Thursday, November 20, 2008

साथ चलते, पूंछ ही लिये चलते, मगर फिर भी कैसे चलते?

अच्‍छी बात नहीं अनूप शुकुल हमारी आवाज़ सुनकर आनन्दित होने की बात कह रहे हैं, जबकि सुबह की डली चीज़ को अभी दुबारा सुनते हुए हमें खुद के शर्मिन्‍दा होने की बात कहनी पड़ रही है. लम्‍बे अरसे के गैप के बाद जिस पॉडकास्‍ट को हम पहाड़ से नीचे लाया ऊंट समझ रहे थे, अभी थोड़ी देर पहले जाकर पता चला दरअसल ऊंट की बजाय मैं महज़ उसकी पूंछ ही पहाड़ के नीचे तक ला पाया हूं. माने जिस संगीत-स्‍वरवर्षा को हमने सवा पांच मिनट का समझ अंतरजाल के आईमीम को समर्पित किया था, वह पलटकर मेरे ब्राउज़र में मुझे महज़ सवा मिनट का मसाला लौटाल रही थी! बावज़ूद उसके शुकुल जी आनन्दित हुए तो उनके उत्‍साही ज़ज्बे की कदर होनी चाहिए कि देखो, आदमी की हौसला-ए-मोहब्‍बत कि सुकुमारी की संगत हाथ न आयी तो क्‍या उसकी सवारी की झलकी ने ही सीना-ए-अरमान रंगीन कर दिया! ओह, क्‍या आनेवाली पीढ़ि‍यां नाज़ तो क्‍या, याद भी कर सकेंगी कि हमने अनूप शुक्‍ल को देखा था?

आनेवाली पीढ़ि‍यां क्‍या, घंटा, शायद मैं भी कहां याद कर सकूंगा? शायद यही याद रहे कि वक़्त-बेवक़्त लाइफ़लॉगर कैसे बेड़ा गर्क करती रही है. गर्क बेड़े को सम्‍भालने व सुकूनदेह किसी दूसरे किनारे तक पहुंचाने की तसल्‍ली दिलानेवाले विमललाल फिर बेड़े को बूड़ने से बचाते हैं भी तो ससुरी, बाद में जाकर पता चलता है कि बेड़े की महज़ पूंछ ही बची है. कुछ वर्ष निकल जायें, यह सब याद रहेगा? रह पायेगा? देखिये, सुबह अरसे बाद डाक से वीपीपी में दो किताबें मंगवायी थीं, इतनी जल्‍दी चली भी आयीं, और पॉडकास्‍ट की घिसिर-पिसिर में मैं ऐसे सुखकर समाचार को लगभग भूल-भूल सा नहीं, पूरी तरह भूल ही चुका था. महज़ चंद घंटों के फ़ासले पर अख़्ति‍रयायी किताबों को इतनी जल्‍दी इस बेशर्मी से भूलने लगना शायद अच्‍छे लक्षण नहीं. तब तो और भी नहीं जब किताबी दुनिया के दु:खों की चांदनी का पसराव हो रहा हो. कुछ दिनों पहले ही किसी पोस्‍ट पर 'पहल' के बंद होने की ख़बर पढ़ी थी, आज सुबह किसी और से सुना कि दिल्‍ली के श्रीराम सेंटर वाली किताबी गुमटी बंद हो रही है. ज़्यादा अर्सा नहीं हुआ दिल्‍ली में ‘बुकवर्म’ भी बंद हुई थी. मुंबई में वैसे भी हिन्‍दी किताबों की ऐसी कोई ख़ास उपस्थिति नहीं, जितनी है उसमें ‘पहल’ से जुड़े हिन्‍दी के एक साहित्‍यसेवी जितेन्‍द्र भाटिया की ‘वसुन्‍धरा’ है, तो वसुन्‍धरा पहुंचने पर वहां भी आमतौर पर यही राग सुनने व महसूसने को मिलता है कि जब दिल ही टूट गया तो अब जीकर क्‍या करेंगे..

ऐसे में अच्‍छा है अनूप शुकुल का कलेजा है वह आनन्दित हो लेते हैं, मेरे हाथ केदारनाथ सिंह की ‘कब्रिस्‍तान में पंचायत’ और असग़र वजाहत की ‘साथ चलते तो अच्‍छा था’ लगी है, लेकिन देखिये, मैं उन्‍हें देखने की जगह, पॉडकास्‍ट के टूटे हुए बेड़े के फटे हुए फट्टे हाथ में घुमा रहा हूं. शायद अच्‍छा ही है. क्‍योंकि ‘साथ चलते तो अच्‍छा था’ हाथ में घुमाना शुरू भी करता तो न तो हंसते-हंसते ईरान, या अज़रबैजान पहुंच जाता, न मसिजीवी की तरह आह्लादित होकर घोषणा कर सकने की स्थिति में रहता कि लो, दिन भर में पूरी किताब खत्‍म कर ली! क्‍योंकि खत्‍म की नहीं होती! कैसे की होती जबकि पढ़ना शुरू ही उसे रात में करना होता?

1 comment:

  1. Respected pramodjee,
    Apne bahoot hee khoobsoortee ke sath anoop shukuljee se apnee bat shuroo karke Pahal,Vasundhara,ShreeRam senter valee gumtee Tatha Book verm kee baten chedee han.Vakayee ye ek chinta ka vishaya to ha hee.Is tarah se agar ek ek kar patrikaen,book centeres band hote gaye to hamare sahitya,sahityakaron,aur sanskritik dharohar ka kya hoga?Hamaree ane valee peedhee ko kya milega ,sochane aur chintan karne ke liye?
    Man bhee apne blog ke madhyam se bachchon kee behtaree ke liye ek chhoti see kochich kar raha hoon.
    Ap ise mere blog par dekh sakte han.
    Hemant Kumar

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