Wednesday, December 3, 2008

लड़का, लड़की और मैं..

शहर के परले छोर गंदले नाख़ून छुपाता, पलकों पर पसीने की भारी बूंदें गिराता लड़का करीने व होशियारी से लिखने का जतन करता होगा- रोज़ग़ार, हाथ लिखे चले जाते होंगे- मजूरी.
हवा की एक हल्‍की लक़ीर के पीछे, धूप के एक अदद छोटे टुकड़े के जादू के बाजू, बैंक की इमारत के बाहर के घनेरे सूनेरे लड़का एक उड़ती बहक में सुध थामने की कोशिश करता होगा कि फकत चार अक्षर हैं, फकत चार अक्षर वह साध क्‍यों नहीं पा रहा? शहर के परले छोर में अझुराये जीवन, अपने मनमहल के भूगोल को ठीक-ठीक माप क्‍यों नहीं पा रहा?

सिकुड़ी-सरकती, मन की बदहालियों पर संकोच का नक़ाब चढ़ाये लड़की की उखड़ती आवाज़ अचानक कुछ ऐसे खुलेगी जैसे भूला हुआ कोई अजीज़ एसएमएस, या घंटों रोते रहने के बाद किसी बच्‍चे का सोया शांत चेहरा.
कांपती थरथराहट में लड़की फुसफुसायेगी थकान की सवारी करके नहीं पहुंचना चाहती थी तुमतक, लेकिन क्‍या करूं कमरे में तन्‍हायी नहीं है, तुमसे बात करने का मतलब अब बीच बाज़ार आकर खड़े होना ही है. गिनकर तीन मर्तबा आह भरना चाहती हूं, कहते-कहते चुप हो जाना चाहती हूं कि तुम्‍हें नहीं दिखता मेरी आत्‍मा में आग़ के बगूले, आंखों का सूनापन, बेमतलब ढले केश? जाने घूमते रहते हो दिनभर किधर कौन बिदेश.

शीशागड़े पैर घसीटता मैं छत के दूसरे छोर तक दौड़ा जाऊंगा कि क्‍या मज़ाक है किसने छिपा रखे हैं मेरे प्‍लास्टिक के पंख? फाइबर की रस्‍सी, जिसे थामकर देखो, ओह, मैं पहुंचा ही चाहता हूं दमास्‍कस और मराकेश?

6 comments:

  1. ओह!!! काश मिल पाते वो प्लास्टिक के पंख/ वो फाईबर की रस्सी!!!

    खोजता तो हूँ!!

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  2. माराकेश इतना मारक क्यों है ? दिन रात खींचता क्यों है ? गनीमत है लड़के और लड़की को माराकेश की मार नहीं , नहीं तो ये एक दुख और होता , आत्मा को छलनी करने के लिये ..
    माराकेश के कहवाघर में कहवा पीते ये ज्ञान नहीं आया ?

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  3. pasand aaya elkhbahut gehre bhav,bahut pasand aaya lekh ya kavita mein behti bhavnaye kahe,sundar.

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  4. एक बहुत प्यारी हलकी उड़ान में ही यह सब पकड़ा जा सकता है और आपने इसे बखूबी पकड़ा। मजा आया।

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