Tuesday, December 9, 2008

जंगल से गुज़रते हुए: एक

धुंधले-कुहासे-सी रोशनी के निर्जन फैलाव में आठ-नौ लोग कदमों को थाहते, सन्‍नाटे और भय को काटते धीमे-धीमे आगे बढ़ रहे हैं. झीने हरे पत्‍तों के अंधेरों का अंत नहीं है. एकदम नज़दीक पहुंचने पर उनका रंग खुलता, और थोड़ा दूर हटते ही वे फिर एक अव्‍याख्‍यायित कुहरीलपने में ग़ुम हो जाते. एक तरह से कहें तो धुंध हमारे अंदरूनी अंधेरे की आड़ थी. उस आड़ के आसरे थोड़ी देर बाद कभी होगा जंगल ख़त्‍म हो जायेगा की भोली उम्‍मीद थी. दूसरों के मन में जाने क्‍या बातें चल रही थीं, मुझे धीमे-धीमे अलबत्‍ता पक्‍का यक़ीन हो चला था कि इस मनहूस विस्‍तार का अंत नहीं होगा. कभी होगा भी तो उसके पहले मैं ख़त्‍म हो चुका होऊंगा! मेरे कहने के तरीके से हो सकता है आप ड्रामेबाजी महसूस करके इरीटेट हों, लेकिन हमारी परिस्थिति की वास्‍तविकता में कहीं ज़्यादा नाटकीयता थी. मतलब पिघलते मोम की तरह सन्‍नाटे में डूबा एक अजाना जंगल जिसके ओर-छोर की थाह नहीं लग रही है, क्‍या मतलब है इसका? चुपचाप सिर नवाये नौ लोग चल रहे हैं (नौवां मैं).. आठ उतने ही अजाने जितना अजाना मेरे लिए यह जंतर-मंतर जंगल! सचमुच. न किसी का नाम मालूम न ठिकाना. भारी-भारी कपड़े ऐसे लाद रखे हैं मानो कश्‍मीर की तैयारी करके निकले हों! सच्‍ची में. मैंने खुद देह पर भारी ऊनी ओवरकोट डाल रखा है, और अब बात निकली है तो सोचकर ताज़्ज़ुब हो रहा है क्‍यों डाल रखा है? ऐसा कोई कोट, या कैसा भी कोट तो मेरे पास था भी नहीं? फिर इसे पहनकर मैं कैसे टहल रहा हूं? क्‍या हम सचमुच कश्‍मीर की जंगलों में भटक गये हैं?..

दरख़्तों के बीच एक सरसराहट हुई, फिर एक परिंदा हमारे माथों को छूता, एक बदहवास उज्‍जड चीख़ उगलता, गुज़रा. पतली काठी का ऐंठा हुआ एक बदसूरत जवान था तेज़ी से ऐसे पलटा जैसे फ़ि‍ल्‍मों में अचानक बंदूक से किसी का काम तमाम करने को क़ि‍रदार पलटते हैं. मैंने धमाके के खौफ़ में एकदम से आंखें मूंद लीं, कान पर हाथ रख लिये. लेकिन कोई धमाका सुन पड़ा नहीं. आंखें खोली तो वही दिखा जिसे इतनी देर से देखते-देखते अब आंखें थक रही थीं- कुहरीले अंधेरे में दरख़्तों के बीच रास्‍ता बनाते लोग चुपचाप आगे को चल रहे हैं! हद है. अचानक मेरे कान में आकर कोई फुसफुसाकर कहता ये सारी सूरतें हक़ीक़त नहीं, धुंये की लकीरे हैं तो यकीन मानिये मुझे ताज़्ज़ुब नहीं होता. हालांकि इतनी देर तक धुंधलके में चलते, और ऐसे लोगों की संगत में चलते हुए मेरे कान में आकर कोई यह भी फुसफुसाकर कह जाता कि मैं भी असल नहीं आत्‍मा हूं, शायद तब भी मुस्‍कराकर हामी में सिर हिलाकर मैं यही कहता कि सही कहते हो, दोस्‍त..

