Friday, December 19, 2008

हाय-हाय की हाय-हाय..



अच्‍छा मज़ा है. स्‍केच का शार्पनेस उड़ गया है. कैमरे से क्लिकियाये मेरी आंखों की कमज़ोरी का कमाल होगा, मगर दिख ऐसे रहा है मानो लक़ीरें धुंधली सियाही से उकेरी गयी हों. आपके उत्‍साह का धुंधलका छंटा हुआ हो, और मेरी कला के रंग में- ओह, कितना तो रंगा हुआ हो- संभवत: तभी आप, अलग विंडों में भी, स्‍केच के धुंधलके से ऊपर उठ सकेंगे..
शुक्रिया.

4 comments:

  1. अनकही कह दी आपने
    मेरे मन की कह दी आपने
    'मेरे' मे अकेला नहीं मैं
    सारे जमाने की कह दी आपने

    ReplyDelete
  2. हिन्दी में बोलें तो गधा बन कर रहे।

    ReplyDelete