Wednesday, December 17, 2008

समीर अमीन ज़ि‍न्‍दाबाद!

कभी-कभी अपनी वक्‍तृत्‍व-प्रतिभा, व साथ ही लोगों की समझ-सुरभि के ऐसे नज़ारे देखने को मिलते हैं कि जलकर रह जाता हूं. जलकर रह जाने के अनंतर अदबदाकर फिर यह भी सोचने पर मजबूर होने लगता हूं कि बेहतर हो हिंदी की बजाय फ़्रेंच में ही ब्‍लॉगिंग की जाये. मतलब हमारे लिखे पर ‘कुछ समझे, कुछ कहां समझे’ की घबरायी प्रतिक्रिया आयेगी तो कम से कम समझने को यह संतोष तो रहेगा कि फ्रेंच की कलकत्‍ता और कानपुर में इतनी ही समझ है! एक फ़ोन घंटियाने के बावज़ूद शीकुमार ‘ग़लती हो गयी, मफ़ि‍याया जाये, महाराज?’ वाला गाना नहीं गा रहे होंगे, और शुकुल ‘ई ठकुरवा फिर टंटा खड़ा कर रहा है क्‍या, गुरु?’ के असमंजस से पार नहीं पा रहे होंगे?

शायद स्‍माइलाश्रित हिंदी ब्‍लागसमाज बेस्‍माइली पंक्ति के आगे जाकर वैसे ही खड़ा हो जाता है जैसे हाईस्‍कूल के इम्‍तहान में हम अंकगणित का पर्चा हाथ में आने के पश्‍चात खड़े रह जाते थे. और फिर वैसे ही खड़े रहते थे, भली-भांति जानते हुए कि इम्‍तहान के नतीजों में हमारा कहीं भी खड़े होना संभव न होगा. मज़ाक दरकिनार, दरअसल सब कसूर सुकुल शीकुमार का नहीं, कुछ हमारे पक्‍के में पंकमिश्रण का भी दोष है. होगा ही. स्‍ट्रक्‍चरल डेफिसियेंसी वाला मामला है. कुछ लोग होते हैं सात सौ की नौकरी से शुरू करते हुए सत्‍तर हज़ार वाले मंथली पैकेज तक हंसते-हंसते पहुंच जाते हैं. माने ग्राफ़ वैसा ही बनता है जैसा ग्राफ़वाली पुस्तिकाओं में हमसे ग्राफ़ बनने-बनाने की उम्‍मीद की जाती है. मेरे साथ दिक़्क़त है सात सौ से शुरू करके बीच ग्राफ़ में गुलगुला तलने लगता हूं. बिनस्‍माइली जग सूना की अभ्‍यस्‍त आंखें अदबदाकर जलने लगती हैं. कहने का मतलब बेवज़ह शीकुमार की एसटीडी का बिल बढ़ता है, हमारे दिल का बढ़ता है सो अलग.

सचमुच सोचनेवाली बात है भाषा में गुलगुले क्‍यों तले जायें? मेरे चिंतन में यह पूंजीवादी पतनोन्‍मुखता के लक्षण हैं? ज़रूरत से ज़्यादा फ़्रेंच फ़ि‍ल्‍में देख रखी हैं मैंने? और हिंदी फ़ि‍ल्‍मों की भंड़ैती से ठीक-ठीक सबक ले नहीं सका? या ये हमारी फटही चिंतन के टुटही वितान हैं, कि बाबू बुद्धदेव की तरह टाटा से अलग वैकल्पिक विकास का कोई रास्‍ता हमारे दिमाग़ में बनने-बुनने नहीं देता? दक्खिनपंथियों की तो रहने ही दें, वामभाई भी घबराये यही उच्‍चारते हैं कि नियो-लिबरल इकॉनमी ही इतिहास का अंत नहीं? मिस्र के अर्थशास्‍त्री समीर अमीन की तरह कोई ताल ठोंककर दोटूक बात कहां करता है, सामान्‍यजन के आगे बेमतलब की ठेलता है, असल काम की बात कॉरपोरेट कमरों के भीतर ही करता है, और पार्टीकमान के अख़बारों में जो करता है वह हमारी हिंदी की तरह गुलगुले की मिठायी होती हैं.

दुनिया की माली हालत के कॉंटेक्‍स्‍ट में भारतीय आर्थिक परिदृश्‍य की थोड़ी सुसंगत समझ में आपकी दिलचस्‍पी बनती हो तो ‘फ्रंटलाईन’ के ताज़ा अंक में समीर अमीन का यह दिलचस्‍प इंटरव्‍यू पढ़ डालिये. उन्‍हें ज़्यादा पढ़ने की इच्‍छा हो तो देखिये, भारतीय बाज़ार में उनकी किताबों की उपलब्‍धता का एक लिंक यह रहा.

3 comments:

  1. बेलदारों, ठेला घसीटने वालों और मजदूरों के बीच रह कर भाषा ऐसी हो गई है कि आप की भाषा अक्सर दुरूह लगती है और सर पर से गुजर जाती है। लेकिन कभी कभी जब आज जैसी बात लिखते हैं तो समझ आ जाती है। समीर अमीन की सूचना के लिए आभारी हूँ। टिपिया कर जा रहा हूँ समीर अमीन को पढ़ने। एक बात और कह दूँ कि जिन्हें आप वामपंथी कह रहे हैं वे कब के दक्षिणगामी हो चुके हैं।

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  2. "सामान्‍यजन के आगे बेमतलब की ठेलता है, असल काम की बात कॉरपोरेट कमरों के भीतर ही करता है.."

    सही बात है. कॉर्पोरेट कमरे काम करवा लेते हैं. ऐसे-वैसे, जैसे-तैसे काम. बिना औकात वाला आदमी करता रहता है. न करने की उसकी औकात कहाँ? शायद कॉर्पोरेट कमरे में जाहिर न करने वाला रोष बेमतलब की ठेलकर निकालने की कोशिश करता है. ये अलग बात है कि वहां भी गिरा ही रहता है.

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  3. समीर अमीन जी के लिन्क के लिये शुक्रिया --

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