माने एक बात है हर स्थिति-परिस्थिति का एक सलीका होता है. एक डिज़ाईन होता है, देयर इज़ सम लॉजिक टू इट. यहां क्‍या है, कुछ नहीं है. हू आर दीज़ एट गाइस, कौन हैं, क्‍यों हैं- और सबसे मज़े की बात मैं इनके साथ क्‍या कर रहा हूं, क्‍यूं हूं? और जा कहां रहे हैं आई डोंट हैव अ फेंटेस्‍ट आईडिया! ख़बर की जा सकती थी, ख़बर करना इतनी बड़ी बात न होती, लेकिन अपने-अपने, व माहौल के सन्‍नाटे में हर कोई कुछ इस तरह का रहस्‍यभेदी तनाव ओढ़े है कि एक छोटी बात तक के लिए मुंह खोलने में दम फूलता, घबराहट होती. लगता जैसे कॉमन कंसेंसस के खिलाफ़ किसी तरह का क्रिमि‍नल एक्‍ट कर रहे हों! सच्‍ची में. आगे-आगे तीसरे नंबर पर चल रहे दोहरी देह के एक अधेड़ सज्‍जन थे, तेज़ कदम टहलता हुआ मैं उनके साथ हो लिये था. थोड़ी बेतक़्क़लुफ़ी रही होगी लेकिन ऐसा नहीं कि मेरे लहजे में बेलिहाज़ जैसी कोई बात आयी. मैंने मासूमियत से सवाल किया था- भाई साहब, हम जा कहां रहे हैं? बड़े मियां ने ऐसी जलती नज़रों मुझे घूरा मानो सरेबाज़ार मैंने उनकी बेटी का हाथ मांग लिया हो! ईमानदारी से कहता हूं उन नज़रों में कुछ ऐसी नफ़रत थी कि मैं घबराया अपनी जगह अटका खड़ा रह गया था. स्‍टंड! आई एम सॉरी कहने की भी मुझे हिम्‍मत नहीं हुई थी.

माने कोई रिफ़्लेक्‍ट करे तो ऐसी घटना का कोई तुक है? एक छोटे से सवाल से भाई साहब की तौहीनी हो गयी? याकि हमारे मुंह खोलने से? साथ चलते में आदमी आपस में बात न करे फिर साथ चले ही क्‍यों? या क्‍या तो नाम है उस विदेशी मुल्‍क का, उसके चलन हम उधार ले रहे हैं जहां पड़ोसी के लिए भी दरवाज़ा बुलेटप्रूफ जैकेट पहनकर खोला जाता है? इज़ंट इट फ़नी? ऑर टेरीबली स्‍केरी? क्‍या लोग अब सीधे-सीधे आपस में बात करने का तरीका भूल गये हैं? उसे सीखने के लिए भी बिज़नेस-सोशल स्‍कूल ज्‍वॉयन करने की ज़रूरत होगी? व्‍हाट अ फार्स! एंड दिस डैम साला जंगल- डैम ईट!

फ़ि‍ल्‍मों में, असल ज़िंदगी में ऐसा नहीं कि मैंने पहले जंगल नहीं देखे. देखे हैं, चार-छह मर्तबा तो देखे ही हैं. रेल की खिड़की पर बैठा जंगलों के बीच से गुज़रा हूं. कैमरा क्लिक करके फोटुएं उतारी हैं. लेकिन ऐसा जंगल पहले कभी नहीं देखा. न ऐसे पेड़. किसी भी पेड़ के बगल से गुज़रो, उसे नज़दीक से देखो, घूर-घूरकर देखो, लगता ही नहीं इन्‍हें पहले कभी देखा है. सपने में भी नहीं. हो सकता है आपमें से किसी ने देखा हो. मैंने नहीं देखा. ऐसे बहके-बहके व घबराहट जगाने वाले रंग मेरे सपनों में नहीं आते. रौशन ने भी कभी सपने में ऐसा जंगल देखा हो मुझे नहीं लगता. देखती तो मुझसे ज़रूर कहती. ऐसे रंगों के बारे में ही कहती. क्‍या बला है ये? कहां फंस गया हूं?

दूर किसी रेल के गुज़रने की सीटी सुनाई दी. मैंने एकदम से चमककर देखा. मगर बाकी लोग चुपचाप आगे की ओर सिर नवाये चले जा रहे हैं, मानो किसी ने कोई आवाज़ सुनी ही न हो! सच बताऊं तो मैं एकदम से भागकर जंगल से निकल जाना चाहने लगा. इस पूरे बेमतलब खुराफ़ात से बाहर. बैक टू माई वर्ल्‍ड. बैक टू माई रौशन. लेकिन निकासी के रास्‍ते किधर थे. पलटकर एक नज़र पीछे की ओर देखा, जहां से होते हुए अभी थोड़ी देर पहले हम इधर आये थे, तो पीछे अंधेरे धुंध की चादर दिख रही थी, बस.. उससे परे? क्‍या होता उसके परे? और घुप्‍प अंधेरा?..

(अंगड़ाई है.. just a teaser for myself)

3 comments:

  1. इस कहानी के बाद आपको लिखना ना पड जाये कि "डराइये नही टिपीयाइये "।

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  2. साथ चलते में आदमी आपस में बात न करे फिर साथ चले ही क्‍यों?
    ***
    So obvious...
    so true!

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    1. अच्‍छे और ढीक?
      http://azdak.blogspot.in/2008/02/blog-post_13.html

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