Saturday, December 27, 2008

ज़रामुश..?


रोज़ ज़रा-सा खुद को सहेजता हूं, रोज़ थोड़ा-सा खुद से छूट जाता हूं, घबराकर हूकता हूं देखा तुमने, कहां छूटा? तुम हंसकर कहती हो क्‍या?

धूप उठते-उठते-उठते उठी जायेगी ऊंची इमारतों की लम्‍बी दीवारों के पार, मैं तंग दायरों में हड़बड़ कमीज़ खोजूंगा कि लो, यह बाबू भी बटन-बर्बाद निकले? तुम मुंह फेरकर कहोगी आख़ि‍री बार कब था जब आबाद निकले?

पैरों की उंगलियां होंगी, समूचा पैर न होगा, हरकत होगी हाथ का सगरे हिलोर न होगा, अनजाने दरख़्तों के अंधेरे झुरमुट-से छितराये-उझराये शब्‍द होंगे मन में लहरकर उतर जाये सा जादुई भाषायी वन न होगा, जंगले होंगे जंगल न होगा? तुम कहोगी हूं..

6 comments:

  1. पोथी !!!!!!
    दर्पण !!!!!!!!!!!!!!!
    वाह !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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  2. अद्भुत !दिलचस्प भी !

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  3. बटन के गुम होने का गम उसे क्या होगा जो जंगल के गुम होने के बाद जंगले में खडा होगा!

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  4. @चंदू प्‍यारे,
    हूं. शायद इसी सबकॉन्‍शस की चिंता में ठीक बादवाले पोस्‍ट में उड़ाने के लिए बच्‍चे के हाथ में पतंग तो नहीं थमा दिये हैं?

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