Friday, November 14, 2008

बलरामपुर से गुज़रते हुए: चंद नोट्स

बलरामपुर पहुंचते ही बूदापेस्‍ट में लिखी वर्षों पुरानी अपनी काव्‍य-पंक्तियां एक बार फिर अंदर घुमड़ने लगीं: रे सखी, नेह पुराना होगा/ नयनों के घात/ सयाने होंगे?

बलरामपुर पहुंचते ही सबकुछ अनोखा लग रहा है. अनोखा दरअसल बलरामपुर में मेरी उपस्थिति लग रही है, बलरामपुर तो जैसे दुनिया का कोई भी बलरामपुर लग सकता है वैसा ही लग रहा है. अपने नाम को सार्थक कर रहा है. किसी भी दिशा में कोई भी कदम बढ़ाने के लिए ढेर सारे आत्‍मबल की ज़रूरत पड़ रही है, राम के स्‍मरण की तो पड़ ही रही है. नाली पर उत्‍सर्गावस्‍था, या मुद्रा, में बैठा एक बच्‍चा बहुविध रचनात्‍मकता को सार्थक कर रहा है. माने उत्‍सर्ग तो कर ही रहा है, झाड़ की एक डंडी से ज़मीन पर कलाकारी करता शागाल और ग़ुलाम मोहम्‍मद शेख़ के कान भी उमेंठ रहा है. पीछे हल-हल बहती नाली किलकारी कर रही है. एक दूसरी बच्‍ची है घुटनों तक फ्राक समेटे क्रियेटिविटी को नयी ऊंचाइयां दे रही है. कहीं से लहाये सस्‍ते लिपस्टिक से एड़ि‍यां रंगती उससे आलता का काम निकाल ले जा रही है.

ज़रा दूर पर पाठशाला है. ज़रा दूर से देखते हुए वेस्‍टर्न फ़ि‍ल्‍मों में किसी दुर्घर्ष गोलीकांड के बाद उजड़ा संसार लगता है, लेकिन निकट पहुंचने पर दीखता है एक बकरी व गदहा यहां-वहां छुटी हुई शिक्षा का घास चर रहे हैं. स्‍पेस यूटिलाइज़ेशन के मैक्‍सीमाइज़ेशन की थियरी में दीक्षित चंद नौजवान ताश खेलते हुए एक-दूसरे पर फैल रहे हैं जिससे साफ़ दिख रहा है कि बलरामपुर की रगों में बहता जवान ख़ून अभी ठंडा नहीं हुआ है. गौशालानुमा पाठशाला की दीवार पर दो पुरानी फ़ि‍ल्‍म- ‘जीने की राह’ और ‘साधू और शैतान’ के पुराने पोस्‍टरों के चिथड़े बचे हुए हैं जिसे देखकर पता चल जा रहा है कि बलरामपुर में न केवल नागर संस्‍कृति का ऑलरेडी पदार्पण हो चुका है, बल्कि आगमन के बाद वह अभीतक वहां बनी हुई भी है!

बूदापेस्‍ट में उड़ायी अपनी विदेशी डायरी में ये सारे सोश्‍योलॉजिकल डेटा कंपाइल करता, इसके सिवा और भी जाने क्‍या-क्‍या सोचता, चाय के एक सड़े हुए ठेले पर आकर ढेर होता हूं. बाजू में ज़िंदगी से ढेर हुए एक बुज़ूर्ग मौलवी हैं ठौर लिये चाय सुड़क रहे हैं, दुआ-सलाम की अनौपचारिकता से बचते हुए उनसे सीधा सवाल करता हूं- आपके यहां बच्‍चों के बम-वम बनाने की ट्रेनिंग के कैसे सूरते-हाल हैं? मौलवी साहब सकपकाकर बगलें झांकने लगते हैं, मैं सोचने लगता हूं अगले मोड़ पर मंदिर के बाहर बैठे साध्‍वी व साधुओं से यही सवाल दाग़कर देखूंगा कि वे भी बगलें ही झांकते हैं, या मुझको बलरामपुर छोड़ने पर मजबूर कर देते हैं?

पर्याप्‍त मात्रा में बगलों को झांक चुकने के पश्‍चात् मौलवी साहब मुझसे मेरा परिचय पूछते हैं. मैं हंसते हुए जवाब देता हूं कि वे मदरसों के मठाधीश हैं, मैं ब्‍लॉगिंग का हूं! मौलवी साहब सवाल करते हैं ब्‍लॉगिंग क्‍या?

