Monday, November 3, 2008

गॉड ब्‍लेस द लवर्स..

लड़कियों की आंखों में इतना दर्द कहां से आता है? जबकि आईने के आगे खड़े होकर इतनी मर्तबा मैंनें आंखों को दायें-बायें किया है मगर दिल के अंदर उतर जाये दर्द में ज़र्द नश्‍तर की वह कशिश कभी पैदा नहीं कर सका. सच्‍चायी तो यह है कि एक घिसे हुए ब्‍लेडवाला असर भी नहीं निकाल सका. जबकि मंजरी ने अभी बिसुरना शुरू भी नहीं किया था, जाने दीवार पर किस अदृश्‍य बिंदु को जिगर का ख़ून पिलाती रंजीत को बास्‍टर्ड भर कहा था और मेरे मन में तक़लीफ़ व गुस्‍से की कुछ ऐसी ऐंठ उठने लगी कि देसाई सामने होता तो उसे तमाचा मारने की गरज से मैं कुर्सी से उठ खड़ा होता. या न भी खड़ा होता तो कैंटिन के मैनेजमेंट की नज़रें बचाता ज़मीन पर थूक दिया होता. उसके बाद भी परिस्थिति के उबाल को ज़ाहिर करने में कोई कसर रह गयी होती तो मंजरी का हाथ अपने हाथों में ले सबको सुनाते हुए मैंने जोर से कहा होता- प्‍लीज़ डार्लिंग, ऐसे गंवार और फ़रेबी आर्टिस्‍ट पर आंसू ज़ाया करने से बेहतर है तुम मेरे साथ कहीं क्‍वालिटी आइसक्रीम खाने चलो. या तुम्‍हारी मर्जी हो तो भांग की गोलियां खाकर परेड ग्राउंड की हरी घास पर भी जाकर हम लेट सकते हैं?

मगर दिक़्क़त थी इतना गुस्‍सा ज़ाहिर करने जितना रंजीत देसाई को मैं जानता नहीं था. हाथ थामकर कैंटिन के बाहर चला जाऊंगा से ज़्यादा कैंटिन के भीतर ही उसका हाथ अपने हाथों में ले लूं, मंजरी तक से ऐसी कोई पहचान नहीं थी. फिर दिक़्क़त के साथ इसका असमंजस भी था कि ताप्‍ती, खोसला या नावेद की ग़ैरमौज़ूदगी में मंजरी मुझे अपना हमराज़ समझने की इज़्ज़त बख्‍श रही थी, उनमें से किसी के आते ही शायद मुझसे मुंह फेरकर कुर्सी से उठ जाये. रंजीत का गुस्‍सा मुझपर उतारकर शायद फिर मुझे पहचानने से भी इंकार कर दे?

मगर कैंटिन में ताप्‍ती, नावेद, खोसला कोई नहीं आया, और मेरे परीशां चेहरे को दर्दधुली खाली नज़रों से तकती मंजरी किसी छोटे बच्‍चे के मोज़ों की बिनाई की तरह धीमे-धीमे हाले-दिल की अपनी खुश्‍क दास्‍तां बुनती रही, मैं ड्राई व्‍हाइट वाईन की तरह हौले-हौले उसे पीकर मंजरी का सूना हाथ अपने हाथों में ले लेने को कलपता रहा..

- यू नो व्‍हाट, डियर.. ? अचानक मेरी आत्‍मा को अपनी उंगलियों की नोक पर लिये हों की गड़ती नज़रों से देखती मंजरी ने कहा तो किसी तरह से मेरे खुश्‍क गरदन से आवाज़ निकली- अबरार.. अबरार इज़ माई गुड नेम!

- हां, आई नो.. जानते हो, हाऊ बैडली दैट फ्रेंड ऑफ़ यूअर्स हैज़ बीन ट्रीटिंग मी? ओ गॉड, सोचती हूं तो अंदर आग की लपटें उठने लगती हैं! दिमाग़ में सोच रखा था ऐसा कोई मौक़ा बन पड़ा तो क्‍या कह सकता हूं, लेकिन कुछ कहूं उसके पहले ही मंजरी ने हाथ बढ़ाकर रोक दिया, तमकती बोली- जबकि उस घटिया आदमी के पीछे किस-किस हद तक मैं नहीं गयी? शायद सारे आर्टिस्‍ट इसी तरह पागल होते हैं की सोच उसके पीछे-पीछे रात में रेत पर भागती रही! ऑफिस में सब जानते हैं भागना तो दूर तेज़ चलना भी मेरे लिए हराम है! घुटनों में दर्द के ऐसे टीले बनते हैं कि क्‍या कहूं! मगर सब करती रही, किसके लिए? काम से छुट्टी लेकर घर में मछलियां तलती रही, वापस स्‍कॉच पीना शुरू किया, फ़ॉर हूम? एंड ऑल फ़ॉर व्‍हाट?..

बिना पूरी कहानी समझे मैं समझदारों के मानिंद सिर हिलाता रहा.

- एक दिन मैंने कहा चलो, तीन-चार दिनों की छुट्टी लेकर पंचमढ़ी हो आयें! दो टके के उस बेशऊर खुदगर्ज़ ने जानते हो क्‍या जवाब दिया? कि पंचमढ़ी इज़ प्रिटी बोरिंग प्‍लेस! यस, दैट्स व्‍हाट ही सेड!- गुस्‍से की धमक में गर्म सांसें मेरे चेहरे पर छोड़ती एकदम से चुप होकर मंजरी मुझे घूरती रही. ऐसे मौक़ों पर हाज़ि‍रजवाबी की बड़ी ज़रूरत होती है, लेकिन अक्‍सर जैसाकि होता है मेरी ऐन वक़्त पर गायब हो गयी, मैंने अकबकाकर कहा- और इसी में आपने आपा खोकर हरामी को निकाल बाहर किया?

मैंने निहायत सादा तरीक़े से अपनी बात कही थी, और क़ायदन सादा तरीक़े से ही उसे स्‍वीकारना औरत का फर्ज़ बनता था, लेकिन ऐसी नकचढ़ी बवाल औरतों के साथ भी अक़्सरहां जैसाकि हो जाया करता है, कहीं के रुक्‍के को कहीं के फुक्‍के से जोड़ कुछ का कुछ समझ लेती हैं, और वह मज़े से समझती ही रहें बशर्ते सामनेवाली की ज़िंदगी बख्‍शी रहें. फ़ि‍लहाल ऐसा नहीं हुआ और आगबगूला औरत एकदम से मुझपर चढ़ गयी, और ऐसी चढ़ी कि कैंटिन में मौज़ूद हर कोई हमारी टेबल की ओर देखने लगा!

- व्‍हाट्स रॉंग विद् यू गाइज़? मैं क्‍या इतनी फालतू लगती हूं? एनी टॉम, डिक एंड हैरी गोज़ ऑन कॉलिंग मी आपा, डू आई लुक लाइक आपा मटिरियल? बताओ, जवाब दो मुझे!

मेरे पास नहीं था, जवाब. सिर गिराये मैं चुपचाप सिरचढ़ी औरत का गुस्‍सा बर्दाश्‍त करता रहा. पूछ सकता था रंजीत देसाई को बाहर करने के ड्रामे की रियल स्‍टोरी थी क्‍या, मगर नहीं पूछा. मन ही मन एक जाप पढ़ा- खुदा, मोहब्‍बत करनेवालों पर रहम कर! तब ख़बर नहीं थी बाद में इस जाप को पढ़ने के ढेरों मौक़े और आयेंगे!

(जारी)

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