Friday, December 5, 2008

देश कहां है? उम्‍मीद..?

महानगरीय ट्रैफिक की भीड़भरी सड़कों पर उद्यम करके लोग कहीं से कहीं पहुंचकर गोलबंदी ज़ाहिर कर रहे हैं, राजनीतिकों को थू-थूओं से नवाजते नारों की दफ्ति‍यां लहरा रहे हैं, गुज़रों के शोग में मोमबत्तियां जला रहे है, सब बड़ी सुकूनदेह तस्‍वीरें हैं मगर.. उम्‍मीद कहां है? चुनाव में बहुत देरी व दूरी नहीं है, और तबतक ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा कि मुंबई हादसे से उपजे व्‍यापक असंतोष को गोलबंद करती कोई नयी राजनीति आकर रोज़मर्रा के जीवन की गहरी निराशा के भयानक खड्डे को पूरने का मोर्चा संभाल ले. और नहीं होने जा रहा तो चुनाव में चयन के लिए फिर वही नागनाथ और सांपनाथ ही सामने आयेंगे. एक बलात्‍कारी होगा दूसरा लुटेरा. न हुए तो उनके संगी होंगे. सीधे संगी न भी हुए सरकार बनाने-बचाने को बलात्‍कारी व लुटेरों के समर्थन का ही मुंह जोहते दिखेंगे. कोई नयी व अनोखी बात न होगी. हमारी आत्‍मा इतनी हारी हुई है कि कि इस पिटे-पिटाये लीक के बाहर राजनीति की न हमारे मन में कोई पहचान बनती है, न उसे बुनने की सतत-सक्रियता का कोई वैकल्पिक रास्‍ता भेजे में अपनी जगह बनाता है. और जिस तरह की हवा बन रही है, और ऐसी हवा को बनाने में बहुतों का बोरा-बोराभर फ़ायदा है, ठीक चुनाव के पहले पारंपरिक राजनीति से लोगों के मोहभंग व डिसगस्‍ट से डिस्‍ट्रैक्‍शन का सबसे कारगर उपाय है कि अपने गिरेबान में झांकने-झंकवाने की जगह पाकिस्‍तान के खिलाफ़ मोर्चा खोल लो! हवा में गर्मी आये तो लगे हाथ एक युद्ध भी निपटा लो, नुकसान नहीं होगा, गालियां हमारी तरफ़ आने की जगह पाकिस्‍तानी डायरेक्‍शन में जायेंगी, मुनाफ़ा जो होगा चुनाव के वक़्त हमारे डायरेक्‍शन में आयेगा!

आनेवाले महीनों में देखियेगा, राजनीतिक गोलबंदी बहुत हद तक इन्‍हीं रास्‍तों पर जायेगी. उसकी स्क्रिप्‍ट लगता है, ऑलरेडी लिखी जा चुकी है. नारे लगानेवाले और मोमबत्तियां जलानेवाले हारे-हारे फिर इन्‍हीं दो कौड़ी के नेताओं में नायकत्‍व खोज रहे होंगे. मीडिया व राष्‍ट्रीय अख़बार इन बड़ी बेपेंदी लोटा हस्तियों पर नायक-महान टाइप फैंसीफुल कहानियां छाप भी रही होंगी, और एक बार फिर, हम ऊंचे स्‍तर की बेवक़ूफ़ी में धंसेंगे कि हमने ये लो-वो लो, गिरगिट जतन से देश बचा लिया..

जो इस युद्ध के खिलाफ़ कोई उद्गार व्‍यक्‍त करता दिखेगा उसे गद्दार व देशद्रोही कहनेवाले लंपटों-गुंडों की कमी न होगी. वह भी पहली मर्तबा न होगा. क्‍योंकि इस देश में सबसे ज़्यादा आंतरिक अंगभंग करवाने की जिम्‍मेदार श्रीमती इंदिरा गांधी ही स्‍वयं को सबसे बड़ी लड़ाका देशभक्‍त और जब-जब फंसान में फंसी, विदेशी ताक़तों को इस देश का सबसे बड़ा शत्रु बताती रही हैं. बड़ी बेसिक हिस्‍टरी है. देखने और समझने के लिए बहुत बीटवीन द लाइन्‍स समझने की ज़रूरत नहीं.

