Friday, December 26, 2008

प्रिय साथ रहना, मोरमन..

साथ रहता है मन, रहते-रहते फिर छिटककर कहां तो निकल जाता है, पकड़ नहीं आता, मैं सोचता हूं मन को जानता तो था?- मगर जैसाकि जुसेप्‍पे कहता, जानना ज़रूरी नहीं समूचेपन में पहचानना हो, जैसे लोगों के पीछे बहलते हुए, सामूहिक दायरों में टहलते हुए अचानक कैसा तो निबिड़ भारी, दुर्दांत अकेलापन नहीं घेर लेता?- पहचाने चेहरे, जानी दुनिया कैसे सियाह धुंआये गलियारे बन जाते हैं, अजानी ज़बानों की फुसफुसाहटों की अभेद्य दीवारें बन जाती हैं, एक दरकन- कांपती-सी सिहरन में मन थाहता अकुलाता है पैरों के नीचे कैसी ज़मीन है, कितनी है, हवा में घूमती आवाज़ें एक आततायी वक़्त की दुश्‍वारियों, घबराहटों का इश्‍तेहार भर हैं- कि उंगलियों के पोर पर बसे मन के हिलोर, नेह का दुलार, कान की लब पर किसी नशीले डंक की तरह उन्‍मत्‍त कर देनेवाला प्‍यार भी हैं? धीमे-धीमे बनते-बुनते एक संश्लिष्‍ट सांगितिक का संसार? भी हैं?- जिसमें कहां तो निकल गया आवारा, अघोर मन वापस लौटता है, वैसे ही जैसे भगोड़ा योगी ममता की मार में, एक बछिया के प्‍यार में वापस लौटा हो उन्‍हीं बिछिलाहटों भरी अपनी चिर-परिचित गन्‍दायी दुनिया में? गंवईन की बीमारी और पुरइन के व्‍यभिचारी अंधलोक में? बखूबी जानते हुए कि नहीं जल जायेगी पहाड़ पर दिप्‍प् से बत्‍ती, नहीं पसर जायेगा पगडंडियों पर दूर तक अंजोर, मगर मन तकता रहेगा सधे-साधे अंधेरा? एक बेसुरे बाजे को रहेगा बांधे? कि अघोर मन इन्‍हीं अंधेरों में आंकेगा मोर-मन?..

3 comments:

  1. मन भटके कहीं, लौट कर आता है वापस वहीं।

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  2. पहले तो मोरमन शब्द से
    Mormon ( Christians ) याद आये -
    फिर भटकाव और मन का अँदेसा हुआ -

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  3. अघोरमन के बोसीदा अंधेरे में भी ज़र्द रोशनी वाली लालटेन की टिमटिम वह काम कर जाती है जो चटक चांदनी नहीं कर पाती।

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