Monday, December 8, 2008

ओह, सच आर्टिस्टिक इम्‍प्रेशंस..

आवारा दिन, दोपहर, शाम की कुछ ठहरे, छूटते इम्‍प्रेशंस. बेमतलब में पता नहीं क्‍या लयकारी, गहरायी खोजते; न खोज पाने पर फिर अटकते-भटकते; बाहर से भीतर फिर भीतर से बाहर दौड़ जाते, अंतरंग को बुलाते, बजाते- कभी कोई दोस्‍ती थी तो क्‍या था उसमें अनोखा ऐसा की पहचान पुकारते.. अरुण, म्‍हाडा, हाईवे, सजल कमल विमल, मुंबई उत्‍तर के अनुत्‍तरित स्‍पेस, दीवारें, पाखी विनीता नितिन वर्मा प्रकाश मीरा कुशवाहा, गोलू मयंक रोड राय और वैसे ही जाने और क्‍या-क्‍या अगड़म-बगड़म..







5 comments:

  1. सबकुछ अगड़म-बगड़म....पता नहीं,फिर भी अच्छा लगा....

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  2. there should have been a picture of some food.. that would have made the collage complete !
    i'm off to calcutta, lucknow and dilli for a while. vapas aa ke mulaqat

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  3. अगड़म-बगड़म, अहमक, उजबक, अजदक, ... हम बुड़बक...। उई!!!

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  4. वाह वाह...मित्र सलोने
    चित्र सलोने...
    प्यारी सी बक-बतियां...
    हंस के बोला करो , बुलाया करो...

    कभी इस दर पर भी तो आ सही कठोर !!!
    देख तेरे चाहने वाले कब से तरस रहे हैं...
    जै जै

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  5. नितिन तुम कमल हासन लगे।

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