दो तस्‍वीरें..

2 कमेंट - लजाइये नहीं, टिपियाइये


हमारा समय..
छोटे शहर में छोटा बने रहकर मरना मुश्किल होगा, बड़े में बड़ा होकर जीना. कहीं से कहीं निकलकर घूम आने में दिक़्क़त होगी, आत्‍मा के सूने गलियारों में धुंए के बगूले होंगे धमाकों का अंधेरा होगा. रह-रहकर लगेगा सब शांत हुआ फिर बेचैनियों की पांत से नयी बत्तियां जलेंगी. फुदकन प्रसाद फुदकते फिर सबको ख़बर करते घूमेंगे ढहा दिया उड़ा लिया गिरा दिया. इस रौरव जुगूप्‍सा की वज़ह जाने क्‍या होगी, खुद के चूतड़ के चिथड़े नहीं उड़े का आह्लाद होगा? सवारियां फिर इस गली से निकल उस सड़क पर जायेंगी, स्‍कूल का भारी झोला लिये एक बच्‍चा अपने घर आयेगा, समय और समाज के जंगल में खुशहाली सबसे आंख चुराती-सी होगी. फिर भी जो बचा रह जाता होगा उसके बच लेने में सरकार की कोई भूमिका न होती होगी.

यहीं कहीं..

चिट्ठी कोई पुरानी दबी काग़जों के बीच अचानक उचकती आवाज़ लगायेगी- ओ, हमें सब भूल गये क्‍या? अटकी एक घड़ी अटकती तेरह सेकेंड आगे बढ़ेगी फिर कहेगी अब क्‍या. कुम्‍हलाये त्‍वचा की रूखायी घबरायी सवाल करेगी रात-दिन सुनते हैं मेला-मेला, हमारे जीवन में कहां है. सांझ के धुंधलके में उठेगी हवा अलसायी पीपल के पेड़ से गुज़रती नीम के थपकी लगाती बेर से दुपट्टा बचाती, कृपानरायण दुबे के छत पर सूखने को डले कपड़ों को अंकवार में धरेगी; वैसी ही तेजी से जैसे मनीषा अम्‍मा को बिन बताये पैरों में उल्‍टा चप्‍पल फंसाये भागी मनिहारी की दूकान लाल रिबन देखने के बहाने खुद में रंगीनी भर रही होगी. हज्‍जाम के खपड़ैली दूकान की छत पर अभी-अभी कूदी बिलार जाने किस ओर से निकल आयी हवा का बलजोर महसूसती एकदम देह फटकती कान खड़ी कर लेगी कि अरे, कौन है रे, बद्तमीज़? मां की गोद में सोयी बच्‍ची पता नहीं कहां क्‍या महसूसकर अचानक रोने लगेगी, जैसे प्रताप भैया अपने गेट पर पैर टिकाये जाने क्‍या देखकर मुस्‍कराते होंगे. सबकुछ कितना-कितना तो कुम्‍हलाया होगा, लेकिन फिर भी जैसे पहली-पहली बार प्रकटाया होगा. खिड़की पर अटकी हवा नहीं पूछेगी, मैं ही जाने किससे कह रहा होऊंगा कहीं गया नहीं हूं, अभी हूं, यहीं कहीं.

 
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दीपक - November 27, 2008 3:45 PM

सही कह रहे है अशोक जी !! ये धमाके ना तो सरदार को दिख रहे है ना सरकार को सब ईटली का इत्र डाले भुल गये है कि पिछले छः महिनो मे हुये ५९ धमाको ने यहा की हवा मे बारुद भर दिया है !!

मलय - November 28, 2008 12:02 AM

अब तो हद ही हो गयी। कुछ क्रान्तिकारी कदम उठाना चाहिए। कुछ भी...।

अब समय आ गया है कि देश का प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को, राष्ट्रपति लालकृ्ष्ण आडवाणी को, रक्षामन्त्री कर्नल पुरोहित को, और गृहमन्त्री साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को बना दिया जाय। सोनिया,मनमोहन,शिवराज पाटिल,और प्रतिभा पाटिल को अफजल गुरू व बम्बई में पकड़े गये आतंकवादियों के साथ एक ही बैरक में तिहाड़ की कालकोठरी में बन्द कर देना चाहिए। अच्छी दोस्ती निभेगी इनकी।

इनपर रासुका भी लगा दे तो कम ही है।

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