Thursday, December 18, 2008

देहात भेद..



स्‍केच को बड़ाकार देखने के लिए क्लिकयाकर नयी खिड़की में खोलें. टेक्‍स्‍ट पढ़ने में असुविधा हो (स्‍कैनर न होने का अब ससुर यह दु:ख भी होगा, दूसरे जो हैं सो तो हैं ही) तो साथ अलग से नत्‍थी कर दे रहा हूं..

आयेगी दुनिया समझ में? गांव की दुनिया? यूं ही टहलते हुए महाराष्‍ट्र में (ठीक है, महाराष्‍ट्र नहीं, बंबई से सौएक किलोमीटर दूर) किसानी साफ़-सुथरी सुखी दुनिया लगती है. लोग बिना कड़वाहट के सीधे-सीधे बात करते हैं.. जबकि हिन्‍दी प्रदेशों की, यूपी-बिहार की याद करें तो सिर्फ़ गंदगी और कड़वाहट याद आती है!!.. एक ही दुनिया है फिर इतना फर्क़ क्‍यों? महाराष्‍ट्र में लोग 'अच्‍छा' जीवन समझते हैं, बिहार-यूपी में नहीं?.. या जैसाकि एक मित्र की टिप्‍पणी थी, महाराष्‍ट्र में लोगों का मेंटल-स्‍पेस साफ़-सुथरा है, बिहार-यूपी में नहीं?


आपके दिमाग़ में कभी यह सवाल घूमा है?

7 comments:

  1. खूब सोचा है और देखा भी है। बेटी को नौकरी के लिए दो जगह पूना और दिल्ली का ऑफर था। पत्नी दिल्ली के स्थान पर पूना के लिए के लिए जिद पर अड़ी थी सिर्फ आप के बताए फर्क के कारण।

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  2. अभी पिछले दिनों ही तो एजेंसी की खबर पढ़ी थी कि आत्‍महत्‍या में अभी भी महाराष्‍ट्र के किसान ही अव्‍वल हैं..इस जानलेवा साफ सफाई से तो गंदगी ही भली, हम तो इस गंदगी को सेफ्टी वाल्‍व समझते हैं।

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  3. @अशोकजी,
    कुछ और दोस्‍तों से भी इस विषय पर बात-बहस होती रही. सबकी अपनी-अपनी थियरी, और काफी पेचीदा थियेरियां थीं. सोचते हुए लग रहा था पूरी चार सौ पेजी किताब का विषय है, हमने तो महज एक छोटा स्‍केच ही चिपकाया है. आप जो कह रहे हैं वह भी एक बड़े कोण का एक छोटा कोना है, और जो उसे जी रहे हैं उनके लिए उसकी अपनी वाजिब सार्थकता होगी ही. फिर एक दूसरी बड़ी सीधी बात है हिन्‍दी प्रदेशों के पिछड़े हिस्‍सों में जहां गोड़ धरने भर को, देह धोने और ज़रा फैलकर सोने भर को ढंग की जगह मयस्‍सर न हो, वहां दिमाग़ीस्‍पेस के साफ़-सुथरा होने का तर्क भोथरा और बेमतलब ही होगा.

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  4. बहुत बढ़िया पोस्ट । आपका रेखांकन उम्दा है। स्वच्छता की बात बहुत महत्वपूर्ण है। ये संस्कार से जुड़ी है। कुछ बातें जो याद रख ली जाती हैं, कुछ जिन्हें भुला दिया जाता है। घर से अच्छी तरह सज-धज कर निकला कार्मिक रोज़ दफ्तर में लापरवाही से काम करता है। अव्यवस्थित रहता है।
    जयपुर में मेहतरों की एक बस्ती है। जितने रंग-बिरंगे, साफ-सुथरे मकान मैने वहां देखे वैसा सुधरापन बड़ी कालोनियों में नहीं दिखा। पूछने पर वहां के बाशिंदे का जवाब था कि दूसरों का मैला साफ रखने वाले अपनी बस्ती साफ क्यो नही रखेंगे। प्रसंगवश ये बात याद आई। स्वच्छता के स्पेस से सीधा सीधा रिश्ता समझ मे नहीं आता। संकरेपन में सफाई आड़े आती है पर प्रयास से रखी जा सकती है। अलबत्ता सोच की संकीर्णता में किसी भी किस्म की स्वच्छता की उम्मीद बेमानी है। वहां तो कूड़ा जमेगा ही।
    एक बार फिर कहूंगा, ये पोस्ट बहुत अच्छी लगी। साफ-सुथरी ।

