Thursday, December 25, 2008

अपना-सा एक दोस्‍त, अपनी-सी थोड़ी खुली जगह..

अचक्‍के बहुत वर्षों बाद एक दोस्‍त से मुलाक़ात हुई..



वही जानी-पहचानी सुव्‍यवस्थित अव्‍यवस्‍था.. ज़रा-सी जगह, थोड़े-से हरे की हसरत..







मैंने घबराकर कहा इतने साल गुज़र गये तुमने कभी फ़ोन नहीं किया? कभी यही पूछने के लिए कर लिया होता कि मैंने बालों में सफ़ेदी डालना बंद किया या नहीं.. या ग़लत पते पर ग़लत चि‍ट्ठि‍यां डालना? दोस्‍त मेरे सवालों का जवाब देने की जगह विदेशी दारु की बोतल खोजने लगा.. फिर निरखने के लिए नीचे फ़र्श पर गिरी मेरी आत्‍मा देखने लगा..





ग़नीमत है नीचे आत्‍मा नहीं मेरे पैर और आत्‍मा में उतरनेवाले मसाले का एक छोटा-सा एंगल भर था..



मैंने दोस्‍त का ध्‍यान मसाले से हटाकर फ़र्श पर एक कंपोज़ि‍शन मतलब अपनी कला की ओर किया..



फिर ठोढ़ी पर हाथ डाले चाय पीते हुए हम उन्‍नीसवीं सदी के बुद्धिजीवियों वाली सैर पर निकल गये.. मैंने दोस्‍त से सवाल किया सामने का संसार दिखता है? इस पर दोस्‍त सामने की बजाय ज़रा एंगल से देखने लगा..





फिर चाय छोड़कर दोस्‍त खड़ा हो गया, उलटकर मुझसे सवाल किया- क्‍या चाहते हो फिर दस साल हम न मिलें?



क्‍या करता है व्‍यक्ति ऐसे मौकों का? मेरी तरह के लोग कुछ अल्‍ल-बल्‍ल बकते हैं, वर्ना क्‍या है मन निरुत्‍तर हो जाता है..

4 comments:

  1. पता नहीं क्यूँ ..पर एहसास सुखद रहे..

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  2. achchhaa hai, puraane dosto se milkar fir se puraane pal sahaj ho jaate hai.

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  3. इत्तेफ़ाक की बात है, कल रात को दो बजे फ़ोन बजा और अपने एक पुराने मित्र से पाँच साल के बाद दो घंटे बात होती रहीं ।

    आपके मित्र से आपकी मुलाकात को इस प्रकार कैमरे की नजर से देखना सुखद रहा ।

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  4. ओह ! दस दस साल बाद भी ? ऐसी बरकरारी ?
    शब्द चित्र पर फिर भी भारी .. लाईक पीपींग इंटू द अदर वर्ल्ड !

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