Monday, November 17, 2008

किधरकथा: बारह से बीस..

कांव-कांव-क्‍यों?



कब स्‍केचिंग..



कहां स्‍केचिंग..



घर लौटायी..


गिराई..


पढ़ाई..



घर..


या पंडिजी की पंडिताई.. पंडिताईन की दु:खयायी का?..


मगर मन है कि..


(स्‍केचेज़ अपने छोटाकार में असुविधाजनक हो रही हो तो उसे चटकाकर बड़ाकार देख सकते हैं)

7 comments:

  1. अरे कल्पना तो बहुतै,नीक लग रहा है,अब तनी मुम्बई के जीवन पर भी स्केच किया जाय,थोड़ा आस पास की दुनियाँ भी दिखाईये...तब तो अऊर मज़ा आएगा....

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  2. जे बात! अभी पूरे दिन का बोरडम भाग गया. अपना फोटो तो बहुत ही सुंदर बनाये हैं. नहीं बनाये हैं?

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  3. १.बहुत अच्छे |
    सिले हैं होंठ तो अब ये तरीका निकाला है |
    २.सिगरेट सावर्जनिक पीना मना है [ब्लॉग भी सावर्जनिक है ]

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  4. कैसी रंगीन दुनिया ..
    सही , रॉटरिंग का कमाल !
    हम भी गिनती रख रहे हैं ...

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  5. परमोद जी स्कैच सचमुच बहुत अच्छे है !धांसु च फ़ांसु है !!

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  6. बुनता रहे मन यूँ ही उत्कृष्टता के नए आयाम.

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