Monday, November 3, 2008

सामने दुनिया का सुनहला नक़्शा होगा..

बात कहां से कहां चली जाती है. महीन के बीच भदेस और अच्‍छे के बीच किस आसानी से वीभत्‍स चला आता है. अंतरंगता के ठीक मध्‍य अजनबीयत की कैसी उलझी गांठें फंसी होती हैं. स्‍नेह के बांहबगल सपाट सूनापन, उजले उजास चदरी पर पसरी सियाह लक़ीरें. हंसी की बेवक़ूफ़ी के बाद चुप होकर मैंने खुद को सम्‍हालने की कोशिश की. जुसेप्‍पे की बात का बुरा मानकर तक़लीफ़ के हल्‍के जाम पीता मैं खुशी-खुशी उदास रह सकता था, मगर फिर वह खुद को जुसेप्‍पे से अलग व दूर खड़ा करके देखने की दुनिया होती. और सपनों की झिलमिल महीन रौशनियों में जुसेप्‍पे के संग ऐसा दुराव बरतकर मैं अपने ढंग की फिर कोई दूसरी हिंसा बुनता होता, और सपनों की वह निश्‍छल कोमलता फिर किसी भी सूरत में न होती..

जुसेप्‍पे के सवाल का मैंने जवाब नहीं दिया. न तमारा, बच्‍चों व बीच के महीनों उसकी ज़िंदगी में क्‍या उतार-चढ़ाव आये के बाबत सवाल पूछकर जुसेप्‍पे की परेशानी बढ़ायी. इस हल्‍की नीली उजास रोशनी और पत्‍तों की नमदार खुशनुमा महक के बीच सवालों को इंतज़ार करने की थोड़ी मोहलत दी जा सकती है. जुसेप्‍पे की बात का मुझे बुरा नहीं मानना चाहिये. वैसे ही नहीं मानना चाहिये जैसे वह मुझसे कहता है पज़ोलिनी की भारत के बारे में बनायी डॉक्‍यूमेंट्री का मुझे बुरा नहीं मानना चाहिये. उसकी टेक गिवेन सिचुएशन में प्रॉब्‍लेमेटिक रही हो, उसकी मंशा नहीं रही होगी. जैसे जुसेप्‍पे की नहीं होगी. उसकी व उसकी दुनिया के प्रति मेरी नहीं हो सकती. बुरी मंशा. सवाल ही नहीं उठता. अलबत्‍ता टेक तो फिसल-फिसलकर कहां-कितनी जगहें बदलती रहती है. बदलेगी ही. क्‍योंकि मैं बदलता रहता हूं. जुसेप्‍पे बदलता है, हम सभी किसी न किसी तरह से लगातार बदलते रहते हैं. नहीं बदलते? नहीं बदलते तो अच्‍छी मंशाओं वाले हम कैसे बेवक़ूफ़ लोग हैं? जुसेप्‍पे इस बात को ज़्यादा तफ़सील से समझा सकता है. ही इज़ मोर आर्टिकुलेट देन मी. एनीडे. ही ऑलवेज़ वॉज़. पूछुंगा उससे. बाद में. अभी जुसेप्‍पे को उसकी सुर्ख़ लाल मफ़लर के पीछे की सर्द उदासियों व खुद को सपनीले नीले की बहक में बहकने दूं.

कैसी भी परिस्थिति हो आदमी अपने लिए उम्‍मीद की एक भोली-भली कहानी बुनता चलता है. मेरी तरह का सिनिकल व्‍यक्ति भी. हां, सपने में इस सच्‍चायी की सूरत नहीं बदल जाती. जुसेप्‍पे की हार्डकोर प्रैगमैटिक संगत के बावज़ूद. जुसेप्‍पे को एकदम से यह सब बताकर भोले-भलेपन का मैं ज़ायका नहीं खराब करना चाहता. लेट इट बी फॉर अ व्‍हाइल. फॉर अ लिटिल व्‍हाइल! इट वॉंट हर्ट एनीवन, इट वॉंट ना?

न तुम मुझसे सवाल करो न मैं करूंगा. लेट्स फ़स्‍र्ट कन्‍फ़र्म टू सम बेसिक अंडरस्‍टैंडिंग एंड एक्‍सेप्‍टेंस अबाऊट इच-अदर. ओके? जुसेप्‍पे से यह सब कहने की ज़रूरत नहीं, ही नोज़ ऑल दैट. ही ऊड नॉट इवन माइंड माई बीइंग ऑन माई ओन स्‍टुपिडिटिज़ फॉर अ व्‍हाइल, यू वोंट ना, जुसेप्‍पे माई लव?..

सबसे पहले तो सपनीली, सजीली, नीली यह रोशनी बदल जाये इसके पहले कितने सारे तो सफ़र करने हैं. डकार, बमाको, अल्‍जीयर्स, ट्रयूनिस, फिर ट्यूनिस से नाव लिये पलेर्मो, नापोली, फिर, फिर? सारायेवो, बुदापेस्‍त, ब्रातीसलावा, क्राकोव, विलनियस, मिंस्‍क, तालिनिन, फिर हेलसिंकी में पैर पसारे सेंट पीटर्सबर्ग के बारे में नशीली खामख़्याली बुनना. साथ में आंद्रेई बेली की किताब होगी, कोई डच थ्रिलर होगा और..? नहीं, जुसेप्‍पे, सारा कुछ सब मैं तुम्‍हें एक साथ नहीं बता सकता, नो, इट वोंट बी फ़ेयर, रियली, माई स्‍वीटहार्ट..

(जारी)

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