अपनी शुरुआती चिन्‍ता पर वापस आता हूं. फिर गुज़ारिश करता हूं कि पाकिस्‍तान के ओट और उसके खोट देखनेवालो, दिल्‍ली चलानेवालों की आंख में आंख डालकर देखना बंद मत करना, प्‍लीज़! क्‍योंकि, देश इंदिरा गांधी के समय में भी टूटा था, अब टूटन जर्जर है. पाये-पाये हिल रहे हैं. ज़्यादा वक़्त देश छुपा ही रहता है. कभी-कभी सामने आता है. किसी उन्‍नीकृष्‍णन के पिता के गुस्‍से की शक्‍ल में, किसी करकरे की पत्‍नी के ख़ामोश विरोध में.. वर्ना देश कहां दिखता है? उम्‍मीद बने ऐसे गांव भी नहीं दिखते. जातियां दिखती हैं, विभाग और महकमे दिखते हैं, विभागीय गुटबंदी और उसके बचाव में सारा दोष दूसरे महकमे पर डालकर हाथ झाड़ लेने की सीनाज़ोर खुद्दारी दिखती है. अपनी गरदन व उसका बचाव दिखता है, राष्‍ट्रीय शर्म नहीं दिखती.

अलग-अलग राज्‍यों का संगठन नहीं, अलग-अलग विभागों की एक-दूसरे की मुंह की खवाने, नीचा दिखाने के परमपादी करतबों का अड़बंग दिखता है देश. दिखता नहीं, है. मुंबई पुलिस से मदद की गुहार पर नौसेना मुख्‍य सचिव का लिखित पत्र पाये बिना अपने बेस से हिलने में अपने को असमर्थ पाती है, पत्र पाने के बाद व आतताइयों के ताज़ में दाखिल होने के दो घंटे बाद वहां पहुंचती भी है तो होटल के अंदर जाने से मुंह चुराने लगती है कि ऐसे किसी मुक़ाबले की हमारी ट्रेनिंग नहीं है! जिनकी ट्रेनिंग है, राष्‍ट्रीय सुरक्षा गार्ड, उनको तड़ से दिल्‍ली से मुंबई रवाना करने के लिए विमान मुहैय्या हो, ऐसे विमान मुहैय्या करवाने की ट्रेनिंग नहीं है. इधर-उधर बिखरी तस्‍वीरों पर ग़ौर से ध्‍यान दीजिये तो देश नहीं दिखता, उसके बिखराव की तस्‍वीरें ही दिखती हैं. जुड़ाव सिर्फ़ विभागों का ही दिखता है. मोमबत्‍ती जलाने व प्‍लेकार्ड लहरानेवालों का फ़ि‍लहाल दिखता है, मगर वह कितने वक़्त तक बना रहेगा उसे लेकर मैं बहुत आश्‍वस्‍त नहीं हूं. पाकिस्‍तान पर निशाना बांधकर ढेला फेंकनेवाले लफंटुशी देशभक्ति पर तो कतई नहीं हूं.

आखिर में एक बार फिर, अच्‍छा है लोग देश खोज रहे हैं, भावना के साथ-साथ विवेक की समझदारी से भी उस खोज को मांजते-संवारते चलें. उम्‍मीद करें कि शायद इस बार उम्‍मीद को देश, और देश को उम्‍मीद मिल जाये..

