Friday, December 12, 2008

कांटा अड़ा है..

एक अदद तस्‍वीर कितनी कहानियों का कैसा बड़ा रहस्‍यलोक हो सकती है? या एक चेहरा? या हमसे ज़रा-सा पीछे को छूटा समय? हमें वह समय समझ आता है? वह क्‍यों, यही अपना समय कितना आता है- समझ? क्‍यों नहीं आ पाता? बस किताबों की लड़ि‍याहटें, स्‍केच-ग्राफ़ि‍क्‍स की खुमारियां याद रहती हैं? मैं, बहका-बहका-सा आगे निकल गया.. खुद स्‍वयं को कितना याद रहता हूं?

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