Monday, December 1, 2008

अबे, यह गुस्‍सा किसके सिर पटक आयें? या पेट की मरोड़.. ?

दिल्‍ली में चुनाव हुए पता नहीं नतीजे कब आयेंगे. कभी भी आयें जानने की ऐसी बेक़रारी नहीं हो रही. लग रहा है बहुत दूर हूं, दिल्‍ली कोई और देश है. पिछले हफ्ते दिल्‍ली में बैठे शिवराज पाटिल को मुंबई के बारे में भी शायद ऐसा ही कुछ महसूस होता रहा हो. हो सकता है अल्‍सर या अन्‍य किसी पीड़ा से दुबले हो रहे हों, मुंबई की पीड़ा पल्‍ले न पड़ रही हो. मुंबई में रहते हुए आरआर पाटिल को नहीं पड़ रही थी तो इतनी दूर दिल्‍ली में शिवसत्‍व को कहां से पड़ती. पाटिल साबों का कसूर नहीं. न मराठी महाराणा ठाकरे लौहपुरुषों का है. ऐसे वक़्त आदमी टीवी के सामने आंख गड़ाये, बीच-बीच में टॉयलेट आये-जाये ही सुहाता है. करकरे, काम्‍टे, सालस्‍कर की तरह हदबद में बाहर निकल आये को बाहर की हवा कहां सुहाती है?

भीतर चार-छह दिनों से बड़ा गुस्‍सा महसूस हो रहा है लेकिन कुछ कर सकने की जगह बस लुंज-पुंज महसूस करता रहा हूं. पत्रकार की नौकरी करता होता तो कम से कम मुख्‍यमंत्री से जाकर इतना तो पूछ ही आता कि अकेले रामगोपाल को लेकर ही ताज़ में टेरर टुरिज़्म कर आये? साथ करीना को लेकर गये होते, गुरु, कोशिश करते जल्‍दी में एक फ़ि‍ल्‍म नहीं तो कम से कम एक गाना पिक्‍चराइज़ तो कर ही लिया जाये? हद है, यार, कितने सौ करोड़ के चढ़ावों से ऐसे जोकरों के हवाले किसी राज्‍य का कार्यभार सौंप दिया जाता है? और सौंपा जाता भी है तो फिर कोई पत्रकार इनपर सीधे-सीधे न भी थूक रहा हो, कम से कम अपने दफ़्तर लौटकर अपने संपादक की मेज़ पर थूक आता? कोई बच्‍चा बता रहा था सीएसटी स्‍टेशन पर जब पहली एके-47 स्‍टाइल अंधाधुंध गोलाबारी हुई और लोगों ने जानें गंवायीं, तब उपस्थित पचास पुलिसवालों में तीन के पास बन्‍दूक थे, बकिया लाठीधारी जवान थे. लगभग हज़ार करोड़ के बजट में बड़ी ठाठदार इमारतें और बड़े अधिकारियों के तामझाम के इंतज़ाम के बाद गनीमत है निचले स्‍तर के मामा भाईयों के पास किसी के पैर में फंसाकर गिरा देने को लाठियां तो थीं!

बहुत गुस्‍सा महसूस हो रहा है लेकिन मैं ऐसा भी नहीं कर पा रहा कि सौ लोगों को एसएमएस करूं, या कंधे पर रकसैक लिये हर किसी को जलती नज़रों से घूरना शुरू कर दूं. या खुलेआम इसको और उसको गालियां देना शुरू कर दूं. मन का भड़ास निकल जाता, उसमें सहूलियत रहती. मगर सहूलियत बन नहीं पा रही. प्रणव रॉय और बरखा दत्‍त की तरह और लोग भी होंगे जो चीख़-चीख़कर युद्ध और शत्रु की शिनाख़्तवाली शब्‍दावली घिस-घिसकर माहौल गरमा रहे होंगे, मुंह से झाग फेंक रहे होंगे, मुझसे वह सब भी नहीं हो पा रहा. मुझे ठीक-ठीक यह भी नहीं मालूम कि दस छोकरों का टहलते हुए मुंबई में घुस आना किसी ऐसे आततायी जंग का ऐलान है. या इधर-उधर गाजर-मूली की तरह मरते लोगों का इतना बेचारा हो जाना कैसा राजनायकत्‍व है. जितने लोग मरे बंधकत्‍व में मरे उससे बहुत कहीं ज़्यादा इसलिए मरते रहे कि यहां राजा का अपने जन से सचमुच कोई कनेक्‍ट नहीं, न उनकी सचमुच उसे चिंता है, अधिक से अधिक वह बांसुरी पर कुछ कारुणिक धुनें निकाल सकता है, वह भी, बशर्ते, साथ में बाबू रामगोपाल की सुहानी ईस्‍टमैनकलर संगत हो..

गुस्‍सा बहुत आ रहा है, मगर सब टुच्‍चा गुस्‍सा ही है, दो दिन बाद इधर-उधर फिर कहीं हेंहें-ठेंठे करता दिखूंगा.

दिल्‍ली बहुत दूर है, वैसे ही जैसे मुंबई बहुत दूर है. जो मरे हैं वह शायद सच्‍चायी के ज़रा क़रीब आये हों, बकिया हम सारे पता नहीं सच्‍चायी से कितना दूर हैं.

8 comments:

  1. dilli bahut door hai..
    itna door ki vahan hokar bhi koi apna na lage..
    kuchh-kuchh mumbai, chennai aur kolkata ka bhi yahi haal hai..
    ab to kabhi lagta hai ki kahin ek din apna desh chhorkar hi na bhagna pare..

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  2. ठीक कह रहे हैं परन्तु इस बार का गुस्सा लम्बे समय तक भुलाना नहीं है ।
    घुघूती बासूती

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  3. एक सच्‍चाई यह भी है कि इस देश में छह लाख गांव हैं। छह लाख गांवों और छह हजार ब्‍लॉगरों के बीच भी दूरी कम नहीं। असली भारत तो ये छह लाख गांव ही हैं, कोई माने या न माने।

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  4. आपने भी इसी पर लिखा! यानी जनता में सचमुच गुस्सा है.

    अच्छा है....यह.

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  5. जो लोग कहते हैं युद्ध एक विकल्प नहीं है, उनसे मेरा यह कहना है कि युद्ध एक बेहतर विकल्प नहीं है बशर्ते कि अन्य विकल्प मौजूद हों. लेकिन मुझे नहीं लगता कि अन्य विकल्प हैं. यदि शांति ही हर समस्या का जवाब होती तो कोई देश अपने यहाँ सेना न रखता. गुरु गोविंद सिंह जी ने कहा है,' देह शिवा वर मोहे कहे, शुभ कर्मन ते कबहुं न टरौ, न डरौं रण में जब जाए लड़ौं, निश्चय कर अपनी जीत करौं '

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  6. आप भी हे हे टए टे करेंगे हमारे नेताओं की तरह! कल आं. प्र. के सदन में शोक सभा में विधायकों को हे हे करते देखा गया।

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  7. सत्ता के दलालो को जुता मारो सालो को!!

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