मैं सन्‍न होकर सोचता हूं ऐसे ही नहीं है कि बलरामपुर, बलरामपुर बना हुआ है! और बना रहेगा. हद है. तबतक अपने को मेरी पत्‍नी बतानेवाली औरत का फ़ोन आ जाता है कि कहां पहुंचे. भन्‍नाया जवाब देता हूं कि हद है, यार, अभी बलरामपुर ही पहुंचा हूं और तुमने लेसना शुरू कर दिया! चूंकि पत्‍नी है उसका पत्‍नीयाना शुरू हो जाता है कि सच-सच कहो बलरामपुर में ही हो, कहीं इधर-उधर नैन-मटक्‍का नहीं कर रहे? मैं मौलवी जी से आवाज़ बचाकर बदक़ार को जवाब देता हूं- अबे, लिच्‍चड़ी कहींकी, यही भरोसा लेकर हमारे साथ सात फेरे और जनम-जनम हमारी सेवा का प्रण लिया था? बेवक़ूफ़ औरत को चुप कराकर अबकी मैं फ़ोन करता हूं. प्रियतमा चंद्रकला को.

चंद्रकला जम्‍हाई लेकर कहती है क्‍या है. मैं दुखी होकर कहता हूं मैं बलरामपुर की धूल फांक रहा हूं और तुम अभी तक सो रही हो? चंद्रकला ऊबी हुई कहती है फिर क्‍या करूं. मैं कहता हूं मुझे मिस करो, द वे आई एम मिसिंग यू, चैंडी? चंडाल चैंडी चिढ़कर फ़ोन रख देती है, और फिर मेरी कितनी भी घनघनाहटों के बावज़ूद फ़ोन दुबारा उठाती नहीं. जैसाकि ऐसी चंडालस्थिति में स्‍वाभाविक है मेरा मन घबराने लगता है, चैंडी की यादें सताने व अपने पास बुलाने लगती हैं. द जिस्‍ट आफ द मैटर इज़ कि आई स्‍टार्ट हेटिंग बलरामपुर, ऑर फॉर दैट मैटर, एनी पुर, एंड डू माई बेस्‍ट टू गेट आऊट फ्रॉम इट!

वापसी में चंद्रकला के बारे में किसी भी असुविधाजनक स्थिति-परिस्थिति की भयकारी कल्‍पना से बचने के लिए मैं लगातार सोच रहा हूं कि बलरामपुर ठीक-ठीक कहां है? क्‍या वह चाय के ठेले, या गौशालानुमा पाठशाला की दीवार पर छुटे पोस्‍टर के चिथड़ों में छिपा है, या उसके मटमैले अंधेरों का करियाया लालटेन अपनी आत्‍मा में गाड़े मैं कहीं भी जाऊंगा, बलरामपुर मुझसे छूटेगा नहीं?

(उड़ंतू परात उर्फ़ केरल के मोहनलाल की तर्ज़ पर समीर 'सोहनलाल' के लिए. कि खामख़्वाह हमसे मुंह न फुलायें, ज़रा सहूलियत झाड़ सकें!)

4 comments:

  1. बलरामपुर चलने के लिए बल के साथ राम का नाम और पुरजोश की ज़रूरत होती है, यह लेख से साफ ज़ाहिर होता है। अच्छा लेख, बधाई!

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  2. बलरामपुर तो छूटने से रहा चाहे कितनी ही हेट लिख दो एक लाईन में. बस, बिल्लियायी भुलावा पाल सकते हो एक ठो ए सी कमरा में बैठकर प्रियतमा के साथ वाइन सुड़कते हुए..कि हाय हाय, ये देखो, मैने बलरामपुर को विस्मृत कर दिया.
    तब थोड़ा गाल बजाना, गोड़ हिलाना फिर छा जायेगा बलरामपुर.. :)

    आपसे कैसे मूँह फुला सकते हैं..उस तरफ से निश्चिंत रहिये. यूँ भी स्वयंभू मठाधीश तो घोषित हो लिए हो, फिर कैसे हम मूँह फुलाये. मौलवी से तो फिर भी बच लेंगे. :)

    बढ़िया पीस रहा सेम्पल के लिए..कोशिश करेंगे.

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  3. ट्रेवलाग लिखते-लिखते ट्रेजडी हो ली लगती है ,आप समझ मे आया आप क्यो हर लेख के नीचे पतनशील साहित्य क्यो लिखते है !!

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