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  5. रात के ढाई बजे हैं और आपकी इस पोट ने विचित्र सी अकुलाहट पैदा कर दी है । जो कहना चाहता हूं उसे कहने का रास्‍ता नहीं मिल रहा और जो शब्‍द मानस मे आ रहे हैं वे समुचित और पर्याप्‍त अनुभव नहीं हो रहे । सच मानिए, इस अकुलाहट ने नींद उडा दी है ।
    आपकी पोस्‍ट याद रख ली है । बात अपने में जब साफ होगी तब ही कहूंगा ।

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  6. प्रमोदजी
    क्या उत्तर प्रदेश और बिहार के किसान साफ सुथरे नहीं रहते ?
    क्या अपनी बात सीधे तौर पर नहीं रख पाते ?
    कहीं आप यह तो नहीं कह रहें हैं की सच्चाई, ईमानदारी , साफ सफाई आदि चीजों का संस्कार बिहार और यू पी के किसानों और ग्रामीण संमाज में नहीं बचा है ?
    आप यह दावा तो कर सकते हैं की मुझे बिहार और यू पी के किसान गंदे दीखते है . महाराष्ट्र और ख़ास कर मुंबई से १०० किलो मीटर की दूरी पर ही साफ सुथरे , भोले भले किसान और गाँव दिखने लगते हैं . पर आप यह दावा नहीं कर सकते की वास्तविकता में ऐसा ही है. किसी को कुछ दिख जाना मात्र ,हकीकत का अकाट्य प्रमाण नहीं माना जा सकता है.
    आप की स्मृति दोष के कारण ऐसा आपको ऐसा लग सकता है. पता नहीं आपके जेहन में बिहार के किस ग्रामीण अंचल की कैसी स्मृति समाई हुई है. महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में साफ़ सफाई और किसानों में भोलापन और सहजता किसी को दिख सकती है पर यह कहना की ये सारी चीजें बिहार में नहीं हैं यह दृष्टि और स्मृति दोष न भी रहे तो अतिशयोक्ति तो जरूर हिन् है.
    कहीं ऐसा तो नहीं की बिहार और उत्तर प्रदेश के किसानों की और गांव की सिर्फ़ ग़लत तस्वीर ही आपकी स्मृति में शेष रह गई है.महाराष्ट्र में ढेर सारी बातें अनुकर्णीय और प्रशंसनीय हो सकती है पर बिना वजह बिहार और यूं पी के किसानों और गाँवों की ग़लत तस्वीर क्यों पेश करना.
    हमारे किसानों में भी इंसानियत , सहजता और साफ़ सफाई के संस्कार बरकरार है. कहीं आप बिहार के लम्पट सामन्ती तत्वों को बिहार के किसानों और ग्रामीण जनता का पर्याय तो नहीं मानते ?
    सादर

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  7. @मित्र कौशल किशोर,
    पहले यहां इतना कह दूं कि स्‍वयं बिहारी हूं, और यूपी में वर्षों रहा हूं. आंतरिक प्रेम की उमेठ है जो परिस्थिति, समय और स्‍पेस को अलग-अलग तरीकों से देखने पर मजबूर करती है. और जैसाकि मैंने अशोक पाण्‍डेय को भी पहले कहा ही कि किसी द्वेष या पूर्वाग्रही भावना से पंक्ति नहीं लिखी, न ही संस्‍कार को ऐसी सफ़ाइयों के मूल में मानता हूं; संस्‍कार भी समय-समाज में खास तरह की शक्‍ल पहनते-छोड़ते रहते हैं, एक पीटी-पिटाई लीक का स्‍केची उद्वेलन था, बस, मसले की अदरवाइस जो गहरायी है, वह बड़े, विशद विचार की मांग करता है. कभी सपरकर उसपर भी सोचना होगा, फ़ि‍लहाल ऐसी उम्‍मीद करता हूं.
    आपके रोषपरक प्रतिक्रिया का बहुत-बहुत धन्‍यवाद.

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