॉग लिख मारे और मुझसे ऋषीकेश व ऋषत्वविहीन लोगों को गरिमापूर्ण साहित्‍य के सौभाग्‍यमणि से भर दे? संभावना है. लेकिन उसके लिए भी पहले ‘अहा, ज़िंदगी!’ का न्‍यूयॉर्कर के एडीटर के डेस्‍क तक पहुंचना ज़रूरी है न? और जबतक ऐसा उद्यम भास्‍करित नहीं होता हिंदी की दुर्भाग्‍यावस्‍था बनी रहेगी.

लेकिन ऐसा नहीं कि लोग पहले ऋषीकेश नहीं गये, इरोटिन न सही, स्‍पीरिचुअल लिटरेचर ही लिख मारते? बाबा, ठीक है, बैष्‍णोदेवी तो गये थे? गुलशन कुमार तक ने इतने सीडी निकाल लिये, आपसे एक यात्रावृतांत न बहिरया गया? और अपने को हिंदी-हितैषी बोलते हैं? समीर लाल को देखिये, कैनडा में खा-खाके फैल रहे हैं, उस फैलाव को ‘टोरंटो में यहां से वहां’ के किसी क्रियेटिव ट्रेवलॉग में कन्‍वर्ट करने की जगह सिर्फ़ यहां और पता नहीं कहां-कहां के ब्‍लॉगों पर की कमेंटबाजी में अपनी एनर्जी फ्रस्‍ट्रेट कर रहे हैं?

खुद मेरी कहानी कम दुर्भाग्‍यपूर्ण नहीं. कैनडा न सही कलकत्‍ता तीन दिनों के लिए तीन मर्तबा ज़रूर गया हूं, ‘ओह, आमार कोलकोता!’ जैसा कोई हृदयविदारक, मर्मांतक नवारुण भट्टाचार्य मोतुन जिनिस लिख मारता, लिखा? कहां लिखा? बनारस, बालासोर, बलांगीर, बलरामपुर सब अनलिखे पड़े हुए हैं. हृदय में कैसी तो कचोट उठती है. हिंदी में सबकुछ कैसा-कैसा तो दुर्भाग्‍यपूण है. क्‍यों है?

इस विषय पर मैं बहुत कुछ और बहुत देर तक बोलता रह सकता हूं, समय मिले तो किताब भी लिख सकता हूं, मगर, समय भी तो, ससुर, एक बड़ी फ़जीहत है, फ़ि‍लहाल बाहर भागना है और देरी हो रही है. इसी लघुलेखन से काम चलाइये.

7 comments:

  1. आपके इस लघु लेखन से काम चलाया। आप इसी तरह के लेख लिखते रहिये। अच्छा लगता है। ट्रवेलाग लिखते काहे नहीं? आप लिखिये न!

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  2. और, यदि यशवंत व्यास इसे पढ़ लें तो वे यकीनन अहा जिंदगी की संपादकी छोड़कर मॅक्जिम पत्रिका ज्वाइन कर लें!

    बाकी आपने सही कहा है. मेरी भी ढेरों भले न सही, चंद यात्राएँ हुई हैं, कम्यूटर, की-बोर्ड, चित्र, वीडियो सब सामने है, मगर लिखने का जज्बा नहीं. प्राथमिकता ही नहीं बन पाती. चलिए, आपने आत्मावलोकन लायक मसाला फैलाया है, कुछ करते है...

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  3. वाह प्रमोद बाबू, अपने समय- समय भी तो, ससुर, एक बड़ी फ़जीहत है और सामने वाला एनर्जी फ्रस्‍ट्रेट कर रहा है?? हा हा!!

    वैसे बात १०० टका सही है और मैं हमेशा की तरह आपसे पूरी तरह सहमत.

    भरोसा रखिये इस नौजवान पर. आपकी उम्मिदों पर खरा उतरेगा. चेताने का आभार.

    पहली लाईन मजाक बाकि सारा एकदम्मे सिरियस.

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  4. एक ठो फार्मेटवा के लिए लिख कर भी लगा दें ट्रेवलाग..तो जरा सहूलियत झाड़ लेंगे.

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  5. अब तो आप जबरीया ट्रेवलाग लिख ही दो !!

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  6. अनलिखे पड़े सभी वृतांत लिखे जाएँ,
    समय निकाल कर.

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