Thursday, December 11, 2008

जानता हूं?..

आसमान का निर्मल टुकड़ा होगा, बच्‍चे की धुली कमीज़-सी चमकती धूप में बादलों के फाहे होंगे डगर-मगर बहलते, भलमनसी में बिना तीन-तेरह के टहलते. अरमानों की तूफ़ानों की ओह, कैसी तो लरजती एक समूची दुनिया होगी, थरथराता उमगता मन हवा में एकदम ऊपर जाता लहराता होगा, खिलखिल कोई झिलमिल बुलाता होगा, अजाना आह्लादकारी गाना कोई रह-रहकर कान की लौ छूकर जाता होगा, वापस लौटकर उंगलियों में बिजलियों की तरह बजाता सनसनाता होगा. निरर्थकता के बाज़ार के बेमतलब कारोबार के इने-गिने चिल्‍लर सहेजता मानो भांग की पिनक चढ़ी हो जैसे मैं बेहया हंसने लगता होऊंगा, दुधिया रात में पुलिया पर लहराकर गुज़रती किसी रेल की तरह चमकने बहकने लगता होऊंगा.. थोड़ी देर का तिलिस्‍म होगा. एकदम थोड़ी ही देर का. क्‍योंकि फिर जल्‍दी ही कंधे की तक़लीफ़ अपना बेसुरा सुनाती होगी, बिसुरती पैर की उंगलियां फ़र्श ठकठकाती. दिल हदसकर ज़र्द दीवारों की बार-बार सुनता होगा क्‍या दुनिया कैसी दुनिया.. मैं खुद से चार हाथ की दूरी बनाकर पुछूंगा तुम्‍हें कितना जानता हूं?..

7 comments:

  1. बहुत मुश्किल होगा फिर भी पहचान पाना.

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  2. हर यथार्थ जादुई नहीं होता ना!

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  3. यथार्थ अधिकतर ऎसा ही होता है, भाई जी !

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  4. यथार्थ अधिकतर ऎसा ही होता है, भाई जी !

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  5. sundar shabdon,aur bhaavon ke liye..shukriyaa

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  6. मन को छूने वाले भाव लेकिन यथार्थ के धरातल पर खड़े......

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