Saturday, December 20, 2008

किसानों को जो रास्‍ता मिलेगा.. बच्‍चों को.. हमारे भविष्‍य को?..

मंदी पर सब सर्तक निगाह रखें की समझाइश देकर चंदू नोट कमाने निकल गये. मैं चूंकि कहीं कमाने नहीं जा रहा, मंदी के साथ बकिया गंदी चीज़ों में उलझा पड़ा हूं. लोग घबराकर ऐसे क्षणों में मानस पढ़ने लगते होंगे, मैं ‘भूख नक़्शे से हट गया है’ जैसा सरस साहित्‍य पढ़कर खिंचा-खिंचा हो रहा हूं. बहुत सारे सवाल हैं, फ़ि‍लहाल अंग्रेजी में छपे दीख रहे हैं- A quarter of India’s population lives below what has been termed a ‘starvation line’. Why are chronic hunger and under-nutrition still so widespread? Why have foodgrain and calorie consumption actually fallen in the last 15 years of structural adjustment? अंतुले को घेरकर चप्‍पल मारो का हमारा अकुलाया पता नहीं किस तरह का अंधा राष्‍ट्रप्रेम सर्वत्र दीखता है, लोगों को खाना और बेहतर भविष्‍य कैसे मिलेगा के सवाल हमारे ज़ेहन में तो कैसे आयेंगे, अखबारों के मुखपृष्‍ठ पर भी कभी नहीं मिलते.

जवाब छोड़ि‍ये, ऐसे सवालों का ठीक-ठीक परिदृश्‍य समझने तक के लिए छापामार खोजायी करनी पड़ती है. जिन्‍हें कुछ नहीं खोजना, और जो यथास्थितिवाद की तुरही जेब में लिये और मुंह में ‘ओहो, कैसा देश हमारा न्‍यारा!’ बजाते- किसी भी अप्रीतिकर सवाल से बचते- ‘ठोंको पाकिस्‍तान को. पीटो पाकिस्‍तान को!’ की तरफ़ हमें ठेलते रहेंगे, कोई इन्‍हें टोककर नहीं पूछेगा कि पाकिस्‍तान को ठोंकने और पीटने से पहले बंसी बजाते हुए हम सुखी-सुखी ही थे? और थे ही तो वे कौन लोग थे. जो नहीं थे वे कौन थे? उसका किस तरह का सोशल डेटा है हमारे पास. बच्‍चों की कितनी बड़ी आबादी थी जो पेट भर खाने के अभाव में रोज़ मर रही थी? या ऐसे घर जहां हफ़्ते में एक मर्तबा चूल्‍हा जल रहा था? मैं नहीं, राहुल वर्मन कानपुर आईआईटी के अध्‍यापक हैं, वह कह रहे हैं: Earlier this year we saw two news items together on the front page – Indian Prime Minister Dr Manmohan Singh once more extolling the virtues of the 9% growth rate, and the chairman of the National Commission for Enterprises in the Unorganised Sector reporting that four out of five Indians live on less than Rs 20 a day.

चूल्‍हे में डालिये राहुल वर्मन को, गांधी नहीं वर्मन है, शर्तिया देशद्रोही होगा, अगड़म-सगड़म ऑब्‍ज़र्वेशन कर रहा है. मगर एक ऑब्‍ज़र्वेशन वर्ल्‍ड बैंक ने किया था, 1995 में, ज़रा नमूना देखिये. इस अध्‍ययन के मुताबिक 2010 तक गांवों से शहरों की ओर जो आबादी विस्‍थापित होकर पहुंचेगी वह इंगलैण्‍ड, फ्रांस और जर्मनी की मिली-जुली आबादी का दुगना यानी 40 करोड़ के आसपास होगी. किसानी को दुरुस्‍त करने की सरकार बहुत सोचती दीख रही है, लेकिन किसानों की भलायी उस सोच का हिस्‍सा नहीं है.

दिल्‍ली के देविंदर शर्मा ने समूची परिस्थिति का बड़ा वाजिब अध्‍ययन किया है. यह पंक्तियां देखिये: “Numerous national policies are being recast at a frantic pace and are facilitating this distress. The underlying object is clear in policies related to seed, water, biodiversity, adivasis, the environment, biotechnology, trade, food safety and agriculture, amongst others- make way for the big agro-industries. With the support of a political system cutting across party colors, Indian industry and business are upbeat about the potential of agriculture. A slew of FICCI-sponsered ‘reforms’ for raising farm incomes plans to pump large amounts of public money into an industry-driven agriculture, while the farmer survies in the margins. The ‘reforms’ clearly are not aimed at resurrecting agriculture but at bringing profits for the owners of the industries.” पूरा लेख यहां पढ़ि‍ये.

मुंबई पर हुए हमले के दौरान सुरक्षा के लिहाज़ से दिखा कांग्रेस-चालित यह सरकार (उसकी जगह कोई ग़ैरकांग्रेस-चालित होती तो ऐसा नहीं कि नतीजा कुछ अलग होता) अपनी सुरक्षा किस जतन से करती है. मतलब वीआईपी सुरक्षा के आंकड़े देखकर आप बेदम होते रहें, और उसके बाद जो वीआईपी नहीं हैं उनकी ईश्‍वर जाने कैसे रक्षा होगी की सोचना शुरू करें तो फिर नये सिरे से बेदम होवें! सोचनेवाली बात है यह सरकार (और इसके आगे-पीछे जो दूसरी आयेगी वह इससे अलग नहीं होगी) किसकी रक्षा और हित में काम करती है. और नाकारा है ऐसा कहकर मज़ाक उड़ाते हुए उसे बरी करना हमारा भोलापन व बेवक़ूफी होगी, क्‍योंकि जिनकी झोली में फ़ायदे गिरा रही हैं हम देखते रहे हैं कितनी समझदारी और स्‍मार्टनेस से गिराती है.

(ऊपर स्‍केच को बड़ाकार देखने के लिए क्लिकयाकर अलग खिड़की में खोलें)

3 comments:

  1. बधाई स्वीकारें। इस विषय पर लिखने के लिए। आप लगातार लिखेंगे तो और लोग भी लिखेंगे। कारवाँ बढ़ना चाहिए।

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  2. पेट की भूख पर किसी अखबार में चर्चा क्या होगी? यह तो कोई समाचार नहीं हुआ। यह तो रोज़मर्रा की बात है। सनसनी हो तो समाचार बनती है- खुन, डकैती, बलात्कार.....यही तो सुर्खिया बनेंगी अखवार की!

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  3. किसान भले चंगे हो जाएंगे तो राजा और प्रजा में
    फर्क ही क्‍या रह जाएगा...कहां हीरा मोती लाल, कहां फटेहाल कंगाल... सीधी सच्‍ची बात लिखने के लिए गुरुदेव को धन्‍यवाद।

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