Wednesday, December 10, 2008

रात की बेमतलब बातें..

बातें इतनी बेमतलब होंगी कि बेमतलब बकने की अपनी पुरानी आदत तक से चिढ़ होने लगे पहले सोचा नहीं था. अब चूंकि चिढ़ हो रही थी तो बेमतलब पर पेंसिल चलाते हुए झींक रहा था. शिकायत की- इतना बेमतलब ठेल रहा हूं, आप मतलब के रास्‍ते पर नहीं ला सकती थीं? उनने बेमतलब की हवा कुछ और गुज़रने दी, खखारकर गला साफ़ किया, फिर इतमीनान से बोलीं- नहीं, ऐसा तो कतई नहीं है..

- ऐसा तो क्‍या कतई नहीं है? अभी तक बाल भी ठीक से संवारे नहीं, रात का तेल चुपड़ा दिख रहा है, और होंठों पर जाने वह क्‍या सफ़ेद निशान है, उठकर मुंह धोने की भी फ़ुरसत नहीं मिली? और माथे के दाहिने वह फुंसी क्‍या है जिसपर उंगली रखते ही पानी निकल जाये? इसी खूबसूरती के नज़ारे के लिए यहां आना था तो कहीं और जाकर सलीमा नहीं देख आता? सब ऐसा-वैसा ही है, बेमतलब कहती रहती हैं कि नहीं, ऐसा नहीं है!..

उनने पलटकर हमारी शिकायत पर शिकायत नहीं की. चुप हो गयीं मानो जूही के फूल को लौकी के डलिये में रखने का ख़ामोश विरोध कर रही हों. मैंने कहा- अब क्‍या हुआ? बिना हमारे बेमतलब को खिंचवाये चैन नहीं पड़ता?

- सब बेमतलब ही है, क्‍या किया जाये- उनने सर्द आहभरी आवाज़ में लगभग फुसफुसाते हुए कहा.

- कंचन से कामा हॉस्पिटल वाले वाक़ये के बारे में बात कर रही थी. वह पूरा किस्‍सा बेमतलब नहीं तो और क्‍या लगता है. ऐसी खौफ़ जगानेवाली, मातम बरसानेवाली रात में उन दो टेररिस्‍टों के वहां, हॉस्पिटल, दस बजे पहुंचने की ख़बर होती है, और सलस्‍कर, काम्‍टे और करकरे को मारकर उनकी क्‍वालिस में उनके भागने पर वक़्त क्‍या हुआ है? 10.59 मिनट हो रहे हैं. पूरा एक घंटा! ऐसी मुश्किल तोड़फोड़ की रात दो प्रोफ़ेशनल टेररिस्‍ट एक अस्‍पताल जैसी जगह में पूरा एक समूचा घंटा निकाल दें, बात पल्‍ले नहीं पड़ती. तोड़फोड़ मचाने और ख़ून बहाने को उनके लिए और दूसरी जगहें थीं, वह उनके पीछे भागते, किसी अस्‍पताल में एक समूचा घंटा इस तरह टाईमपास करते हुए खराब नहीं कर रहे होते, आपको नहीं लगता?.. फिर पुलिस के तीन ऐसे ऊंचे अधिकारी, एक साथ, अस्‍पताल पहुंचे किसलिए थे, और ऐसे पहुंचे थे कि उन्‍हें अपने डिफेंस में बंदूक निकालने की फ़ुरसत तक न मिली? मैं नहीं जानती उस रात दस से ग्‍यारह के दरमियान ठीक-ठीक हुआ क्‍या मगर जो कहानी मुझसे मानने को कहा जा रहा है वह मुझे बेमतलब ही लगती है.

- हमें क्‍या लेना-देना कामा-धामा से?- मैंने जम्‍हाई लेकर कहा, जिनको जाना था, गये, जिनकी किस्‍मत थी, वे अभी भी मुंह बाये दायें-बायें टहल रहे हैं. ख़ैर, कंचन आपकी थियरी पर हंसी नहीं?

- नहीं. कंचन की अपनी थियरी है, और ज़्यादा ड्रमैटिक है. कह रही थी उसके पास जो ख़बरें हैं उनके मुताबिक तो सलस्‍कर, काम्‍टे, करकरे कभी कामा गये ही नहीं. तीन इतने बड़े अधिकारियों का एक गाड़ी में इस तरह इकट्ठे पाया जाना अपने में लॉजिकल ही नहीं..

- ऐसा? फिर लॉजिकल क्‍या है? आपके यहां चाय-वाय कुछ मिलेगी या नहीं?

- लॉजिकल यह है कि पुलिस मुख्‍यालय में सीएसटी वाले अटैक के बाद बड़े आधिकारिक स्‍तर की एमर्जेंसी मीटिंग बुलायी गयी थी, सलस्‍कर, काम्‍टे, करकरे उसी मीटिंग के सिलसिले में पुलिस मुख्‍यालय पहुंचे थे.. तभी किसी वक़्त अचानक वहां टेररिस्‍ट पहुंचे; पुलिस के तीनों बड़े अधिकारियों की हत्‍या ठीक पुलिस मुख्‍यालय के अंदर हुई.. इनसाइड द पुलिस हेडक्‍वाटर्स इटसेल्‍फ़. इस सच्‍चायी को एक्‍सेप्‍ट करना पुलिस मोराल को ह्यूजली डैंपेन करेगा इसलिए यह कड़वी सच्‍चायी किसी भी सूरत में सामने लायी नहीं गयी. न कभी लायी जायेगी..

- वेरी फ़नी.. एंड वेरी बेमतलब. रियली. कौन इस तरह की ख़बरें सर्कुलेट करता है? और इस घर में कभी चाय मिलती है?.. हमारी खातिर कोई खूबसूरत? दिखने की कोशिश करता है?

5 comments:

  1. aapka anubhaw apne aap mai ek kahaani smete hue hai

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  2. कमाल का सोचा और लिखा है.


    बिना धूँए के भी तस्वीर बूरी नहीं.

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  3. @संजय प्‍यारे,
    कीबोर्ड पर लिखा है, सोचते तो और ही लोग रहे, हमने बस सुनने का काम किया. हां, सुनकर अलबत्‍ता सन्‍न ज़रूर होते रहे हैं.

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  4. kisi cheez kaa kuchh matlab bhi hai...tasweer ka koi zikr nahin...

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  5. वेरी फ़नी.. एंड वेरी बेमतलब. रियली. कौन इस तरह की ख़बरें सर्कुलेट करता है?

    --मगर फिर भी सन्न तो हो ही गया.

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