4 comments:

  1. प्रमोदजी,
    'जनसत्‍ता' के रविवारी में आपको नियमित रूप से पढता हूं, उत्‍कण्ठित और प्रतीक्षारत रहकर ।
    आपकी चिन्‍ताओं से भला कौन असहमत होगा ? लेकिन आप और आप जैसे तमाम कलमकारों से हम लोग बहुत छोटी-छोटी अपेक्षाएं रखते हैं और अनुगमन करने को ललकते रहते हैं ।
    छोटी जगह पर रहने वाला बडी जोखित उठाता है और बडी जगह पर रहने वाला, छोटी जगहोंवालों की उठाई जेखिम के 'रिटर्न्स एंजाय' करता है ।
    जो-जो चिन्‍ताएं आपने जताईं हैं, उनके शिल्‍पकार दिल्‍ली में ही बिराजते हैं । दिल्‍ली के तमाम कलमकार उन्‍हें और उनके '‍करिश्‍मों' को 'जानते-पहचानते' हैं । वे सब 'संज्ञाएं' हैं लेकिन जब भी उन्‍हें चिह्नित करने का अवसर आता है तब उन तमाम संज्ञाओं को सर्वनामों में बदल दिया जाता है और 'दो कौडी के नेताओं में नायकत्‍व की खोज' को लेकर चिन्‍ता जताई जाती है ।
    जिस राजनीतिक गोलबन्‍दी की स्क्रिप्‍ट लिखे जाने को लेकर आप चिन्तित हैं, वह तो पहले ही दिन से लिखी हुई और सब उसे केवल दुहरा रहे हैं ।
    यह बिलकुल सच है कि 'ज्‍यादा वक्‍त, देश छुपा ही रहता है' और इसीलिए जब आप 'दिल्‍ली चलानेवालों की आंखों में आंख डालकर देखना बन्‍द मत करना' वाला सामयिक परामर्श देते हैं तो राहत ही मिलती है लेकिन यह शुरुआत तो दिल्‍ली से ही करनी पडेगी ।
    दिल्‍लीवाले 'संज्ञाओं' से लाभान्वित होते हैं और 'सर्वनामों' को गरियाकर/लतियाकर मसीहा बनते हैं ।
    मुझ जैसे तमाम लोग, आप जैसों से बडी उम्‍मीदें लिए हुए हैं । सच मानिए, खुद से अधिक विश्‍वास आप जैसों पर है । मुझे नहीं पता कि मेरे इस लिखे का क्‍या अर्थ निकलेगा या निकाला जाएगा लेकिन सच मानिए, आप लोग यदि संज्ञाओं को चिह्नित कर दिल्‍ली से कहेंगे कि आप लोगों ने फलां-फलां संज्ञा की आंखों में अंगुली गडा दी है तो यकीन मानिए, आपके पीछे कारवां बन जाएगा ।
    यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो सारा देश भी संज्ञाओं से अपने स्‍वार्थ सिध्‍द करता रहेगा और सर्वनामों को शब्‍दों से लतियाकर अपनी जिम्‍मेदारी पूरी करने का पाखण्‍ड करता रहेगा और तब देश अधिक जर्जर होगा-जो आपकी आधारभूत चिन्‍ता है ।

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  2. @विष्‍णुजी,
    प्रतिक्रिया का शुक्रिया. लेकिन लगता है एक छोटे कन्‍फ़्यूज़न से- यही कि मैं मुंबईनिवासी हूं, दिल्‍ली व 'जनसत्‍ता' का सुधीश पचौरी नहीं- आपका रोश किन्‍हीं दूसरे रास्‍तों निकल गया है. दिल्‍लीवालों को तो धर-धर व भर-भरके लतियाने की ज़रूरत है ही. कहिये तो आज ही टिकट कटवा लें..

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  3. बिल्कुल सही कह रहे है आप। ये चिंताएं हमारी भी है।

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  4. जरूरत है रोष से निर्माण की तब उसे पाकिस्तान के विरूद्ध कर (सही होते हुए भी) बदमाशी की जा रही है.

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